Tuesday, September 29, 2026

पंडित जी, मेरी पत्री तो देखिए! एक व्यंग्यात्मक कविता

 पंडित जी, मेरी पत्री तो देखिए!

एक व्यंग्यात्मक कविता

कलाकार वही सच्चा कलाकार,
जिसके सुर में सत्य बहे,
झूठ की महफ़िल छोड़ सके,
और सच के संग अकेला रहे।

रफ़ी साहब ने यही कहा था,
महेंद्र कपूर ने भी माना—

कला सिर्फ़ गले की तान नहीं,
कला है मन को इंसान बनाना।

सत्संग करो, कुसंग छोड़ो,
झूठ से अपना नाता तोड़ो,
वाणी में मधुरता रखो,
मन में करुणा, अहंकार को छोड़ो।

न किसी से झगड़ा करना,
न तर्क-वितर्क में आग लगाना,
अहिंसा केवल हाथ न उठाना नहीं,
मन से भी किसी को न गिराना।

वाह बापू!
क्या सरल था आपका विधान—
सत्य बोलो, प्रेम करो,
और रखो निर्मल अपना मन-प्राण।

पर हे प्रभु,
एक छोटी-सी समस्या है...

आप जिनसे दूर रहने को कहते हैं,
उनमें से कुछ तो
मेरे अपने घर के ही हैं!

कुछ सत्य से नाराज़,
कुछ धर्म के ठेकेदार,
कुछ महात्मा के नाम पर
तुरंत तलवार निकालने को तैयार।

कोई कहता—
“हम ही राष्ट्र हैं!”

दूसरा बोला—
“हम ही धर्म हैं!”

तीसरा गरजा—
“गांधी का नाम मत लेना!”

और चौथा बोला—
“सत्य वही है
जो मेरे पक्ष में हो!”

मैंने हाथ जोड़कर कहा—

हे प्रभु!
आप तो कहते हैं—
कुसंग छोड़ दो।

पर प्रभु,
ये तो रिश्तेदार हैं!

इन्हें छोड़ूँ तो
परिवार कहेगा—
“बड़ा आया सत्यवादी!”

इनसे बहस करूँ तो
आप कहते हैं—
“अहिंसा रखो।”

चुप रहूँ तो
अंतरात्मा पूछती है—
“सत्य कहाँ गया?”

और सच बोल दूँ तो
घर की पंचायत कहती है—
“तुम्हें परिवार की इज़्ज़त की कोई चिंता नहीं!”

तभी मैंने सोचा—

चलो पंडित जी से पूछते हैं,
आख़िर पत्री में सब लिखा होता है।

**“पंडित जी पधारें,
स्वागत है आपका।
सत्य पर ही दुनिया टिकी है—
यही समझकर मेरी पत्री देखें
और बताइए...

मैंने कौन-कौन से पाप किए?”**

पंडित जी ने कुंडली खोली,
चश्मा थोड़ा ऊपर चढ़ाया,
ग्रह देखे, नक्षत्र देखे,
फिर माथे पर हाथ लगाया।

मैंने पूछा—
“क्या हुआ पंडित जी?”

पंडित जी बोले—

“बेटा...
ये पाप-पुण्य का सवाल नहीं,
ये तो पापी पेट का सवाल है!”

“अगर यजमान के मुँह पर
सच बोल दिया,

तो यजमान
लात मारकर बाहर निकाल देगा!”

मैंने कहा—
“पर पंडित जी,
सत्य तो सनातन है!”

बोले—

“बिल्कुल है बेटा,
इसीलिए तो
मैं उसे मन ही मन मानता हूँ।”

“मुँह से बोलना
व्यावहारिक नहीं है!”

मैंने पूछा—
“और अहिंसा?”

पंडित जी बोले—

“वह भी बहुत अच्छी चीज़ है...

जब तक सामने वाला
दक्षिणा देने वाला हो!”

मैं बोला—
“तो सत्संग?”

पंडित जी हँसे—

“सत्संग करो बेटा,
पर ध्यान रखना—

सत्संग में वही सत्य बोलना
जिससे संग न टूटे!”

फिर धीरे से बोले—

“और यदि कभी
सचमुच सत्य बोलने का मन करे,

तो पहले देख लेना
कि सामने वाला
यजमान है या परिवार का मुखिया!”

मैंने पूछा—

“पंडित जी,
फिर गांधीजी की सीख का क्या?”

पंडित जी ने कुंडली बंद की,
दक्षिणा जेब में रखी,
और जाते-जाते बोले—

**“बेटा, गांधीजी सत्य पर चले थे,
इसलिए महात्मा कहलाए।

हम तो आजकल
सत्य के साथ भी
‘डिस्क्लेमर’ लगाकर चलते हैं!”**

और मैं सोचता रह गया—

सत्य अभी भी जीवित है,
अहिंसा भी जीवित है,
सत्संग की भी कमी नहीं...

बस एक छोटी-सी दिक्कत है—

सत्य बोलने वाला अकेला है,
और सत्य सुनने वालों की
संख्या बहुत कम है।

बाकी सबके पास
अपनी-अपनी पत्री है,
अपना-अपना धर्म है,
अपना-अपना राष्ट्र है—

और सबसे बड़ी बात—

अपना-अपना सत्य है!

हे प्रभु,
अब आप ही बताइए—

ऐसे में पंडित जी की गलती क्या है?
वह भी तो
इसी परिवार का सदस्य है!

 

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Characteristics of a true artist - what MD Rafi and Mahendra Kapoor said on the death anniversary of Mahatma ! 


- सत्संग, reject the company of bad people or falsehood, stick to truth 
- humble and compassionate
- ahinsak - never to quarrel or argue with anyone

(हे प्रभु, एक ही विनती है, जिन्हें आप छोड़ने को कह रहे हैं, उनमें से anti -national, anti -dharma, anti- MAHATMA, बहुत से घर वाले, सामने लड़ने को आतुर खड़े हैं।)

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