Monday, August 24, 2026

नाद ब्रह्म की पुनर्स्थापना

 

नाद ब्रह्म की पुनर्स्थापना

जब पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक कुसंस्कार हमें सत्य–प्रेम–करुणा के अनाहद नाद से दूर कर देते हैं

— SSG Supplementary Research Post

मेरे पिछले लेख में प्रश्न था कि परम्परा कब संस्कार से कुसंस्कार बन जाती है और कैसे परिवार स्वयं अपने विघटन का कारण बन सकता है।

उसी प्रश्न को यदि हम परिवार से आगे बढ़ाकर समाज, धर्म, राजनीति और संस्कृति तक ले जाएँ, तो एक और गहरा संकट दिखाई देता है।

समस्या केवल यह नहीं कि मनुष्य एक-दूसरे से लड़ रहे हैं।

समस्या यह है कि—

हमने सत्य को अपनी-अपनी पहचान में बाँट दिया है।

किसी के लिए सत्य परिवार की प्रतिष्ठा है।

किसी के लिए जाति।

किसी के लिए धर्म की रूढ़ व्याख्या।

किसी के लिए राजनीतिक विचारधारा।

किसी के लिए सम्प्रदाय।

किसी के लिए राष्ट्र।

और किसी के लिए अपनी व्यक्तिगत सत्ता।

लेकिन सत्य, प्रेम और करुणा—जो इन सभी सीमाओं से परे हैं—धीरे-धीरे हमारी सामूहिक चेतना से दूर होते जाते हैं।

यही वह जगह है जहाँ नाद ब्रह्म की अवधारणा को केवल संगीत की आध्यात्मिक भाषा न मानकर एक civilisation-level proposition की तरह देखना चाहिए।


1. कुसंस्कार का सबसे सूक्ष्म रूप — जब असत्य भी संस्कार जैसा लगने लगे

कुसंस्कार हमेशा हिंसा के रूप में नहीं आता।

वह बहुत बार आता है:

"हमारे यहाँ ऐसा ही होता है।"

फिर:

"हमारे समाज में ऐसा नहीं होता।"

फिर:

"हमारे धर्म में यह allowed नहीं है।"

फिर:

"हमारी संस्कृति खतरे में है।"

और अन्ततः:

"जो हमारी परम्परा को नहीं मानता, वह गलत है।"

यहीं से मनुष्य सत्य को खोजने के बजाय अपनी पहचान की रक्षा करने लगता है।

और जब identity truth से बड़ी हो जाती है, तो सत्य सुनाई देना बंद हो जाता है।


2. "धर्म खतरे में है" — या हमारी रूढ़ि?

आज के सार्वजनिक विमर्श में सबसे अधिक दोहराए जाने वाले वाक्यों में से एक है:

"धर्म खतरे में है।"

लेकिन एक बार रुककर पूछिए:

कौन-सा धर्म?

यदि धर्म का अर्थ है—

सत्य, प्रेम, करुणा, न्याय, आत्मसंयम, उत्तरदायित्व और लोकमंगल,

तो वह किसी के खान-पान, पहनावे, विवाह-पद्धति, जातिगत पहचान, रहन-सहन या पारिवारिक रीति-रिवाज़ से खतरे में नहीं है।

धर्म को बचाने के नाम पर अक्सर हम बचाते हैं:

  • रूढ़ि,
  • सामाजिक hierarchy,
  • inherited prejudice,
  • family honour,
  • ritual conformity,
  • और "हम बनाम वे" की मानसिकता।

यही वह bogus myth है जिसे तोड़ना आवश्यक है।

धर्म को रूढ़ि के बराबर कर देना धर्म का संरक्षण नहीं—धर्म का अवमूल्यन है।


3. और फिर संगीत कहाँ चला गया?

यहीं प्रश्न SSG के मूल उद्देश्य से जुड़ता है।

भारतीय संगीत की महान परम्परा में नाद केवल sound नहीं है।

स्वर केवल frequency नहीं है।

राग केवल scale नहीं है।

ताल केवल mathematics नहीं है।

संगीत मनुष्य को अपने भीतर सुनने की क्षमता देता है।

और भारतीय शास्त्रीय संगीत की परम्परा मूलतः oral रही है—गुरु के साथ वर्षों तक रहकर विद्यार्थी केवल compositions नहीं सीखता, बल्कि संगीत के साथ उससे जुड़े दार्शनिक और नैतिक संस्कार भी ग्रहण करता है। भारत सरकार की Sangeet Natak Akademi भी भारतीय शास्त्रीय संगीत की इसी दीर्घ oral guru–shishya transmission और उसके जीवन-परिवर्तनकारी dimension को रेखांकित करती है।

यहीं से नाद साधना और सामान्य musical training में अंतर शुरू होता है।


4. संगीत शिक्षा और नाद साधना एक चीज़ नहीं

किसी बच्चे को:

