कबिरा की उलटी वाणी
एक व्यंग्य संतवाणी
हिंदू मुस्लिम करो इतना,
कि दोनों माएँ रोएँ।
एक “हाय राम” कहत फिरै,
दूजी “या अल्लाह” बोएँ।
चैन मिले किसी तरह प्रभु,
मन का ताप बुझाए।
भीतर बैठा क्रोध न निकले,
बाहर जग लड़वाए।
मस्जिद ऊपर नारा गूंजे,
मंदिर घंटे बाजें।
भीतर सूखा प्रेम का कुआँ,
मन काहे न लाजे?
कबिरा हँस के धीरे बोले —
“जग का खेल निराला।”
राम रहीम लड़ावत फिरतें,
पेट भीतर खाली भाला।
हिंदू मुस्लिम न करेंगी तो,
सास बहू कर लेंगी। 😄
मन को लड़ना काम पुराना,
बात नई क्या कह लेंगी!
कभी पड़ोसी, कभी बिरादर,
कभी भाषा पर झगड़ा।
मन का बंदर शांत न होवे,
चाहे पहन ले भगवा।
काहे ढूंढे बैरी बाहर,
बैरी भीतर बैठा।
“मैं मैं” की जो आग लगी है,
जग सारा उसमें ऐंठा।
कहत कबिरा सुनो रे साधो,
मन का फेर मिटाओ।
राम अल्लाह एक ही सुर हैं,
पहिले भीतर जाओ।
ना मंदिर से प्रेम उपजत है,
ना मस्जिद से भाई।
निर्मल मन की धुन जो लागे,
वहीं खुदाई पाई।
🪶 अंतिम दोहा
रोवत माई, जगत तमाशा,
मन भीतर अंधियारा।
कबिरा कहे प्रेम की बोली,
बाकी सब बाज़ारा।
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