कर्मक्षेत्रे युद्धक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः
— गीता, कुरुक्षेत्र और मेरे जीवन का कर्म
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः
(भगवद्गीता 1.1)
जब जीवन हमें ऐसे स्थान पर ला खड़ा करता है जहाँ
कर्तव्य, संघर्ष और विवेक आमने-सामने खड़े हों —
वह स्थान केवल युद्धभूमि नहीं रहता,
वह कर्मक्षेत्र बन जाता है।
मेरे जीवन का अधिकांश समय ऐसे ही कर्मक्षेत्रों में बीता है —
जहाँ कोई तलवार नहीं थी,
पर निर्णय जीवन, सुरक्षा और सत्य को प्रभावित करते थे।
यह लेख मेरे बच्चों के लिए है —
ताकि वे समझ सकें कि
कर्तव्य, सत्य और सीमा का संतुलन
गीता वास्तव में कैसे सिखाती है।
1. कर्मक्षेत्र क्या है?
गीता में कर्मक्षेत्र केवल कुरुक्षेत्र नहीं है।
कर्मक्षेत्र वह हर स्थान है जहाँ:
- तुम्हें जिम्मेदारी दी जाती है
- निर्णय के परिणाम दूसरों पर पड़ते हैं
- सत्य बोलने की कीमत चुकानी पड़ती है
मेरे लिए कर्मक्षेत्र थे:
- प्रोजेक्ट
- संगठन
- तकनीकी निर्णय
- जोखिम और सुरक्षा से जुड़े प्रश्न
मैंने इन्हें कभी “नौकरी” नहीं माना।
मैंने इन्हें ईश्वर का दिया हुआ अवसर माना।
2. अर्जुन युद्ध चुनता नहीं है
एक बड़ा भ्रम यह है कि अर्जुन ने युद्ध चुना।
नहीं।
अर्जुन युद्ध में खड़ा पाया गया।
युद्ध उसके सामने आया।
जैसे:
- हम नौकरी चुनते नहीं, नौकरी हमारे पास आती है
- परिस्थितियाँ चुनी नहीं जातीं, वे मिलती हैं
यही कारण है कि मैं हर काम को
“भगवान की दी हुई जिम्मेदारी” मानता रहा।
3. कृष्ण ने अर्जुन से यह नहीं कहा: “युद्ध मत करो”
अर्जुन का संकट युद्ध नहीं था।
अर्जुन का संकट था भ्रम।
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ
(गीता 2.3)
कृष्ण ने अर्जुन से यह नहीं कहा कि:
- भाग जाओ
- संन्यास ले लो
- जिम्मेदारी छोड़ दो
उन्होंने कहा:
मोह छोड़ो, विवेक अपनाओ।
4. रथ कौन चला रहा था?
यह प्रश्न मेरे लिए निर्णायक रहा।
कृष्ण रथ चला रहे थे।
अर्जुन युद्ध लड़ रहा था।
इसका अर्थ यह नहीं कि:
- कृष्ण कर्म कर रहे थे
- अर्जुन निष्क्रिय था
इसका अर्थ यह है कि:
- दिशा कृष्ण दे रहे थे
- निर्णय अर्जुन ले रहा था
रथ = जीवन
लगाम = बुद्धि
सारथी = विवेक से जुड़ा ईश्वर-बोध
5. सत्याग्रह क्या हर जगह एक-सा होता है?
नहीं।
कौरव और पांडव दोनों ने युद्ध किया,
पर दोनों का युद्ध एक-सा नहीं था।
कौरवों का युद्ध:
- सत्ता बचाने के लिए
- उत्तरदायित्व नीचे धकेलने के लिए
- प्रक्रिया को ढाल बनाकर
पांडवों का युद्ध:
- कर्तव्य के लिए
- सत्य को स्पष्ट रखने के लिए
- फल की आसक्ति छोड़े हुए
युद्ध बाहर से समान दिखता है,
पर अंतर भीतर होता है।
6. सत्याग्रह का सबसे कठिन रूप
गीता यह नहीं सिखाती कि:
“हर जगह, हर समय, जलते रहो।”
गीता यह सिखाती है:
योगः कर्मसु कौशलम्
(गीता 2.50)
योग = कुशलता
कुशलता = यह जानना कि:
- कब बोलना है
- कब लिखना है
- कब रुकना है
- और कब हट जाना है
सबसे कठिन सत्याग्रह कभी-कभी यह होता है:
सत्य बोलकर स्वयं को उस भूमिका से अलग कर लेना।
7. कर्तव्य कभी गलत नहीं होता — पर उसकी सीमा होती है
मैंने कभी:
- जिम्मेदारी से भागने की कोशिश नहीं की
- सत्य छुपाया नहीं
- जोखिम को अनदेखा नहीं किया
लेकिन गीता यह सिखाती है कि:
कर्तव्य निभाने वाला भी मनुष्य है।
उसकी देह है, उसका चित्त है, उसकी सीमा है।
कर्तव्य तब बोझ बनता है जब:
- अधिकार नहीं होता
- निर्णय नहीं सुने जाते
- सत्य केवल दस्तावेज़ बनकर रह जाता है
8. क्या भगवान सत्याग्रही की मदद नहीं करते?
यह सबसे निजी प्रश्न है।
भगवान मदद करते हैं —
पर हमारी जगह कर्म नहीं करते।
भगवान:
- भ्रम साफ़ करते हैं
- विवेक जगाते हैं
- यह दिखाते हैं कि कौन-सा युद्ध हमारा है
और कौन-सा नहीं
अगर भगवान साथ न होते,
तो यह प्रश्न भी न उठता।
9. मेरे बच्चों के लिए अंतिम संदेश
अगर तुम यह पढ़ रहे हो,
तो यह समझो:
- हर नौकरी ईश्वर का अवसर हो सकती है
- पर हर भूमिका स्थायी नहीं होती
- सत्य बोलना कर्तव्य है
- पर स्वयं को तोड़ देना धर्म नहीं
स्वधर्मे निधनं श्रेयः
(गीता 3.35)
स्वधर्म में कठिनाई भी श्रेष्ठ है —
पर स्वधर्म का अर्थ यह नहीं कि
तुम अपनी बुद्धि, स्वास्थ्य और विवेक को
त्याग दो।
10. निष्कर्ष
मैंने कभी युद्ध से भागने की कोशिश नहीं की।
मैंने केवल यह सीखा कि:
हर युद्ध कुरुक्षेत्र नहीं होता।
और हर कुरुक्षेत्र में
अनंत काल तक रुकना धर्म नहीं।
यही गीता है।
यही मेरा जीवन-अनुभव है।
और यही मेरी विरासत है।
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