  • सरगम,
  • राग,
  • ताल,
  • बंदिश,
  • तान,
  • मींड,
  • layakari

सिखा देना आवश्यक है।

लेकिन इससे वह अभी नाद साधक नहीं बनता।

जिस प्रकार:

व्याकरण सीख लेने से कविता लिखना नहीं आ जाता,

उसी प्रकार:

राग सीख लेने से नाद सुनाई देना शुरू नहीं हो जाता।

और:

गायन सीख लेने से प्रेम नहीं आता।

नाद साधना का लक्ष्य केवल बेहतर performer बनाना नहीं।

उसका लक्ष्य है:

बेहतर listener बनाना।

और अन्ततः—

बेहतर human being बनाना।


5. अनाहद नाद — जहाँ "मैं" थोड़ा शांत होता है

"अनाहद नाद" की आध्यात्मिक अवधारणा को यदि हम सावधानी से समझें तो इसका अर्थ किसी भौतिक sound frequency का वैज्ञानिक दावा करना आवश्यक नहीं।

यह एक आध्यात्मिक रूपक भी है:

वह inner resonance जो बाहरी शोर के शांत होने पर अनुभव होता है।

और हमारे भीतर सबसे बड़ा शोर क्या है?

  • अहंकार,
  • भय,
  • लोभ,
  • ईर्ष्या,
  • पहचान,
  • prejudice,
  • resentment,
  • सत्ता की इच्छा,
  • और दूसरों के प्रति judgment।

जब यही शोर लगातार चलता रहे तो संगीत भी केवल entertainment बन जाता है।


6. कुसंस्कार नाद के रास्ते में कैसे आते हैं?

इसे एक सरल क्रम में देखें:

परिवार

"हमारे परिवार की इज्जत।"

समाज

"लोग क्या कहेंगे?"

जाति/समुदाय

"हमारे लोग ऐसे नहीं करते।"

धार्मिक रूढ़ि

"यही धर्म है।"

राजनीति

"जो हमारे साथ नहीं, वह हमारे विरुद्ध।"

व्यक्ति

"मैं ही सही हूँ।"

और अन्ततः:

सत्य की जगह पहचान बोलने लगती है।

नाद सुनने के लिए जिस openness की आवश्यकता है, वह समाप्त हो जाती है।


7. यही कारण है कि नाद साधना मूलतः anti-dogmatic है

सच्ची नाद साधना किसी particular social identity की property नहीं हो सकती।

नाद:

  • हिन्दू नहीं,
  • मुस्लिम नहीं,
  • सिख नहीं,
  • ईसाई नहीं,
  • ब्राह्मण नहीं,
  • क्षत्रिय नहीं,
  • भारतीय नहीं,
  • पश्चिमी नहीं।

ध्वनि पहले आती है, पहचान बाद में।

स्वर पहले है।

शब्द बाद में।

अनुभूति पहले है।

व्याख्या बाद में।

इसीलिए यदि संगीत सचमुच साधना है, तो वह मनुष्य को पहचान की दीवारों से परे ले जाने की क्षमता रखता है।


8. कबीर से लेकर सूफ़ी परम्परा तक

यही कारण है कि भारतीय उपमहाद्वीप की महान devotional traditions में बार-बार एक ही अंतर्ध्वनि सुनाई देती है।

कबीर का:

अनहद शब्द।

सिख परम्परा का:

अनहद नाद।

भक्ति की:

नाम-स्मरण।

सूफ़ी परम्परा की:

समा।

भारतीय संगीत की:

नाद-ब्रह्म।

इन सभी को एक ही धार्मिक doctrine कहना उचित नहीं होगा।

लेकिन इनमें एक साझा experiential impulse दिखाई देता है:

बाहरी पहचान से भीतर की अनुभूति की ओर यात्रा।

और यही SSG के लिए महत्वपूर्ण है।


9. इसलिए SSG किसी "धार्मिक संस्था" का विकल्प नहीं

Saraswati Sangeet Gurukul (SSG) का उद्देश्य किसी religion को replace करना नहीं होना चाहिए।

बल्कि—

संगीत के माध्यम से मनुष्य को अपनी सीमित पहचान से थोड़ा ऊपर उठने की साधना देना।

यहाँ:

हिन्दुस्तानी संगीत माध्यम है।

गुरु–शिष्य परम्परा methodology है।

नाद साधना inner discipline है।

और—

सत्य–प्रेम–करुणा उसका मानवीय फल होना चाहिए।


10. क्या नाद ब्रह्म साधना गुरु–शिष्य परम्परा से पुनर्स्थापित हो सकती है?

