प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगे?
(एक पापी, एक प्रेमी और अपने प्रभु के बीच संवाद)
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प्यार मुझसे जो किया तुमने, तो क्या पाओगे?
टूटा हुआ इक मन,
भटका हुआ जीवन,
और कर्मों के जंगल में
रास्ता खोजता एक मुसाफ़िर।
क्या देखते हो प्रभु?
सूरत मेरी?
इस पर तो समय की धूल जमी है।
बाल सफ़ेद हैं,
चेहरे पर यात्राओं के निशान हैं,
और आँखों में
कुछ अधूरे सपनों की राख।
या फिर देखते हो
सीरत मेरी?
उसे तो मैं स्वयं नहीं समझ पाया।
कभी राम का नाम लिया,
कभी संसार के पीछे भागा।
कभी प्रेम को पूजा समझ बैठा,
कभी मोह को प्रेम।
प्रभु,
सच-सच बताना...
मुझसे कभी पाप हो सकता है?
जब भी कुछ पाया,
उसमें मेरा अहंकार शामिल था।
जब भी कुछ खोया,
उसमें मेरी मूर्खता शामिल थी।
जब भी प्रेम किया,
उसमें स्वार्थ का थोड़ा रंग था।
जब भी त्याग किया,
उसमें प्रशंसा की थोड़ी चाह थी।
तो फिर यह कौन सा जीव है
जो स्वयं को सज्जन समझता फिरता है?
और कौन सा भगवान है
जो फिर भी उसे छोड़ता नहीं?
कभी-कभी लगता है,
तुम्हारी सबसे बड़ी लीला
क्षमा है।
वरना मेरे जैसे लोग
कब के हिसाब-किताब में फँस चुके होते।
मैंने मंदिर भी देखे।
मस्जिद भी देखी।
तीर्थ भी देखे।
राजनीति भी देखी।
ज्ञान भी देखा।
अज्ञान भी देखा।
लेकिन अंत में पाया कि
सबसे कठिन यात्रा
अपने भीतर उतरने की है।
इसलिए आज
तुमसे मोक्ष नहीं माँगता।
स्वर्ग नहीं माँगता।
सिद्धि नहीं माँगता।
बस इतना पूछता हूँ—
यदि मैं इतना ही अपूर्ण हूँ,
तो फिर
प्यार मुझसे जो किया तुमने, तो क्या पाओगे?
और कहीं भीतर से
धीरे-धीरे आवाज़ आती है—
"अरे मूर्ख,
मैं तेरे गुणों से प्रेम नहीं करता।
मैं तो तुझसे प्रेम करता हूँ।
तेरे पापों को जानकर भी,
तेरी मूर्खताओं को देखकर भी,
तेरी बार-बार की भूलों के बाद भी।
क्योंकि तू अभी पूरा नहीं हुआ,
इसलिए तो मेरा है।"
तब सिर झुक जाता है।
और मन कहता है—
**प्रभु,
सूरत भी तुम्हारी,
सीरत भी तुम्हारी।
पाप भी तुम्हारे सामने,
और क्षमा भी तुम्हारी।
अब जो हूँ,
जैसा हूँ,
तेरे हवाले।**
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