Friday, July 31, 2026

भजन – "कोख से संसार तक" (ध्रुवपद) कह नानक सुन रे मना दुरलभ मानुख देह।

 

यह एक मौलिक भजन है, जिसमें गुरुवाणी की पंक्तियाँ ज्यों की त्यों (copy as it is) ध्रुवपद (रिफ्रेन) के रूप में रखी गई हैं, और उनके भाव का विस्तार किया गया है। इसमें गर्भस्थ शिशु की निर्मल चेतना, माँ की कोख की सुरक्षा, संसार में आने का भय, और केवल माँ को पहचानने का भाव है। अंत में गुरुवाणी जीवन का संदेश देती है।


भजन – "कोख से संसार तक"

(ध्रुवपद)

कह नानक सुन रे मना दुरलभ मानुख देह।


जब मैं था माँ की कोख के भीतर, न कोई भाषा, न कोई चेहरा। निर्मल चित था, शांत समीरन, हरि का नाम था मेरा गहना।

नहीं थी माया, नहीं अभिमान, नहीं किसी से बैर। माँ की धड़कन ही थी मेरी वीणा, वही था मेरा घर।

कह नानक सुन रे मना दुरलभ मानुख देह।


नौ मास तक माँ ने पाला, अपने रक्त से तन सँवारा। हर पीड़ा को हँसकर सहा, अपने सुख को पीछे डाला।

उस अँधियारी कोख में भी, प्रभु का उजियारा साथ। माँ की गोदी प्रथम तीर्थ है, वहीं मिला विश्वास।

सब सुख दाता राम है दूसर नाहिन कोय । कह नानक सुन रे मना तिह सिमरत सुख होय ।


फिर जब आया इस संसार में, रोता-रोता आँखें खोलीं। भीड़ बहुत थी, मुख अनजाने, डर से साँस भी डोली।

कौन है अपना, कौन पराया, कुछ भी समझ न पाया। एक वही मुख पहचान सका, जिसने मुझको जन्म दिलाया।

माँ की गोदी में ही आकर, सारा भय मिट जाता। उसकी ममता में ही जैसे, हरि का रूप समाता।


धीरे-धीरे जग ने घेरा, नाम, कुल, धन का फेरा। निर्मल चित पर धूल जम गई, भूल गया निज डेरा।

जिसको अपना समझ रहा था, सब सपना बन जाएगा। जिससे नाता जोड़ न पाया, वही अंत निभाएगा।

जिउ सपना अरु पेखना ऐसे जग को जानि । इन में कछु साचो नहीं नानक बिन भगवान ।


तन भी छूटे, धन भी छूटे, संग न कोई आए। माँ भी एक दिन विदा हो जाए, राम सदा संग धाए।

जिसने कोख में रक्षा की थी, वही जग में रखवाला। माँ के रूप में जिसने पाला, वही है नंदलाला।

पतित उधारन भै हरन हरि अनाथ को नाथ । कह नानक तिह जानिए सदा बसत तुम साथ ।


आओ फिर उस बालक जैसे, निर्मल मन हो जाए। माँ की गोदी जैसी शरण में, राम नाम बस जाए।

जौ सुख को चाहे सदा सरनि राम की लेह । कह नानक सुन रे मना दुरलभ मानुख देह ।


https://youtu.be/D5Qf9Ic0sRM?si=k8anTtC4QDej_-kM


कह नानक सुन रे मना दुरलभ मानुख देह

गुन गोबिंद गायो नही जनम अकारथ कीन । कह नानक हरि भज मना जिह बिध जल की मीन ।
बिखियन सो काहे रचियो निमख ना होहि उदास । कह नानक भज हरि मना परे ना जम की फाँस ।
तरनापो एयो ही गयो लिओ जरा तन जीत । कह नानक भज रे मना आउद जात है बीत ।
बिरद भयो सूझै नही काल पहूँचयो आन । कहो नानक नर बावरें क्यों ना भजे भगवान ।
धन दारा संपत्ति सगल जिन अपनी करि मानि । इन में कछु संगी नहीं नानक साची जानि ।
पतित उधारन भै हरन हरि अनाथ को नाथ । कह नानक तिह जानिए सदा बसत तुम साथ ।
तन धन जे तो को दिओ तासो नेह ना कीन । कह नानक नर बावरे अब क्यों डोलत दीन ।
तन धन संपै सुख दिओ अर जह नीके धाम । कह नानक सुन रे मना सिमरत काहे ना राम ।
सब सुख दाता राम है दूसर नाहिन कोय । कह नानक सुन रे मना तिह सिमरत सुख होय ।
जिह सिमरत गत पाइए तिह भज रे तै मीत । कह नानक सुन रे मना अउध घटत है नीत ।
पांच तत को तन रचियो जानो चतुर सुजान । जिन में उपज्या नानका लीन ताहे मै मान ।
घट घट मे हरि जू बसै संतन कहयो पुकार । कह नानक तिह भज मना भव निधि उतरहि पार ।
सुख दुख जिह परसे नही लोभ मोह अभिमान । कह नानक सुन रे मना सो मूरत भगवान ।
उसतति निंदाया नाहि जिहि कंचन लोह समान । कह नानक सुन रे मना मुकत ताहि तै जान ।
हरख सोग जाके नही बेरी मीत समान । कह नानक सुन रे मना मुकत ताहे तै जान ।
भै काहू को देत न न भै मानत आन । कह नानक सुन रे मना ज्ञानी ताहि बखान ।
जिहि बिखिया सगली तजी लिओ भेख बैराग । कह नानक सुन रे मना तिह नर माथे भाग ।
जिहि माया ममता तजी सभ ते भयो उदास । कह नानक सुन रे मना तिह घट ब्रह्म निवास ।
जिहि प्रानी होमै तजी करता राम पछान । कह नानक वह मुकत नर एह मन साची मान ।
भै नासन दुरमति हरन कलि में हरि को नाम । निसि दिन जो नानक भजै सफल होहि तिह काम ।
जिहबा गुन गोबिंद भजहु करन सुनहु हरि नाम । कह नानक सुनि रे मना परहि न जम के धाम ।
जो प्रानी ममता तजे लोभ मोह अंहकार । कह नानक आपन तरै औंरन लेत उधार ।
जिउ सपना अरु पेखना ऐसे जग को जानि । इन में कछु साचो नहीं नानक बिन भगवान ।
निसि दिन माया कारने प्रानी डोलत नीत । कोटन में नानक कोउ नारायन जिह चीत ।
जैसे जल ते बु्दबुदा उपजै बिनसे नीत । जग रचना तैसे रची कह नानक सुनि मीत ।
प्रानी कछु ना चेतई मदि माया के अंध । कह नानक बिन हरि भजन परत ताहि जम फंध ।
जौ सुख को चाहे सदा सरनि राम की लेह । कह नानक सुन रे मना दुरलभ मानुख देह  ।
माया कारनि धावही मूरख लोग अजान । कह नानक बिन हरि भजन बिरथा जनम सिरान ।
जो प्रानी निसि दिन भजै रूप राम तिह जान । हरि जन हरि अंतर नही नानक साची मान ।

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