अब असली दशहरा मनाने का समय है!
अहंकार, पाखंड, जुमलेबाजी और सत्ता के मद का दहन ही सच्चा विजयादशमी है।
प्रेम से बोलो—एक ओंकार सतनाम!
वाहे गुरु जी का खालसा, वाहे गुरु जी की फ़तेह!
दशहरा हर साल आता है। रावण के पुतले जलाए जाते हैं, आतिशबाजी होती है, जयकारे गूँजते हैं और अगले दिन जीवन फिर उसी ढर्रे पर लौट आता है।
लेकिन एक प्रश्न है—
क्या रावण केवल मैदान में खड़ा कोई पुतला है, या वह हमारे भीतर और हमारे समाज की सत्ता-संरचनाओं में भी जीवित है?
यदि रावण अहंकार का प्रतीक है, तो उस अहंकार का क्या, जो स्वयं को ईश्वर का अवतार समझने लगे?
यदि रावण छल और कपट का प्रतीक है, तो उस राजनीति का क्या, जिसमें शब्दों के महल खड़े किए जाएँ, लेकिन जनता के जीवन में सत्य और न्याय का अभाव बना रहे?
यदि रावण अत्याचार का प्रतीक है, तो उस व्यवस्था का क्या, जिसमें प्रश्न पूछने वालों को शत्रु और असहमति रखने वालों को देशद्रोही समझा जाने लगे?
असली दशहरा तभी होगा, जब हम पुतलों के साथ-साथ अपने समय के अहंकार, पाखंड और अन्याय को भी चुनौती देंगे।
1. तपस्या की है, भगवान से वरदान मिला है—तो क्या?
सत्ता का अहंकार अक्सर स्वयं को अजेय समझने लगता है।
कभी उसे लगता है कि उसके पास ईश्वरीय संरक्षण है। कभी वह अपने समर्थकों की भीड़ को अपनी अमरता का प्रमाण मान बैठता है। कभी उसे विश्वास हो जाता है कि उसके शब्द ही सत्य हैं और उसका विरोध करने वाला हर व्यक्ति असत्य का पक्षधर है।
तब एक प्रश्न उठता है—
तपस्या की है, भगवान से वरदान मिला है, तो क्या?
क्या वरदान अन्याय करने का अधिकार-पत्र है?
क्या धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करने से मनुष्य अपने कर्मों के परिणामों से मुक्त हो जाता है?
क्या ईश्वर का नाम लेने वाला व्यक्ति सत्य, करुणा और न्याय की कसौटी से ऊपर हो जाता है?
भारतीय महाकाव्यों की शिक्षा इसके विपरीत है। रावण विद्वान था, शक्तिशाली था और तपस्वी भी था। लेकिन उसका ज्ञान उसके अहंकार को पराजित नहीं कर सका।
उसकी त्रासदी केवल यह नहीं थी कि वह पराजित हुआ; उसकी त्रासदी यह थी कि वह अपनी शक्ति और ज्ञान के बावजूद अपने अहंकार को पहचान नहीं सका।
ज्ञान यदि विनम्रता न दे, शक्ति यदि लोककल्याण न करे और भक्ति यदि मनुष्य में करुणा न जगाए, तो उनका सामाजिक मूल्य क्या रह जाता है?
