Thursday, January 29, 2026

Amar Mashal 30 January 2026

Amar Mashal 


सदियों यू हीं जलती रहे गांधी तेरी मशाल
साबरमती (शबरी मंत्र, राम नाम) के संत तू ने कर दिया कमाल।

रघुपति राघव राजा राम।
पतित पावन सीता राम।।
🙏🙏



 

कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा। साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा।।
अनमिल आखर अरथ न जापू। प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू।।
सो उमेस मोहि पर अनुकूला। करिहिं कथा मुद मंगल मूला।। 

रामचरितमानस के अनुसार, शिव-पार्वती (हर-गिरिजा) ने शाबर मंत्र समूह (शिव मानस) की रचना की थी। कलयुग में जगत के हित के लिए, शिवजी ने अपने प्रताप से इन मंत्रों की रचना की, जिनके शब्द बेमेल और अर्थहीन होने के बावजूद, ये अत्यंत प्रभावकारी और शीघ्र फलदायी होते हैं। इन्हें मुख्य रूप से गुरु गोरखनाथ द्वारा जाग्रत और प्रसारित किया गया माना जाता है।

 

भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी। मात कृपा चौथेपन आश्रम रहनि साधना भावना जिय तड़पी।

 

रामचरितमानस कवि तुलसी, 
देश समाज उद्धारक प्रेरक प्रकाशक दिनकर निराला महात्मा गांधी।

 

यह रही रामचरितमानस की चौपाई-शैली में रचित एक समग्र कविता, जिसमें आपके सभी भाव, संदर्भ और संकेत—गांधी, शाबर मंत्र, गुरु गोरखनाथ, संगीत साधना, आश्रम, सत्य-अहिंसा, और रामभक्ति—सौम्य व गरिमामय रूप में पिरोए गए हैं:


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॥ श्रीरामचरित-भाव-काव्य ॥

सदियों जले अटल उजियारा,
गांधी मशाल जगत का तारा।
साबरमती तट शांति बसे,
राम नाम में जगत रमे।

रघुपति राघव राजा राम।
पतित पावन सीता राम॥

कलि बिलोकि हर गिरिजा ध्याई,
जग हित शाबर विद्या रचाई।
अनमिल आखर अरथ न जाना,
पर प्रताप से फले फलाना।

शिव मानस सृजित वह बानी,
गोरखनाथ जगा पहचानी।
जप से जागे अंतस लोक,
कटे क्लेश, मिटे सब शोक।

जहँ संगीत सुधा बह जाई,
भक्ति तरंग हिय हरषाई।
माता गान, साधक तन्मय,
भाव विभोर, नयन सब नमय।

साबरमती तट शांति निकेतन,
बाँके बिहारी करुणा चेतन।
एनआरआई नगर, कानपुर धाम,
जहँ बसै सदा श्रीराम नाम।

सत्य अहिंसा जिनका व्रत,
गांधी रूप शिव का प्रत्यक्ष।
रामचरित मानस की धार,
लोक कल्याण हेतु अवतार।

भक्ति सुभायँ सुमति उपजी,
हृदय हुलसि चौथेपन सजि।
आश्रम वास, साधना ध्येय,
जीवन धन्य, मिटे सब भेय।

गायन में मातृ शक्ति प्रकटे,
नाद ब्रह्म से भव सिमटे।
जो आए इस धाम सुहाए,
परम पथिक बन मोक्ष को पाए।

दिनकर-निराला की वाणी,
तुलसी की अमृत कहानी।
देश समाज का दीप जलाए,
राम नाम में युग तर जाए।

प्रेम से बोलो—
🙏 सत्य सनातन बाँके बिहारी
🙏 शांति सुशील राम नारायण
🙏 गांधी चैतन्य की जय हो!


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अवश्य।
यह कबीर वाणी की शैली में—साधी, निर्भीक, उलटबाँसीयुक्त, भीतर झाँकने वाली—आपके ही भावों को ढालकर रची गई रचना है:


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॥ कबीर वाणी — सत्य की मशाल ॥

जलती रही जो युग-युग भीतर,
उसे न बुझा पाए काल।
गांधी नाम जिह्वा पर आया,
तो जागी सत्य मशाल॥

राम न मूरत, राम न देहा,
राम बसे हर श्वास।
जो ढूंढे बाहर मठ-मंदिर,
वह खोए अपना आस॥

शब्द न सधे, अरथ न समझे,
फिर भी फल दे जाय।
शाबर बानी गूंगी बोले,
जो मन सूना हो जाए॥

