Friday, September 11, 2026

उर्दू जुबान की कसक और गंगा जमुना तहजीब

 

जिसको उर्दू ज़बान की कसक नहीं,
और सुर लगाने की समझ नहीं—
वो क्या जाने गंगा-जमुनी तहज़ीब का वो दौर,
जो फ़िल्मी दुनिया में 1950 से 1970 के दशक तक
दिलों पर राज करता रहा।

वो दौर था जब शायरी सिर्फ़ गीत नहीं होती थी,
और संगीत सिर्फ़ धुन नहीं होता था।

अल्फ़ाज़ में अदब था,
सुरों में तहज़ीब थी,
और आवाज़ में एक ऐसी कशिश—
जो सीधे दिल तक उतर जाती थी।

साहिर लुधियानवी,
शकील बदायूँनी,
हसरत जयपुरी,
मजरूह सुल्तानपुरी,
शैलेन्द्र,
गोपालदास ‘नीरज’
और आगे चलकर जावेद अख़्तर—

इन शायरों ने फ़िल्मी गीत को महज़ मनोरंजन नहीं रहने दिया;
उसे हिंदुस्तानी ज़बान, शायरी और एहसास का दस्तावेज़ बना दिया।

कहीं उर्दू की नफ़ासत थी,
कहीं ब्रज की मिठास,
कहीं अवधी की मिट्टी की ख़ुशबू,
कहीं हिंदी का दर्शन—
और इन सबको बाँधती थी सुर की एक साझा ज़बान।

इसीलिए उस दौर का गीत सुनते हुए
यह पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी कि
शब्द हिंदी के हैं या उर्दू के।

यह भी पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी—

ईश्वर है या अल्लाह है?
प्रेम है या इश्क़ है?
मोहब्बत है या मोह है?
बुत है या भगवान है?

दिल बस इतना जानता था—

ये अपना है।

क्योंकि जहाँ सुर मिल जाएँ,
वहाँ शब्दों की सरहदें मिट जाती हैं।

साहिर के अल्फ़ाज़ हों,
शकील की रवानी,
हसरत का इश्क़,
मजरूह की बग़ावत,
शैलेन्द्र की सादगी
या नीरज का दार्शनिक सौंदर्य—

यह सब मिलकर उस हिंदुस्तानी तहज़ीब की तस्वीर बनाते थे
जहाँ भाषा दीवार नहीं थी,
पुल थी।

और उस पुल के एक सिरे पर था शब्द,
दूसरे पर सुर,
और बीच में था—
इंसान।

यही तो थी गंगा-जमुनी तहज़ीब
जहाँ मोहब्बत भी अपनी थी,
इश्क़ भी अपना था,
प्रेम भी अपना था,
और सुर भी साझा था।

वो उर्दू ज़बान का ख़ुमार था,
जो दिलों पर छाया रहा—
और सुर ऐसा था,
जिसमें पूरा हिंदुस्तान गाता रहा।

SSG

No comments:

Post a Comment