यही प्रश्न आज भी प्रासंगिक है।
2. हनुमान का मुक्का और अहंकार की हार
हनुमान भारतीय लोकमानस में केवल बल के प्रतीक नहीं हैं। वे सेवा, समर्पण, विवेक और निर्भीकता के भी प्रतीक हैं।
उनकी शक्ति का आधार व्यक्तिगत महिमा का प्रदर्शन नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा है।
वे अपनी शक्ति का ढिंढोरा नहीं पीटते। वे अपने आराध्य के कार्य में उसे लगाते हैं।
इसलिए आज के अहंकार से भरे हुए चरित्रों के लिए हनुमान का प्रतीक एक गहरा व्यंग्य बन जाता है।
वरदानों की कथाएँ सुनाकर स्वयं को अजेय बताने वालों को याद रखना चाहिए कि अहंकार की पराजय के लिए हमेशा किसी दिव्य अस्त्र की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी सत्य का एक प्रश्न, जनता का एकजुट प्रतिरोध और विवेक की एक चोट ही पर्याप्त होती है।
यहाँ हनुमान का मुक्का किसी मनुष्य के विरुद्ध शारीरिक हिंसा का आह्वान नहीं, बल्कि उस अहंकार पर प्रतीकात्मक प्रहार है जो स्वयं को कानून, नैतिकता और जनता से ऊपर समझने लगता है।
रावण का दहन तभी सार्थक है, जब हम अपने भीतर बैठे उस रावण को पहचानें जो अपनी शक्ति के मद में दूसरों की गरिमा भूल जाता है।
3. मूक समाज से जुमलेबाज सत्ता तक
तुलसीदास की रामचरितमानस में एक प्रसिद्ध चौपाई है—
जासु कृपाँ सकल कलि मल दहन।
यहाँ उस कृपा की ओर संकेत है जो कलियुग के समस्त मल—अर्थात् अज्ञान, विकार और अधर्म—को नष्ट करने वाली है।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हम इस कृपा को केवल किसी चमत्कार की प्रतीक्षा में खोजेंगे, या अपने जीवन में सत्य, विवेक और करुणा के रूप में भी पहचानेंगे?
जब समाज प्रश्न पूछना छोड़ देता है, तब जुमले सत्य का स्थान लेने लगते हैं।
जब नागरिक विवेक का इस्तेमाल छोड़ देते हैं, तब प्रचार विचार का स्थान ले लेता है।
जब धर्म का अर्थ नैतिक आचरण के बजाय केवल पहचान और प्रदर्शन बन जाता है, तब धार्मिक भाषा का इस्तेमाल अधर्म को ढकने के लिए भी किया जा सकता है।
और जब सत्ता स्वयं को आलोचना से परे मानने लगती है, तब लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ने लगती है।
यहीं हमें उस स्थिति पर व्यंग्य करना चाहिए जिसमें कोई व्यक्ति स्वयं को सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और अपरिहार्य बताता है, जबकि उसके दावों और वास्तविकताओं के बीच गहरी खाई दिखाई देती है।
मूक समाज, जाहिलाना दंभ, परजीवी सत्ता-संरचनाएँ और जुमलेबाजी—ये सब किसी एक व्यक्ति के नाम से बड़े प्रश्न हैं। ये उस राजनीतिक संस्कृति के लक्षण हैं जिसमें जवाबदेही की जगह व्यक्तिपूजा ले लेती है।
लोकतंत्र में किसी नेता को देवता बनाना जनता की शक्ति को कमजोर करना है।
नेता जनता का सेवक है, स्वामी नहीं।
उसका मूल्यांकन उसके दावों से नहीं, उसके कार्यों से होना चाहिए।
उसकी धार्मिक वेशभूषा से नहीं, उसके नैतिक आचरण से होना चाहिए।
और उसकी लोकप्रियता से नहीं, इस बात से होना चाहिए कि समाज में न्याय, समानता और मानवीय गरिमा कितनी सुरक्षित हैं।
4. एक ओंकार सतनाम—सत्य किसी की निजी संपत्ति नहीं
सिख परंपरा का मूल उद्घोष है—
ੴ सतनाम।
एक ओंकार—एक परम सत्य।
यह उद्घोष हमें उस आध्यात्मिक दृष्टि की ओर ले जाता है जिसमें परम सत्ता को किसी व्यक्ति के अहंकार, किसी राजनीतिक दल के प्रचार या किसी सत्ता-केंद्र की निजी संपत्ति नहीं बनाया जा सकता।
गुरु नानक की वाणी मनुष्य को बाहरी आडंबर से आगे बढ़कर सत्य, नाम, ईमानदार श्रम और सेवा की ओर बुलाती है।
इस दृष्टि में धर्म का अर्थ दूसरों पर अपनी श्रेष्ठता थोपना नहीं, बल्कि अपने आचरण को सत्य के अनुरूप बनाना है।
ईश्वर के नाम पर अहंकार कैसा?
