Friday, May 29, 2026

मोह और अहंकार के राक्षस

 

मोह और अहंकार के राक्षस

हनुमान चालीसा की दृष्टि से परिवार, समाज और मनुष्य का संघर्ष

"उनके ख़याल आए तो दिमाग खराब कराते चले गए, बरबाद ज़िंदगी को बनाते चले गए।"

जीवन के पचपन वर्षों में मैंने एक बात बार-बार देखी है।

मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बाहर नहीं होता।

न पड़ोसी।

न रिश्तेदार।

न राजनीति।

न कोई जाति।

न कोई धर्म।

सबसे बड़ा शत्रु उसके अपने मन के भीतर बैठा होता है।

गोस्वामी तुलसीदास ने हनुमान चालीसा में इसका सीधा संकेत दिया है —

"कुमति निवार सुमति के संगी"

अर्थात् हनुमान वह शक्ति हैं जो कुमति को दूर करके सुमति का साथ देती है।

समस्या यही है कि अधिकांश लोग अपने शत्रु को पहचान ही नहीं पाते।


कहने को संयुक्त परिवार था...

"कहने को संयुक्त परिवार था, मधुर संबंध थे हमारे..."

भारत में संयुक्त परिवार केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं था।

वह सामाजिक सुरक्षा कवच था।

लेकिन परिवारों के टूटने का कारण प्रायः बाहरी व्यक्ति नहीं बनता।

अंदर ही अंदर दो अदृश्य शक्तियाँ काम करती रहती हैं —

मोह

और

अहंकार


मोह : सबसे मीठा जहर

रामचरितमानस में बार-बार "मोह" को मनुष्य का बंधन बताया गया है।

मोह का अर्थ केवल स्त्री या पुरुष के प्रति आकर्षण नहीं है।

मोह हो सकता है —

  • पुत्र मोह
  • धन मोह
  • पद मोह
  • प्रतिष्ठा मोह
  • जाति मोह
  • परिवार मोह
  • विचारधारा मोह

मोह की विशेषता है कि वह विवेक छीन लेता है।

व्यक्ति वही देखता है जो देखना चाहता है।

सत्य नहीं।


अहंकार : रावण का असली सिर

रावण के दस सिर प्रतीक हैं।

उनमें सबसे बड़ा सिर अहंकार का है।

जब व्यक्ति सोचने लगता है —

  • मैं ही सही हूँ।
  • मेरी ही चलेगी।
  • मेरे अनुभव से बड़ा कोई नहीं।
  • मेरे बिना कुछ नहीं हो सकता।

तब विनाश शुरू हो जाता है।

रावण को राम ने नहीं हराया।

रावण को पहले उसके अहंकार ने हराया।


घरों में लगी आग

"मोह और अहंकार आग लगाते चले गए..."

आज अधिकांश परिवार किसी बाहरी शत्रु से नहीं टूटते।

वे टूटते हैं —

  • अहंकार से,
  • तुलना से,
  • अधिकार भावना से,
  • अपेक्षाओं से,
  • और मोह से।

लोग वर्षों तक एक-दूसरे से बात नहीं करते।

जमीन के टुकड़े रिश्तों से बड़े हो जाते हैं।

विरासत प्रेम से बड़ी हो जाती है।

और फिर हर कोई स्वयं को पीड़ित घोषित कर देता है।


हनुमान जी किसका वध करते हैं?

हनुमान जी ने केवल राक्षसों का वध नहीं किया।

वे मनुष्य के भीतर के राक्षसों को पहचानने की प्रेरणा देते हैं।

हनुमान चालीसा में तुलसीदास लिखते हैं —

"भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै"

इन भूत-पिशाचों को केवल अलौकिक जीव मत समझिए।

आज के भूत-पिशाच हैं —

  • क्रोध
  • ईर्ष्या
  • लोभ
  • मोह
  • अहंकार
  • असुरक्षा
  • प्रतिशोध

यही मनुष्य की शांति खा जाते हैं।


चौराहे पर किसे लटकाना है?

कई लोग समझते हैं कि उनका दुख किसी व्यक्ति के कारण है।

लेकिन संतों की दृष्टि अलग है।

चौराहे पर यदि किसी को लटकाना है तो —

  • मोह को लटकाओ।
  • अहंकार को लटकाओ।
  • कुमति को लटकाओ।
  • द्वेष को लटकाओ।

व्यक्ति बदल जाएगा।

नाम बदल जाएगा।

पर यदि विकार नहीं बदले तो कहानी फिर वही होगी।


तुलसीदास का अंतिम संदेश

हनुमान चालीसा केवल संकटमोचन स्तोत्र नहीं है।

वह मनुष्य के मन का मानचित्र है।

तुलसीदास हमें बताते हैं —

समस्या बाहर कम है, भीतर अधिक है।

राम बाहर नहीं मिलेंगे जब तक रावण भीतर बैठा है।

हनुमान बाहर नहीं आएंगे जब तक साहस भीतर नहीं जागता।

और शांति बाहर नहीं मिलेगी जब तक मोह और अहंकार का राज्य समाप्त नहीं होता।


निष्कर्ष

पिछले कई दशकों में मैंने मंदिर टूटते देखे।

मस्जिदों पर विवाद देखे।

सरकारें बदलते देखीं।

परिवार टूटते देखे।

रिश्ते बिखरते देखे।

लेकिन हर घटना के पीछे दो पुराने खिलाड़ी दिखाई दिए —

मोह और अहंकार।

शायद इसलिए तुलसीदास ने समाधान भी बहुत सरल बताया —

"कुमति निवार सुमति के संगी"

यदि सुमति आ जाए,

तो परिवार बच सकते हैं।

समाज बच सकता है।

और शायद मनुष्य स्वयं भी बच सकता है।

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर।

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