Friday, July 31, 2026

चलो पाप कटे! कोई न संग मरे।

चलो पाप कटे!

चलो पाप कटे, अब बेड़ी भी सजे,
कर्मों का लेखा आज स्वयं ही बँधे।
जेलखाने से छूटकर कोई पछताता है क्या?
सज़ा पूरी हो जाए तो फिर मुस्काता है क्या?

मित्रों! मनाओ मेरी शोकसभा हँसते-हँसते,
मातम नहीं, आज गीत सुनाओ बजते-बजते।
कहो—एक कैदी अपने कर्मों का ऋण चुका आया,
जीवन की कठिन पाठशाला से लौटकर मुस्कुराया।

मौज करो तुम इस जेलखाने में,
यही तो संसार है—क्षणभंगुर ठिकाने में।
जिसने मोह की सलाखें तोड़ दीं,
उसने ही मुक्ति की राह जोड़ ली।

रोना किस बात का? हिसाब तो चुकाना था,
जो बोया था, वही फल भी तो पाना था।
चलो, आज एक बोझ हल्का हुआ,
आत्मा का आकाश कुछ और निर्मल हुआ।

जब अंतिम पहरेदार भी द्वार खोल देगा,
काल स्वयं मुस्कुराकर हाथ जोड़ देगा।
तब कहूँगा—"धन्य है यह जीवन-यात्रा,
चलो पाप कटे, मुझे है संसार सागर के पार जाना।"

न शोक रहे, न कोई भय, न कोई भ्रम का जाल,
कर्म का बंधन टूटा तो खुल गया सबका काल।
हँसते-हँसते विदा करना, बस इतनी मेरी बात—
"चलो पाप कटे!"
यही है जीवन का सबसे मधुर प्रभात।

Conclusion :

मधुरम हम वा अमर हम की ज्योत जगाए राखिये,
तन में अपने, मन में अपने शांति बनाए रखिए।

दुख का कारण सांसारिक मोह और अज्ञान ही है।

वो कैसे भगवन!!

वो निर्मोही मोह न जाने, जिनका मोह करे। दसवीं तेरहवीं , फिर साल भर के बाद श्राद्ध! भूल जाएगा जगत सारा, ये सपना बिसरा दे। कोई न संग मरे।
मन रे, तू काहे न धीर धरे।

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