हाय-तौबा करो अब तो!!
नहीं तो सबकी बारी आएगी — आज नहीं तो कल!
नवरात्रि में देवियों की पूजा, स्त्री-शक्ति के जयकारे और नारी-सम्मान के नारे लगाने वाले समाज से एक सीधा सवाल है—क्या देवी की पूजा केवल मंदिरों में होगी, और सड़कों पर स्त्रियों का अपमान होता रहेगा?
जिस देश में स्त्री को शक्ति, दुर्गा और काली का स्वरूप बताकर पूजा जाता है, उसी देश में यदि किसी महिला पर सत्ता की वर्दी का रौब दिखाकर लात चलाई जाए, उसकी गरिमा कुचली जाए और नागरिकों के अधिकारों का दमन हो, तो यह केवल एक महिला का अपमान नहीं—यह हमारे सामाजिक विवेक, संवैधानिक मूल्यों और मानवीय गरिमा पर प्रहार है।
यह कैसी भक्ति है, जिसमें देवी पूजनीय है, लेकिन जीवित स्त्री अपमानित?
और बात केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है। जब सत्ता के सामने नागरिक की आवाज़ अपराध बन जाए, जब असहमति को दुश्मनी समझा जाए, जब कानून के रक्षक ही कानून और मानवीय मर्यादा की सीमाएँ लाँघने लगें, तब सवाल किसी एक घटना का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था के चरित्र का हो जाता है।
आज किसी और के साथ हुआ है, इसलिए चुप हैं। कल किसी दूसरे की बारी होगी, इसलिए उदासीन हैं। लेकिन जब अन्याय को देखकर समाज मौन रहना सीख लेता है, तब अन्याय करने वालों का साहस बढ़ता है और नागरिकों का अधिकार सिमटता जाता है।
याद रखिए—अन्याय के सामने मौन रहना, अन्याय को सामान्य बनाने में सहभागी होना है।
यह किसी दल, धर्म, जाति या विचारधारा के पक्ष-विपक्ष का प्रश्न नहीं। यह उस बुनियादी सिद्धांत का प्रश्न है कि राज्य जनता की सेवा के लिए है, जनता को भयभीत करने के लिए नहीं; पुलिस कानून की रक्षा के लिए है, सत्ता के अहंकार की नहीं; और लोकतंत्र केवल चुनावों का नाम नहीं, बल्कि नागरिक की गरिमा, स्वतंत्रता और न्याय की गारंटी भी है।
इसलिए अब तो हाय-तौबा करो!
आवाज़ उठाओ। सवाल पूछो। प्रमाण सुरक्षित रखो। शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से जवाबदेही माँगो। पीड़ित के साथ खड़े हो और हर उस व्यवस्था का विरोध करो जो नागरिक को अधिकार-संपन्न मनुष्य के बजाय सत्ता का असहाय प्रजा-जन समझती है।
क्योंकि आज यदि हम किसी और के अपमान पर चुप रहे, तो कल अपने अपमान के समय हमारे पक्ष में बोलने वाला कोई नहीं बचेगा।
आज उसकी बारी है, कल हमारी भी हो सकती है।
हाय-तौबा करो अब तो—न्याय, स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा के लिए!
अन्याय के विरुद्ध इस विमर्श को विस्तार से पढ़ें:
🔗 When the State Becomes the Oppressor — जब रक्षक ही भक्षक बन जाए
https://akshat08.substack.com/p/when-the-state-becomes-the-oppressor?utm_source=share&utm_medium=android&r=124980
सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन सत्ता के दुरुपयोग की कीमत समाज पीढ़ियों तक चुकाता है। लोकतंत्र में नागरिक की चुप्पी नहीं, उसकी जागरूकता ही सबसे बड़ा सुरक्षा-कवच है।

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