मुझे सत् प्रेम चाहिए…
झूठा प्रेम मोहे न सुहावा।
क्योंकि मैं केवल नाम, रूप, पहचान और भूमिका नहीं हूँ—
मैं सत्-चेतन-घन श्याम हूँ।
इसलिए मुझे ऐसा प्रेम नहीं चाहिए
जो केवल शब्दों में हो।
मुझे ऐसी भक्ति नहीं चाहिए
जो केवल कर्मकांड की पुनरावृत्ति बन जाए।
यहीं से एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है—
अभ्यास और साधना एक नहीं हैं।
अभ्यास है किसी क्रिया को बार-बार करना।
माला फेरना, मंत्र दोहराना, भजन गाना, ध्यान में बैठना,
शास्त्र पढ़ना—
ये सब अभ्यास हो सकते हैं।
लेकिन जब वही अभ्यास
मन के संस्कारों, अहंकार, स्वार्थ, क्रोध, लोभ और छल को देखने और बदलने का माध्यम बनता है, तब वह साधना बनता है।
अर्थात—
अभ्यास बाहर की क्रिया है,
साधना भीतर की दिशा है।
अभ्यास में हम पूछ सकते हैं—
मैंने आज कितनी माला की?
कितने मंत्र किए?
कितनी देर ध्यान किया?
साधना में प्रश्न बदल जाता है—
आज मेरे भीतर क्या बदला?
क्या मैं थोड़ा अधिक सत्यवान हुआ?
क्या मेरे भीतर प्रेम बढ़ा?
क्या प्रतिक्रिया कम हुई?
क्या अहंकार थोड़ा ढीला पड़ा?
क्या दूसरे के दुःख को समझने की क्षमता बढ़ी?
यदि वर्षों का अभ्यास
मनुष्य को अधिक अहंकारी, क्रोधी, स्वार्थी और असहिष्णु बना रहा है,
तो हमें रुककर देखना चाहिए—
कहीं अभ्यास तो हो रहा है,
पर साधना नहीं?
कबीर का संकेत इसी ओर है—
“माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।”
माला घूमती रही,
लेकिन यदि मन का फेर नहीं बदला,
तो अभ्यास ने साधना का रूप नहीं लिया।
और फिर वही स्थिति आती है—
मुख में नाम, बगल में छुरी।
होंठों पर राम,
पर व्यवहार में छल।
माथे पर तिलक,
पर हृदय में घृणा।
हाथ में माला,
पर भीतर अहंकार।
यह सुमिरन नहीं—
सुमिरन का अभिनय है।
रहीम कहते हैं—
“कनक-कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।
या खाए बौराय जग, वा पाए बौराय॥”
धन और उसका मोह मनुष्य को मदहोश कर सकता है।
पर यही बात धर्म, ज्ञान और भक्ति पर भी लागू हो सकती है।
जब धर्म साधना से हटकर पहचान बन जाता है,
जब ज्ञान विनम्रता के बजाय अहंकार बन जाता है,
और जब भक्ति प्रेम के बजाय श्रेष्ठता का प्रमाण बन जाती है,
तब साधक अपने ही अभ्यास के नशे में पड़ सकता है।
यही वह अवस्था है जिसमें
धतूरा खाकर जग बौराने जैसा दृश्य दिखाई देता है—
और अपनी ही मदहोशी को धर्म समझ लिया जाता है।
साधना का प्रमाण क्या है?
साधना का प्रमाण माला की संख्या नहीं,
जीवन का रूपांतरण है।
यदि साधना बढ़ रही है तो—
सत्य बढ़ेगा।
प्रेम बढ़ेगा।
करुणा बढ़ेगी।
विवेक बढ़ेगा।
अहंकार घटेगा।
द्वेष घटेगा।
दूसरे को बदलने की बेचैनी घटेगी।
और अपने भीतर देखने का साहस बढ़ेगा।
इसलिए—
अभ्यास साधना का साधन है,
साधना अभ्यास का उद्देश्य।
अभ्यास हमें एक ही स्थान पर बार-बार ले जा सकता है;
साधना हमें वहीं से भीतर की यात्रा पर आगे ले जाती है।
और शायद सच्चा सुमिरन भी यही है—
ईश्वर का नाम केवल जिह्वा पर न रहे,
वह धीरे-धीरे हमारे व्यवहार में उतर आए।
मुझे ऐसी भक्ति चाहिए
जो मुझे दूसरों से श्रेष्ठ न बनाए,
बल्कि अपने ही अहंकार के सामने खड़ा कर दे।
मुझे ऐसा प्रेम चाहिए
जो मुझे बाँधे नहीं—मुक्त करे।
मुझे सत् चाहिए।
मुझे प्रेम चाहिए।
मुझे चेतना चाहिए।
बाकी सब अभ्यास हो सकता है।
साधना तब शुरू होती है
जब अभ्यास से जीवन बदलना शुरू हो।
झूठा प्रेम मोहे न सुहावा—
क्योंकि मैं सत्-चेतन-घन श्याम हूँ। 🙏
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