भक्ति के नाम पर घृणा कैसी?
धर्म के नाम पर अन्याय कैसा?
और आध्यात्मिकता के नाम पर व्यक्ति-पूजा कैसी?
यदि परम सत्य एक है, तो मनुष्य-निर्मित विभाजनों और श्रेष्ठता के दावों को भी विवेक की कसौटी पर परखना होगा।
वाहे गुरु जी का खालसा, वाहे गुरु जी की फ़तेह!
इस उद्घोष की आत्मा को केवल धार्मिक समारोहों तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसकी नैतिक प्रेरणा हमें अन्याय के सामने निर्भीक और अपने भीतर विनम्र बनने की शिक्षा देती है।
सत्य की विजय किसी व्यक्ति-विशेष की निजी जीत नहीं है।
सत्य की विजय तब है, जब भय पर विवेक की, अन्याय पर न्याय की और अहंकार पर विनम्रता की विजय हो।
5. असली दशहरा: किसी व्यक्ति का नहीं, अहंकार का अंत
दशहरा मनाने का अर्थ किसी समुदाय से घृणा करना या किसी व्यक्ति के विनाश की कामना करना नहीं है।
राम और रावण की कथा को यदि हम केवल अपने विरोधियों को रावण घोषित करने के लिए इस्तेमाल करेंगे, तो हम स्वयं उसी अहंकार के शिकार हो सकते हैं जिसकी निंदा करने निकले हैं।
असली प्रश्न यह नहीं है कि हमारे विरोधी में कितना रावण है।
असली प्रश्न यह है कि हमारी राजनीति, हमारा समाज और हमारा अपना आचरण किस हद तक सत्य और न्याय के साथ खड़ा है।
हमें चाहिए—
- जुमलेबाजी के स्थान पर जवाबदेही।
- व्यक्तिपूजा के स्थान पर विवेक।
- धार्मिक प्रदर्शन के स्थान पर नैतिक आचरण।
- भय के स्थान पर निर्भीक प्रश्न।
- घृणा के स्थान पर मानवीय गरिमा।
- सत्ता के अहंकार के स्थान पर लोकसेवा।
और सबसे बढ़कर, हमें यह समझना होगा कि लोकतंत्र में किसी भी शासक की शक्ति जनता के विश्वास से आती है। वह विश्वास स्थायी नहीं, बल्कि कर्मों और जवाबदेही से अर्जित किया जाता है।
जो स्वयं को अजेय समझता है, उसे इतिहास याद दिलाता है कि कोई भी सत्ता शाश्वत नहीं होती।
जो स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि बताकर प्रश्नों से बचना चाहता है, उसे मनुष्य की स्वतंत्र बुद्धि चुनौती देती है।
और जो अपने अहंकार को ही अपनी शक्ति समझ बैठता है, उसके पतन के बीज अक्सर उसी अहंकार में छिपे होते हैं।
6. इस दशहरे का संकल्प
आइए, इस बार केवल रावण का पुतला न जलाएँ।
अपने भीतर के अहंकार को जलाने का संकल्प लें।
अंधभक्ति के स्थान पर विवेक जगाएँ।
धर्म के नाम पर होने वाले पाखंड को पहचानें।
सत्ता से प्रश्न पूछने के नागरिक अधिकार की रक्षा करें।
और किसी भी व्यक्ति को सत्य, न्याय तथा कानून से ऊपर न मानें।
क्योंकि राम का आदर्श केवल विजय का नहीं, मर्यादा का भी है।
हनुमान का आदर्श केवल बल का नहीं, सेवा का भी है।
गुरु नानक का संदेश केवल उद्घोष का नहीं, सत्यपूर्ण जीवन का भी है।
और दशहरे का संदेश केवल रावण के अंत का नहीं, अहंकार के अंत का भी है।
जब तक अन्याय जीवित है, तब तक दशहरे का संदेश अधूरा है।
जब तक अंधभक्ति विवेक को दबाती है, तब तक विजयादशमी का अर्थ अधूरा है।
और जब तक मनुष्य अपने अहंकार को धर्म, राष्ट्र या ईश्वर का नाम देकर उचित ठहराता रहेगा, तब तक रावण के पुतले जलते रहेंगे—लेकिन रावण जीवित रहेगा।
इसलिए उठिए, प्रश्न पूछिए, सत्य का साथ दीजिए और अपने विवेक को किसी के चरणों में गिरवी मत रखिए।
यही असली दशहरा है।
यही अहंकार के रावण का दहन है।
और यही सत्य की विजय का मार्ग है।
अंतिम उद्घोष
प्रेम से बोलो—एक ओंकार सतनाम!
