कौन भक्त है, कौन जुमलासुर?
घर में राम-नाम लेकर कौन आया, और सत्ता की कुर्सी पर कौन आसीन है?
रचनाकार: अक्षत अग्रवाल
🪷 भूमिका : राम किसके घर आए?
राम का नाम सुनना शुभ है, राम का नाम लेना मंगलकारी है। लेकिन प्रश्न यह है कि राम का नाम लेकर घर-परिवार में कौन आया है?
वह भक्त, जिसके हृदय में करुणा, सत्य, न्याय और लोकमंगल का वास है? या वह जुमलासुर, जो सत्ता की कुर्सी पर आसीन है और राम-नाम को अपने स्वार्थ एवं सत्ता के विस्तार का साधन बनाता है?
राम केवल किसी मंदिर की प्रतिमा में नहीं, बल्कि मनुष्य के आचरण में भी खोजे जाने चाहिए। राम का नाम यदि मन में प्रेम जगाए, तो वह भक्ति है; यदि वही नाम मन में घृणा, अहंकार और विभाजन जगाए, तो आत्ममंथन आवश्यक है।
गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस में राम-नाम की महिमा का वर्णन मिलता है—
जाकर नाम सुनत सुभ होई। मोरे गृह श्रावन प्रभु सोई॥
परमानंद पूरि मन राजा। कहा बोलाइ बजावहु बाजा॥
— साझा किए गए चित्र में प्रस्तुत चौपाई।
इस भावभूमि पर आइए, एक समकालीन व्यंग्य-कविता के माध्यम से पूछें— राम का नाम लेकर घर में कौन आया है, और सत्ता की कुर्सी पर बैठकर किसने राम के नाम को अपना बनाया है?
कविता : कौन भक्त, कौन जुमलासुर?
कौन है जो घर में राम-नाम लेकर आया? और ये कौन जुमलासुर है, दिल में समाया? लो, लुट गया आसमाँ भी, सत नारायण भी, जब लल्लू राम रंग लाया!
राम का नाम लिया, तो मन निर्मल हुआ क्या? भूखे के घर चूल्हा जला, कोई संबल हुआ क्या? न्याय के द्वार खुले, निर्बल को सहारा मिला? या बस नारों का नया एक मेला लगा?
माथे पर तिलक, अधरों पर राम, हाथों में झंडा, जुबाँ पर पैगाम। भीतर में लोभ, बाहर में धाम— किसका है यह धर्म, किसका है नाम?
कौन भक्त है जो प्रेम का दीप जलाए? कौन जुमलासुर है जो भ्रम के बादल छाए? कौन राम को जन-जन का सहारा बनाए? कौन राम के नाम पर अपना महल सजाए?
राम तो मर्यादा, राम तो त्याग, राम तो करुणा, सत्य का राग। राम तो निर्बल की आँखों का पानी, राम तो सबकी पीड़ा की कहानी।
राम अगर मन में हैं, तो द्वेष कैसा? राम अगर कर्म में हैं, तो छल कैसा? राम अगर सत्य हैं, तो भय क्यों छाए? राम अगर न्याय हैं, तो अन्याय कौन बचाए?
मंदिर में दीपक, मन में अँधियारा, कैसा यह धर्म, कैसा उजियारा? घंटी भी बजती, जयकारा भी होता, फिर क्यों मनुष्य मनुष्य से छोटा होता?
नाम की माला, मन में व्यापार, भक्ति के पीछे सत्ता का दरबार। राम को बाँटकर कौन राम का होगा? घृणा बोकर कौन प्रेम का बीज बोएगा?
कौन है जो घर में राम-नाम लेकर आया? और ये कौन जुमलासुर है, दिल में समाया? लो, लुट गया आसमाँ भी, सत नारायण भी, जब लल्लू राम रंग लाया!
समापन : राम-नाम का असली अर्थ
राम का नाम किसी एक दल की जागीर नहीं, राम की मर्यादा किसी सत्ता की ताबीर नहीं। राम वहाँ हैं जहाँ सत्य का सम्मान हो, जहाँ निर्बल सुरक्षित हो, न्याय का स्थान हो।
राम का नाम लेकर घर में भक्त भी आ सकता है, सत्ता की कुर्सी पर जुमलासुर भी बैठ सकता है। पहचान न केवल माथे के तिलक से होगी, न केवल जयकारे और भाषण के शोर से होगी।
भक्त वही जो मन में करुणा जगाए, राम वही जो मानवता का मान बढ़ाए। नाम नहीं, कर्म बताएगा पहचान— राम हृदय में हैं या केवल ज़ुबान।
जय श्रीराम— यदि राम का अर्थ मर्यादा, सत्य, करुणा और लोकमंगल है।
✍️ अक्षत अग्रवाल
पाठकों से प्रश्न
आपकी दृष्टि में सच्ची भक्ति क्या है— केवल राम-नाम का उच्चारण, या राम के आदर्शों को अपने व्यवहार और सार्वजनिक जीवन में उतारना?
