ये भूचाल कहाँ से आया?
रावण का आसन डोला, दस मुकुट धरती पर लुढ़के...
**"ये भूचाल कहाँ से आया?
रावण का आसन डोला, दस मुकुट धरती पर लुढ़के, बंदर उनसे गेंदबाजी करें!"**
रामायण केवल युद्ध की कथा नहीं है।
यह अहंकार के भूकंप की कथा भी है।
जब तक अहंकार सिंहासन पर बैठा रहता है, उसे लगता है कि उसका राज्य अटल है।
सब उसके आदेश से चल रहा है।
सब उसके नियंत्रण में है।
सब उसकी बुद्धि से संचालित है।
फिर एक दिन...
भूचाल आता है।
और सबसे पहले सिंहासन हिलता है।
रावण का आसन क्यों डोला?
रावण मूर्ख नहीं था।
वह वेदों का ज्ञाता था।
महान तपस्वी था।
शिवभक्त था।
विद्वान था।
समृद्ध था।
शक्तिशाली था।
समस्या उसकी शक्ति नहीं थी।
समस्या यह थी कि शक्ति पर अहंकार का कब्ज़ा हो गया था।
उसे लगने लगा था कि:
- कोई उसे हरा नहीं सकता।
- कोई उसे समझा नहीं सकता।
- कोई उससे बड़ा नहीं हो सकता।
यहीं से पतन शुरू हुआ।
दस मुकुट धरती पर क्यों लुढ़के?
रामायण का सबसे सुंदर प्रतीक है — रावण के दस सिर।
उन्हें केवल शारीरिक सिर मत समझिए।
वे दस प्रकार के अहंकार भी हैं:
- ज्ञान का अहंकार
- शक्ति का अहंकार
- धन का अहंकार
- कुल का अहंकार
- तपस्या का अहंकार
- पद का अहंकार
- बुद्धि का अहंकार
- नियंत्रण का अहंकार
- विजय का अहंकार
- और अमर होने का भ्रम
जब राम का बाण चलता है तो केवल शरीर नहीं गिरता।
ये सारे मुकुट भी गिरते हैं।
और बंदर गेंदबाजी करने लगे...
"दस मुकुट धरती पर लुढ़के, बंदर उनसे गेंदबाजी करें!"
यह व्यंग्य नहीं, आध्यात्मिक सत्य है।
जिस मुकुट के लिए मनुष्य जीवन भर लड़ता है,
समय उसे खिलौना बना देता है।
जिस पद पर बैठकर व्यक्ति दूसरों को छोटा समझता है,
इतिहास उसे फुटनोट बना देता है।
वानर सेना यहाँ प्रकृति और समय का प्रतीक है।
समय बड़े-बड़े साम्राज्यों को खिलौना बना देता है।
किसी को कुछ समझ न आई
सबसे रोचक बात यह है कि पतन कभी अचानक नहीं होता।
संकेत पहले से आते रहते हैं।
विभीषण समझाता है।
मंदोदरी समझाती है।
माल्यवान समझाता है।
ऋषि समझाते हैं।
पर अहंकार सुनता नहीं।
इसलिए कवि कहता है —
"न बिजली चमकी, न बादल गरजे..."
अर्थात्
न बुद्धि जागी।
न संत वाणी सुनी गई।
न चेतावनी को महत्व मिला।
बिजली और बादल का रहस्य
रामायण में "बिजली" विवेक है।
अचानक चमकने वाली समझ।
वह क्षण जब मनुष्य कहता है —
"हाँ, गलती मेरी थी।"
लेकिन अहंकार उस बिजली को आने नहीं देता।
और "बादल"?
वे संतों की वाणी हैं।
माता-पिता की सीख।
मित्रों की सलाह।
गुरु का संकेत।
अनुभव की चेतावनी।
जब ये बादल गरजते हैं, तब भी अहंकार कहता है —
"मुझे सब पता है।"
तब खिसियाया उठा दशकंधर...
जब वास्तविकता सामने आती है, तब अहंकार सबसे विचित्र व्यवहार करता है।
वह स्वीकार नहीं करता।
वह क्रोधित होता है।
दोष दूसरों पर डालता है।
भाग्य को दोष देता है।
समाज को दोष देता है।
पर स्वयं को नहीं देखता।
चेहरे की हवाइयाँ क्यों उड़ती हैं?
"चेहरे की हवाई ऐसे उड़े जैसे पनौती!"
क्योंकि अहंकार का सबसे बड़ा भय पराजय नहीं है।
उसका सबसे बड़ा भय है —
सत्य।
सत्य सामने आ जाए तो वर्षों से बनाई हुई छवि टूट जाती है।
और वही क्षण सबसे कठिन होता है।
रामायण का असली भूचाल
रामायण का सबसे बड़ा भूचाल लंका में नहीं आया था।
वह रावण के भीतर आया था।
जब व्यक्ति:
- सत्य को अस्वीकार करता है,
- सलाह को ठुकराता है,
- मोह को धर्म समझता है,
- और अहंकार को आत्मसम्मान,
तब उसके भीतर भूचाल शुरू हो जाता है।
बाहरी युद्ध तो बाद में दिखाई देता है।
निष्कर्ष
आज भी हम रावण को बाहर खोजते हैं।
किसी नेता में।
किसी रिश्तेदार में।
किसी पड़ोसी में।
किसी विरोधी विचारधारा में।
लेकिन रामायण का संदेश अधिक गहरा है।
रावण बाहर कम, भीतर अधिक बैठा है।
और जब भीतर का रावण सिंहासन पर बैठ जाता है, तब:
आसन डोलता है,
मुकुट गिरते हैं,
वानर खेलते हैं,
और व्यक्ति आश्चर्य करता है —
"ये भूचाल कहाँ से आया?"
जबकि उत्तर वर्षों से उसके सामने खड़ा होता है।
जय श्रीराम।
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