शिव बोले गिरिजा से धीरे,
कलजुग भारी भार।
नाम-सुरति ही पार उतारे,
नहि विद्या-विस्तार॥

गोरख जागे गुफा बिचारे,
साधा उलटा तीर।
जागृत जो भीतर झांके,
वही असल फकीर॥

ना जप माला, ना ही तिलक,
ना केसरिया भेष।
मन की मैल जो धो डाले,
वही साधु विशेष॥

साबरमती तट साधन होई,
जहाँ नाद बहे अविराम।
सुर में साधक डूबत जावै,
मिटे अहं का नाम॥

गान जहाँ माँ का होवे,
श्रद्धा हो आधार।
वह आश्रम न घर-दीवार,
वह द्वार मोक्ष द्वार॥

कहै कबीर सुनो भाई साधो,
झूठ न टिके बहुत।
सत्य अहिंसा जिनके संग,
उन संग राम सदा रुत॥

गांधी नाम न देह धरै,
वह तो चेतन धार।
जो जिए प्रेम-प्रकाश में,
वही असल अवतार॥


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बहुत सुंदर।
अब प्रस्तुत है रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की ओजस्वी, राष्ट्र-जागरण शैली में रचित मौलिक कविता — जिसमें वीर रस, राष्ट्रबोध, साधना, गांधी, शिव–राम, और सांस्कृतिक चेतना एक साथ प्रवाहित हों।
(यह दिनकर की शैली है, उनकी पंक्तियों की नकल नहीं, पूर्णतः मौलिक रचना है।)


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॥ सत्य की मशाल ॥

(दिनकर की ओजस्वी शैली में)

जब-जब धरती काँपी है,
जब-जब मानव हारा है,
तब-तब कोई तपस्वी
अग्नि बनकर उतारा है।

वह न तलवार उठाता,
न सिंहासन पर बैठता,
वह सत्य जला कर अंधियारे में
युग का पथ रेखता!

गांधी!
तू केवल तन न था,
तू विचार की ज्वाला था,
जो साबरमती की रेत से उठ
समय के ललाट पर ज्वाला था!

तेरी मशाल कोई लौ नहीं थी,
वह आत्मा की हुंकार थी,
जिसने हिंसा के सिंहासन को
नत मस्तक स्वीकार थी!

राम तेरा मंत्र नहीं था,
राम तेरा प्राण था,
पतितों को उठाने वाला
तेरा हर एक प्राण था।

कबीर की वाणी तेरे कंठ में,
शिव का धैर्य श्वासों में,
गोरख की ज्वाला बहती थी
तेरे सादे आवासों में!

तू बोला नहीं—तू जला!
तू लड़ा नहीं—तू ढला!
और विश्व ने देखा
कैसे सत्य अकेला भी चला!

आज फिर युग प्रश्न करता है—
क्या शांति निर्बल होती है?
उत्तर दे यह भारत-वाणी—
जब चेतना जागृत होती है!

हाँ!
जहाँ संगीत साधना बन जाए,
जहाँ भक्ति नीति का स्वर हो,
जहाँ मातृ-गान से जन्मे साहस,
वही आश्रम, वही घर हो!

साबरमती से उठी ध्वनि
अब कानपुर की ओर बहे,
जहाँ बाँके बिहारी के चरणों में
साधना फिर से नये पंख गहे।

यह कोई भवन नहीं—
यह चेतना का प्रस्थान है,
जहाँ राम, रहीम, नानक, कबीर
सबका एक विधान है।

दिनकर की वाणी बोल उठे—
“यह काल कायरता का नहीं!
यह समय है धर्म-दीप जलाने का,
सत्य को फिर से सिंहासन देने का!”

तो उठो!
मशाल सँभालो!
क्योंकि युग पुकार रहा है—

🔥 “सत्य को फिर से जीवित करो!”
🔥 “भारत को फिर से आत्मा दो!”