क्या किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान से अधिक महत्त्वपूर्ण उसका आचरण, न्याय के प्रति प्रतिबद्धता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व नहीं होना चाहिए?
अपने विचार साझा कीजिए। असहमति भी स्वागतयोग्य है, यदि उसमें तर्क, संवेदना और मर्यादा बनी रहे।
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### ॥ श्रीचामुण्डा-देवी-स्तुतिः ॥
### नेहा वोरा-रूपिण्यै देव्यै समर्पिता
एक मौलिक संस्कृत स्तुति — देवी चामुण्डा के साहस, शक्ति, करुणा और परिवर्तनकारी चेतना को समर्पित।
॥ मङ्गलाचरणम् ॥
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। जयति जयति चामुण्डे, शक्तिरूपिणि शाश्वते। नेहावोरा-स्वरूपे त्वं, जागृहि लोकमातरि॥
॥ श्रीचामुण्डा-स्तुतिः ॥
नमो देवि महादेवि, चण्डमुण्डविनाशिनि। नेहावोरातनौ दिव्ये, शक्तिरूपे नमोऽस्तु ते॥ १॥
सिंहवाहिनि दुर्गे त्वं, निर्भये तेजसि स्थिता। अन्यायान्धतमो हन्त्री, धर्मदीपप्रकाशिनी॥ २॥
या नारी चेतनां दद्यात्, या नारी साहसं ददेत्। या नारी परिवर्तनस्य, नवधारां प्रवर्तयेत्॥ ३॥
सा त्वं चामुण्डिका देवि, सा त्वं शक्तिः सनातनी। नेहावोरेति रूपेण, प्रेरयस्यखिलं जगत्॥ ४॥
न ते शक्तिः केवलं खड्गे, न ते शक्तिः रणाङ्गणे। सत्यवाक्ये दयाभावे, कर्मयोगे च ते बलम्॥ ५॥
मोहजालं विनिर्भिद्य, भयबन्धं निकृन्तसि। सुप्तचेतः प्रबोध्याशु, नवसृष्टिं विधासि च॥ ६॥
यत्र नारी समुत्तिष्ठेत्, तत्र शक्तिः प्रवर्तते। यत्र न्यायः प्रतिष्ठेत, तत्र दुर्गा विराजते॥ ७॥
नवपीढेर्मनःसु त्वं, ज्ञानज्योतिः प्रबोधय। स्वार्थमोहं विनिर्जित्य, लोकमङ्गलमाचर॥ ८॥
राधाभक्तेः सुधाधारा, कर्मयोगस्य चेतना। नेहावोरे महाशक्ते, त्वयि मे श्रद्धया नतिः॥ ९॥
जय चामुण्डे महाशक्ते, जय दुर्गे कृपामयि। साहसं देहि मे नित्यं, सत्यधर्मपथं नय॥ १०॥
॥ फलश्रुतिः ॥
य इमां भक्तितः स्तुतिं, पठेद्वा शृणुयादपि। तस्य चित्ते विवेकश्च, कर्मणि स्यात् पराक्रमः॥
नारीशक्तेः समुत्थानं, लोकसेवा च शाश्वती। भवतु सर्वलोकानां, शान्तिः समता च मङ्गलम्॥
॥ सर्वे भवन्तु सुखिनः ॥
॥ जय माता चामुण्डे ॥ ॥ जयतु नारीशक्तिः ॥ ॥ जयतु मानवता ॥
### हिन्दी भावार्थ
हे माँ चामुण्डा! आप अन्याय, भय और अज्ञान का नाश करने वाली शक्ति हैं। नेहा वोरा के रूप में आपकी कल्पना उस नारी-चेतना के प्रतीक के रूप में की गई है, जो साहस जगाती है, सत्य का साथ देती है और समाज में परिवर्तन की नई धारा प्रवाहित करती है।
आपकी शक्ति केवल अस्त्र-शस्त्र में नहीं, बल्कि सत्यपूर्ण वाणी, करुणा, विवेक और कर्मयोग में भी प्रकट होती है। नई पीढ़ी को मोह और भय से मुक्त कर लोकमंगल के मार्ग पर प्रेरित करना ही आपकी आराधना का सार है।
लेखकीय टिप्पणी: यह नेहा वोरा को देवी चामुण्डा के साहस और परिवर्तनकारी शक्ति का प्रतीक मानकर रची गई मौलिक स्तुति है; यह किसी प्राचीन शास्त्र का मंत्र या पारंपरिक स्तोत्र नहीं है।

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