Tuesday, June 23, 2026

दिल का दर्द निराला - मोहम्मद रफी

 

दिल का दर्द निराला - मोहम्मद रफी 

 https://youtu.be/0NglK872SWk?si=nOYzX7Qocoq62JG9 

दिल का दर्द निराला, हे ओंकारेश्वर, तू भी निर्गुण निराला।

जग में देखे सुख अनेकन, सबके भीतर काल कराला। आज हँसे, कल धूल समाना, माया नगर बड़ा मतवाला।

दिल का दर्द निराला, हे ओंकारेश्वर, तू भी निर्गुण निराला।

राजा रोये, रंक भी रोये, रोये वन के पात पियाला। सागर रोये मेघ बनाकर, रोये मन का सूना छाला।

कोई सुख ऐसा क्या जग में, जो न छिने करि काल हवाला? क्षण भर छाया, स्वप्न समाना, जीवन जल पर लिखी माला।

दिल का दर्द निराला, हे ओंकारेश्वर, तू भी निर्गुण निराला।

मंदिर देखा, तीर्थ भी देखे, देखे जग के मेले-थाला। मन का वन सूना ही पाया, ज्यों बिन पवन जले उजियाला।

तू न रूप, न रंग, न रेखा, नहीं तेरा कोई घर-द्वारा। फिर भी कण-कण में तू व्यापक, अंतर बैठा मौन सहारा।

दिल का दर्द निराला, हे ओंकारेश्वर, तू भी निर्गुण निराला।

जिनको चाहा, दूर गए सब, काल बजावे अपना ताला। मीत, सखा, परिवार, संबंधी, सबको लेना एक दिन काला।

तब मन कहे किसको अपना? कौन यहाँ है सदा रखवाला? अंतर से उत्तर यह आया— नाम तुम्हारा एक उजाला।

दिल का दर्द निराला, हे ओंकारेश्वर, तू भी निर्गुण निराला।

सुख की चाहत छोड़ दे मनवा, दुःख भी तेरा गुरु मतवाला। जिसने पीड़ा को पहचाना, उसने पाया सत्य निराला।

काल कराल खड़ा द्वारे पर, मिट्टी तन और साँस हवाला। जो कुछ है वह क्षण का सपना, शेष वही जो निर्गुण वाला।

दिल का दर्द निराला, हे ओंकारेश्वर, तू भी निर्गुण निराला।

जब सब दीपक बुझ जाएँगे, जब जग होगा सूना काला, तब भी भीतर नाद बचेगा—

"ॐ" अनादि, अनंत, निराला।

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