जै माँ आनंदमयी?
स्मरण, भक्ति और हमारी बेचैन आँखें
चित्र में एक साध्वी स्वरूप महिला दिखाई देती हैं।
नीचे लिखा है:
"Remember God, remember God, day after day, hour after hour, remember God."
पहली दृष्टि में यह एक साधारण आध्यात्मिक संदेश लगता है।
लेकिन मेरे मन में एक दूसरा प्रश्न उठता है।
क्या केवल भगवान को याद करना पर्याप्त है?
यदि कोई दिन-रात भगवान को याद करता रहे,
तो क्या उसका अहंकार समाप्त हो जाएगा?
क्या उसकी ईर्ष्या समाप्त हो जाएगी?
क्या उसका भय समाप्त हो जाएगा?
क्या उसका मोह समाप्त हो जाएगा?
यही वह प्रश्न है जिसे कबीर बार-बार उठाते हैं।
"क्या कहा, मोदी जी की वीडियो दिखाऊँ?"
आज का युग बड़ा विचित्र है।
पहले लोग संतों के पीछे भागते थे।
फिर नेताओं के पीछे।
फिर बाबाओं के पीछे।
फिर यूट्यूब चैनलों के पीछे।
अब हर कोई किसी न किसी वीडियो का भक्त है।
किसी का ईश्वर टीवी में है।
किसी का मोबाइल में।
किसी का नेता में।
किसी का बाबा में।
और कोई कहता है:
"आओ, मोदी जी की वीडियो दिखाऊँ।"
मेरा उत्तर है:
"मुझे क्या वो समझ रखा है?"
यदि आध्यात्म का अर्थ केवल किसी व्यक्ति की प्रशंसा सुनना है,
तो फिर आत्मदर्शन कहाँ हुआ?
पीछे बैठी बहनों को क्या परेशानी है?
यह प्रश्न व्यंग्यात्मक भी है और गंभीर भी।
अक्सर आध्यात्मिक सभाओं में लोग सामने गुरु को देख रहे होते हैं,
पर उनका मन कहीं और होता है।
कोई तुलना कर रहा है।
कोई मान-सम्मान खोज रहा है।
कोई मान्यता चाहता है।
कोई चमत्कार।
कोई समाधान।
कोई सांत्वना।
और कोई केवल भीड़ का हिस्सा है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं कि सामने कौन बैठा है।
प्रश्न यह है:
पीछे बैठा मन कहाँ बैठा है?
स्मरण और सम्मोहन में अंतर
भगवान का स्मरण एक बात है।
किसी व्यक्ति, संगठन, विचारधारा या नेता के सम्मोहन में पड़ जाना दूसरी बात।
स्मरण आपको भीतर ले जाता है।
सम्मोहन आपको किसी और के पीछे लगा देता है।
स्मरण स्वतंत्र बनाता है।
सम्मोहन अनुयायी बनाता है।
कबीर की कसौटी
कबीर शायद पूछते:
राम को याद किया या केवल राम का नाम?
सत्य को जिया या केवल उसका प्रचार किया?
भीतर उतरे या केवल किसी की तस्वीर देखी?
निष्कर्ष
साधना का उद्देश्य किसी चेहरे में खो जाना नहीं है।
न किसी नेता में।
न किसी बाबा में।
न किसी गुरु में।
साधना का उद्देश्य स्वयं को पहचानना है।
यदि दिन-रात भगवान को याद करने से:
- अहंकार कम हो,
- मोह कम हो,
- भय कम हो,
- और करुणा बढ़े,
तो स्मरण सार्थक है।
अन्यथा हम केवल चेहरे बदलते रहेंगे,
और मन की बेचैनी वही रहेगी।
जै माँ आनंदमयी।
और साथ ही—
जरा अपने मन को भी देखो,
वह किसकी वीडियो देखना चाहता है, और क्यों?

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