मेरा उत्तर है: हाँ—लेकिन केवल तभी जब हम "गुरु–शिष्य परम्परा" को उसकी आत्मा में पुनर्स्थापित करें, केवल उसकी बाहरी संरचना में नहीं।

आज गुरु–शिष्य परम्परा को कई बार केवल इस रूप में समझा जाता है:

"एक बड़े कलाकार से सीखो।"

लेकिन पारम्परिक guru–śiṣya संबंध इससे कहीं गहरा था।

विद्यार्थी केवल notes नहीं सीखता था।

वह सीखता था:

  • सुनना,
  • प्रतीक्षा करना,
  • repetition,
  • discipline,
  • humility,
  • aesthetics,
  • silence,
  • attention,
  • और धीरे-धीरे स्वर के भीतर जाना।

Sangeet Natak Akademi भी Indian classical music की oral transmission और गुरु के साथ दीर्घकालिक संबंध को इसकी विशिष्ट विशेषताओं में गिनाती है।

इसलिए guru–shishya parampara को पुनर्जीवित किया जा सकता है।

लेकिन:

गुरु की पूजा नहीं—गुरु से साधना।

अंध-आज्ञापालन नहीं—श्रद्धा के साथ विवेक।

व्यक्ति-पूजा नहीं—नाद की खोज।


11. आधुनिक गुरु–शिष्य परम्परा कैसी हो?

हमें पुराने गुरुकुल की mechanical copy नहीं चाहिए।

हमें उसका principle चाहिए।

गुरु

केवल performer नहीं।

साधक + शिक्षक + mentor + exemplar।

शिष्य

केवल student नहीं।

serious practitioner।

अभ्यास

केवल weekly class नहीं।

daily sādhanā।

शिक्षा

केवल syllabus नहीं।

जीवन-पद्धति।

प्रदर्शन

केवल stage performance नहीं।

आत्म-अभिव्यक्ति।

और सबसे महत्वपूर्ण:

गुरु का अधिकार

शिष्य की स्वतंत्रता को समाप्त करने का अधिकार नहीं।

यही आधुनिक पुनर्स्थापना और पुरानी रूढ़ि में अंतर होगा।


12. भारत के आधुनिक घराने और गुरुकुल — भविष्य कहाँ है?

आज भारत में classical music का landscape बहुत विविध है।

परम्परागत घराने अभी भी ज्ञान, repertoire, aesthetics और stylistic identity के महत्वपूर्ण वाहक हैं।

साथ ही आधुनिक institutions—जैसे Sangeet Natak Akademi और अन्य music academies, universities, research institutions तथा private gurukuls—इस tradition को नए सामाजिक और technological environment में ले जा रहे हैं।

Sangeet Natak Akademi स्वयं music, dance और theatre के संरक्षण, research, teaching और inter-regional exchange को अपने institutional mandate का हिस्सा मानती है।

सरकार की Guru–Shishya Parampara Scheme भी veteran artists के माध्यम से विभिन्न performing arts में प्रशिक्षण को support करती है, जिसमें rare और vanishing traditions का transmission भी शामिल है।

अर्थात् institutional ecosystem समाप्त नहीं हुआ है।

लेकिन प्रश्न है:

क्या यह ecosystem नाद साधना को जीवित रख रहा है, या केवल performance tradition को?

यहीं असली चुनौती है।


13. घराने का भविष्य — बंद वंश नहीं, खुली परम्परा

घराना तभी जीवित रहेगा जब वह:

वंश से परे जाएगा।

यदि:

गुरु का बेटा → अगला गुरु

ही उसकी संरचना है, तो वह धीरे-धीरे lineage museum बन सकता है।

लेकिन यदि:

गुण + साधना + शिष्यत्व + परम्परा + innovation

उसका आधार बनें, तो घराना भविष्य में भी जीवित रहेगा।

इसलिए हमें:

lineage without nepotism

और:

tradition without rigidity

चाहिए।


14. डिजिटल युग में गुरु–शिष्य परम्परा

यहाँ एक रोचक paradox है।

Technology गुरु–शिष्य परम्परा की शत्रु भी बन सकती है और सबसे बड़ी सहयोगी भी।

YouTube, streaming, archival recordings और online teaching के कारण आज एक विद्यार्थी हजारों घंटे महान कलाकारों को सुन सकता है।

लेकिन—

सुनना और सीखना एक नहीं।

Algorithm आपको performance दिखा सकता है।

वह आपकी:

  • गलत सुर,
  • गलत breath,
  • गलत pronunciation,
  • गलत aesthetic judgement,
  • या गलत listening habit

को उसी क्षण नहीं सुधार सकता जिस तरह एक अनुभवी गुरु कर सकता है।

इसलिए भविष्य:

online OR gurukul

नहीं।

बल्कि:

digital archive + human guru + immersive practice

होना चाहिए।


15. भविष्य का गुरुकुल कैसा हो सकता है?