वाहे गुरु जी का खालसा, वाहे गुरु जी की फ़तेह!
सत्य की विजय हो।
अहंकार का अंत हो।
अन्याय का प्रतिरोध हो।
मानवता का सम्मान हो।
जय सत्य। जय विवेक। जय मानवता।
मन रे, तू काहे न धीर धरे!
— माया, मोह और मृत्यु पर संत-वाणी
मन रे, तू काहे न धीर धरे, काहे माया के पीछे भागे, काहे झूठे स्वप्न गढ़े?
वो निर्मोही, मोह न जाने, जिनके पीछे जगत दीवाना, धन-दौलत के झूठे बंधन, काहे इनको माने खजाना?
मन रे, तू काहे न धीर धरे, काहे माया के पीछे भागे, काहे झूठे स्वप्न गढ़े?
अडानी, अंबानी, मस्क, बिल गेट्स, धन के ऊँचे महल खड़े, काल खड़ा है द्वार उन्हीं के, किसके आगे पाँव पड़े?
सोने-चाँदी, हीरे-मोती, सब यहीं पर छूटेंगे, जिनके नाम से जग थर्राए, वे भी मिट्टी में मिलेंगे।
आज महलों में राज तुम्हारा, कल मिट्टी की सेज बने, ऊपर जामी घास हरी-हरी, कौन तुम्हारा नाम कहे?
राजा, रंक, अमीर, भिखारी, काल न किसी को क्षमा करे, जिसने जग को जीत लिया हो, मुट्ठी बाँधे कौन मरे?
धन की गठरी, मान की पगड़ी, यहीं धरी रह जाएगी, देह गिरेगी धूल में जाकर, साँस कहाँ फिर आएगी?
मन रे, तू काहे न धीर धरे, काहे माया के पीछे भागे, काहे झूठे स्वप्न गढ़े?
जिस धन पर तू गर्व जताए, वह धन तेरा कब होगा? जिस तन पर तू नाज़ करे है, माटी में मिलकर खोएगा।
माया तेरी, माया मेरी, माया का विस्तार बड़ा, पर जब काल हिसाब माँगेगा, कौन कहेगा—मैं हूँ खड़ा?
भूखे की रोटी बन जा तू, प्यासे का जलधार बन, गिरते को दे हाथ सहारा, दुखियों का आधार बन।
किसके हिस्से कितना आया, इसका लेखा छोड़ रे मन, प्रेम बाँटकर देख ज़रा तू, यही कमाई, यही धन।
मन रे, तू काहे न धीर धरे, साँस-साँस में नाम सुमिर ले, झूठे जग से मोह परे।
काया माटी, साँस उधारी, किस बात का अभिमान? जिस घट में तू देख रहा है, उसी घट में भगवान।
न ऊँचा कोई, न नीचा कोई, एक ज्योति सबमें बसे, अहम्-भाव की दीवारें तोड़, प्रेम सुधा मन में बरसे।
धनवानों की धाक न देख, निर्धन की लाचारी देख, मंदिर-मस्जिद छोड़ कभी तू, मन की भी बीमारी देख।
संत कहें, सुन बावरे प्राणी, माया का मद त्याग रे, जग में आया प्रेम लुटाने, सत्य की राह पर भाग रे।
मन रे, तू काहे न धीर धरे, जो आया है, सो जाएगा, नाम रहेगा या कर्म तेरे!
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