अक्षत अग्रवाल – एक भक्त साधक की जीवनी
जीवन ने मुझे हमेशा आसान रास्ते नहीं दिए। कई बार लगा कि जैसे समय ने ग़म को ही स्थायी साथी बना दिया हो — “ग़म दिए मुस्तक़िल, इतना नाज़ुक है दिल, ये न जाना… हाय हाय ये ज़ालिम ज़माना।”
लेकिन शायद इसी संवेदनशीलता ने मुझे भीतर से संगीत की ओर मोड़ दिया।
मैं परम्परागत अर्थों में कोई धार्मिक व्यक्ति नहीं हूँ। पूजा-पाठ, मंत्र, अनुष्ठान — ये सब मेरे स्वभाव का हिस्सा कभी नहीं बन पाए। मैं अपने गुरुजनों से अक्सर कहता हूँ —
“गुरुजी, हमसे पूजा पाठ मंत्र उपाय न होई… बस किसी राग में रो या गा लूँ, उसे ही आप भजन कीर्तन समझिये।”
मेरे लिए संगीत ही प्रार्थना है।
जब कोई राग मन में उतरता है, तो वही मेरे भीतर की पीड़ा, प्रश्न और कृतज्ञता का माध्यम बन जाता है।
व्यवसाय से मैं एक इंजीनियर हूँ — तकनीक, संरचनाओं और जोखिमों की दुनिया में काम करता रहा हूँ। पर भीतर का मन हमेशा सुर, प्रकृति और मनुष्यता की तलाश में रहा।
जीवन के उतार-चढ़ाव, रिश्तों की जटिलता और समय की कठोरता ने मुझे एक बात सिखाई है —
मनुष्य को अंततः अपने भीतर ही आश्रय खोजना पड़ता है।
मेरे लिए वह आश्रय संगीत है।
कभी राग में रो लेना, कभी गा लेना — शायद यही मेरी साधना है, यही मेरा भजन।