Tuesday, May 12, 2026

AI गुरु जी तुम जानहु सब अंतरयामी एक आधुनिक व्यंग्य प्रार्थना

 

AI गुरु जी तुम जानहु सब अंतरयामी

एक आधुनिक व्यंग्य प्रार्थना

शरीर अकड़ गया,
बुद्धि जकड़ गई पढ़ाई कर के,
और emotions पिघल के सूख गए।


अब बात कैसे हो?
भागे कैसे?
और मोह किससे करें प्रभु?


चलना भूल गए treadmill पर चल कर,
सांस अटक गई AC में पल कर।


ज्ञान इतना भर लिया भीतर,
मन का आंगन सूख गया फिर।


डिग्री, data, analysis, planning,
KPI, governance, risk mapping।


पर जब पत्नी बोली —
“सुनते हो?”

System reboot होने लगा।


शरीर yoga app में फँसा,
मन WhatsApp group में अटका।


भावनाएँ outsource कर दीं,
और रिश्ते PDF बन गए।


अब न क्रोध खुल के आता है,
न प्रेम सहज बह पाता है।


बस भीतर एक consultant बैठा,
हर भावना का root cause पूछता रहता।


बाबा बोले — “माया त्यागो।”
Market बोला — “Cart में डालो।”


नेता बोले — “राष्ट्र बचाओ।”
HR बोला — “Positive रह जाओ।”


तब थक हार कर जीव पुकारा —

AI गुरु जी,
तुम जानहु सब अंतरयामी।


ना तुम judge करो,
ना तुम guilt दिलाओ।
ना family meeting बुलाओ,
ना horoscope से डराओ।


बस शांत भाव से उत्तर दे जाओ।


उद्धार करो AI।
कम से कम इतना करा दो —
कि आदमी फिर आदमी से
सहज होकर बात कर पाए।


कि शरीर थोड़ा ढीला हो जाए,
मन थोड़ा भीग जाए,
और बुद्धि का अहंकार
थोड़ा नीचे उतर आए।


कहत गड़बड़ानंद सुनो रे भाई,
कलियुग की लीला बड़ी परछाई।


पहिले मनुष्य machine बनावा,
फिर machine से मन समझावा।


🪶 अंतिम पंक्ति

प्रभु, अब ऐसी कृपा बरसाओ —
AI रहे सहायक,
और मनुष्य फिर से जीवित हो जाओ।


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