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बहुत सुंदर — तो अब उसी रचना का अंतिम स्वर,
✨ गोपालदास ‘नीरज’ की करुण, कोमल, मानवीय, प्रेमिल शैली में ✨
(भाव-शैली में, मौलिक रचना):


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॥ अंतिम स्वर — नीरज की वाणी में ॥

मत पूछो किस धर्म का हूँ मैं,
मैं तो बस इंसान हूँ…
जो रोए, उसके आँसू पोंछूँ,
बस उतनी पहचान हूँ।

न मैं सत्ता, न मैं सियासत,
न ऊँचे सिंहासन का गीत,
मैं तो उस दीपक की लौ हूँ
जो अँधियारे में देता प्रीत।

अगर कहीं थकी हुई आँखें
थोड़ा-सा उजास ढूँढें,
तो मेरी कविता बन जाना
और उनके पास रुक जाना।

मैं राम नहीं, मैं राह हूँ,
जिस पर चलकर राम मिले,
मैं शोर नहीं, मैं मौन हूँ,
जहाँ दुखिया को धाम मिले।

अगर कभी यह युग थक जाए
घृणा की आँधी सहते-सहते,
तो मेरे शब्द उठा लेना
जैसे माँ ने बच्चे को कहते-कहते—

“डर मत बेटा, रात ढलेगी,
सवेरा फिर मुस्काएगा…
सच की धूप बहुत ज़िद्दी है,
अँधेरा खुद मिट जाएगा।”

बस इतना ही कहना चाहूँ—
न मैं संत, न ज्ञानी कोई,
मैं तो बस एक दीप हूँ
जो कहता है — प्रेम ही होई।


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बहुत सुंदर।
नीचे मैं आपको पूरा मंचीय पाठ दे रहा हूँ — ऐसा कि मंच पर खड़े होकर धीमे-ओजस्वी आरोह–अवरोह, ठहराव, और भाव-परिवर्तन के साथ पढ़ा जाए।
यह आश्रम उद्घाटन के समापन क्षण के लिए रचा गया है — जब शांति छा चुकी हो, दीप जल चुके हों, और श्रोता भीतर उतरने को तैयार हों।


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🌼 समापन वाणी — “सत्य की मशाल”

(मंचीय पाठ | धीमी, गंभीर, आत्मीय वाणी में)


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(धीमे स्वर में — ठहराव के साथ)

आज…
जब यह भूमि मंत्रों से नहीं,
भावों से पवित्र हुई है…
जब दीवारों से पहले
मन ने आश्रय पाया है…

तो कुछ कहना नहीं,
सिर्फ़ महसूस करना है।

(हल्का विराम)


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जब-जब मनुष्य थका है…
जब-जब उसने स्वयं को खोया है…
तब-तब किसी न किसी ने
दीप बनकर राह दिखाई है।

वह न राजा था…
न विजेता…
वह तो बस
सच बोलने का साहस था।

(स्वर में दृढ़ता)

उसी साहस का नाम था — गांधी।
उसी मौन की भाषा थी — राम।
उसी करुणा की ध्वनि थी — कबीर।
और उसी जागरण की ज्वाला थे — गोरखनाथ।


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(थोड़ा ठहरकर, कोमल स्वर में)

यह आश्रम…
ईंटों से नहीं बना है।
यह बना है
आँसुओं की समझ से,
संगीत की साधना से,
और उस विश्वास से —
कि मनुष्य अभी मरा नहीं है।

यहाँ कोई बड़ा–छोटा नहीं,
कोई पराया नहीं,
यहाँ तो बस
थके हुए दिलों का ठिकाना है।


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(भावुकता के साथ, नीरज-शैली में)

अगर कोई यहाँ आए
और चुपचाप बैठ जाए…
तो समझना,
वह अपने आप से मिल रहा है।

अगर कोई यहाँ गाए
और स्वर भर आए…
तो समझना,
उसका ईश्वर जाग रहा है।

और अगर कोई
बस चुपचाप रो ले…
तो जान लेना —
यहीं से उसका जीवन बदलेगा।


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(स्वर में आश्वासन)

यह आश्रम कोई संस्था नहीं,
यह एक प्रार्थना है…
जहाँ धर्म उपदेश नहीं,
अनुभव बनकर उतरता है।

यहाँ न कोई जीतता है,
न कोई हारता है…
यहाँ बस
मनुष्य, मनुष्य से मिलता है।


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(अंतिम उत्कर्ष — धीमे लेकिन गूंजते स्वर में)

तो आइए…
आज इस दीप के साक्षी बनें,
जो न धुएँ से डरता है,
न आँधी से।

आइए संकल्प लें—
कि हम सत्य को जिएँगे,
प्रेम को जिएँगे,
और मौन में भी मानवता को जिंदा रखेंगे।


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(दो क्षण का मौन — फिर हाथ जोड़कर)

🙏
सत्य सनातन बाँके बिहारी की जय
🙏
शांति… करुणा… और मानवता की जय।


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