शाहों के शहंशाह
अपरिग्रह का वह सुख, जो करोड़ों में नहीं मिलता
कितना धन, संपत्ति, घर-बार है सेठ करोड़ी मल त्रिवेदी के पास?
कितना शाह बहादुर सिंह के पास?
दोनों शहर के एक नंबरी और दो नंबरी रईस हैं — यह सब जानता है।
और तेरे पास?
पूरा शहर। कहीं भी जा कर रहो, कुछ भी किराए पर ले लो। रेलगाड़ी की सीट से लेकर तारों भरी छत तक — सब उपलब्ध है। आज यह शहर, कल वह बस्ती, परसों वह पहाड़।
वसुधैव कुटुम्बकम्।
यानी — पूरी पृथ्वी ही घर है।
मतलब, आप शाहों के भी शहंशाह!
हम तो समझाते रहे यही फ़लसफ़ा पंडित त्रिवेदी और शाह बहादुर दोनों को — आज जो तेरा है, कल किसी और का था। परसों किसी और का होगा। यह दुनिया किसी की मुट्ठी में कभी नहीं रही, न रहेगी। पर ऊ दोनों न माने।
नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः॥"— महाभारत, वनपर्व
अर्थात् — शरीर अनित्य है, वैभव शाश्वत नहीं, मृत्यु सदा निकट है। इसलिए जो करना है वह धर्म है — संग्रह नहीं।
पूरी जिंदगी "मेरा-तेरा" में निकाल दी। कागज़ात, रजिस्ट्रियाँ, तालेबंदी, मुक़दमे। और ऊपर से अपने को successful businessman कहत हैं!
हमारी नज़र में और शास्त्रों की नज़र में? यही पनौती है। यही जुमलासुर है — जो हर चीज़ पर दावा ठोंके, पर एक पल का सुकून न जाने।
जिसके पास ज़मीन है उसे रात को नींद नहीं।
जिसके पास महल है उसे चोर का डर।
जिसके पास बैंक बैलेंस है उसे कर का भय।
और तू?
निश्चिंत, निर्भार, निर्वैर।
अब यह न पूछ लेना — कौन माँ-बाप तेरे?
जिधर सिर नवा दें — वही माई-बाप हो जात हैं। जो छत मिले वही घर, जो आँगन मिले वही ब्रह्मस्थान। यही तो अपरिग्रह है, यही अनासक्ति है — जो गीता भी कहती है, जो बुद्ध भी कहते हैं, जो कबीर भी गाते हैं।
तिरगुन फाँसि लिए कर डोलै, बोलै मधुरी बानी॥"— कबीर
सेठ जी के पास क्या है? — ईंट, पत्थर, काग़ज़।
शाह जी के पास क्या है? — लोहे के गेट, बंद तिजोरियाँ।
और तेरे पास? — खुला आसमान, खुला मन, खुला हृदय।
यही तो असली दौलत है।
बाक़ी सब किराए का सामान है — किसी और की अमानत।
वही सच्चा शाहंशाह।
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