मैं SSG के लिए एक 21st-century Gurukul की कल्पना इस प्रकार करता हूँ:

1. Daily Riyaz

नियमित व्यक्तिगत साधना।

2. Guru–Shishya immersion

नियमित प्रत्यक्ष संगति।

3. Baithak culture

छोटे, intimate संगीत-सत्र।

4. Listening laboratory

महान recordings का guided listening।

5. Comparative music

Hindustani + Carnatic + folk + Sufi + Buddhist + world traditions।

6. Silence

संगीत के साथ मौन का अभ्यास।

7. Philosophy

नाद, रस, श्रुति, ध्यान, सौन्दर्य और consciousness पर विमर्श।

8. Ethics

साधना और जीवन के बीच संबंध।

9. Research

पुराने repertoire और oral traditions का documentation।

10. Performance

लेकिन performance को साधना का परिणाम रखा जाए, लक्ष्य नहीं।


16. सबसे बड़ा खतरा — classical music का भी "कुसंस्कार" बन जाना

यदि हम सावधान न रहें तो classical music स्वयं उसी बीमारी का शिकार हो सकता है जिसकी आलोचना हम परिवार और समाज में करते हैं।

फिर प्रश्न होंगे:

"हमारे घराने में यह नहीं गाया जाता।"

"यह राग हमारे घराने का नहीं।"

"यह शैली शास्त्रीय नहीं।"

"हमारे गुरु ने ऐसा नहीं सिखाया।"

"यह दूसरे घराने की चीज़ है।"

यही वह क्षण है जब:

परम्परा फिर से रूढ़ि बन जाती है।

घराना यदि संगीत को जीवित रखता है तो महान है।

लेकिन यदि घराना संगीत की सीमाएँ निर्धारित करके कहे—

"इसके बाहर सत्य नहीं है"

तो वह अपने मूल उद्देश्य के विरुद्ध चला जाता है।


17. नाद ब्रह्म का अर्थ ही सीमा से परे जाना है

यदि ब्रह्म अनन्त है, तो कोई एक घराना उसके सम्पूर्ण संगीत का मालिक कैसे हो सकता है?

यदि नाद सार्वभौमिक है, तो कोई जाति, धर्म या lineage उसका स्वामी कैसे हो सकता है?

इसलिए:

घराना परम्परा का संरक्षक हो सकता है; नाद का मालिक नहीं।

यह distinction SSG की आत्मा हो सकती है।


18. सत्य–प्रेम–करुणा — नाद साधना की कसौटी

किसी व्यक्ति ने कितने राग सीखे?

यह पहली कसौटी नहीं।

उसका आलाप कितना विलम्बित है?

यह भी अंतिम कसौटी नहीं।

उसकी तान कितनी तेज है?

यह भी नहीं।

एक बड़ी कसौटी यह होनी चाहिए:

क्या संगीत ने उसे अधिक सत्यवान बनाया?

क्या संगीत ने उसे अधिक प्रेमपूर्ण बनाया?

क्या संगीत ने उसकी करुणा बढ़ाई?

क्या वह दूसरों को सुनना सीख पाया?

क्योंकि जो स्वयं को सुनना नहीं सीखता, वह दूसरे को भी नहीं सुन सकता।

और—

जो दूसरे को नहीं सुन सकता, वह नाद को कैसे सुनेगा?


19. SSG का सम्भावित मूल सूत्र

इसीलिए SSG के लिए मैं एक सरल सूत्र प्रस्तावित करता हूँ:

सुर से स्वर तक।

स्वर से नाद तक।

नाद से मौन तक।

मौन से सत्य तक।

सत्य से प्रेम तक।

प्रेम से करुणा तक।

यह कोई religious conversion नहीं।

यह inner refinement है।


20. नाद साधना और सामाजिक परिवर्तन

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात आती है।

क्या संगीत समाज बदल सकता है?

अपने आप नहीं।

लेकिन संगीत व्यक्ति की perception बदल सकता है।

और समाज अन्ततः perception रखने वाले व्यक्तियों से बनता है।

यदि संगीत:

  • अहंकार कम करे,
  • ध्यान बढ़ाए,
  • दूसरे को सुनना सिखाए,
  • diversity को स्वीकारना सिखाए,
  • silence से परिचित कराए,
  • और compassion बढ़ाए,

तो वह केवल art नहीं रहता।

वह civilisational practice बन जाता है।


21. भारत को फिर से "गुरुकुल" चाहिए — लेकिन पुराने अर्थ में नहीं

भारत को पुराने गुरुकुल की architectural replica नहीं चाहिए।

उसे चाहिए:

गुरुकुल की आत्मा।

जहाँ:

ज्ञान = जीवन

गुरु = मार्गदर्शक

शिष्य = साधक

संगीत = अभ्यास

मौन = शिक्षक

प्रश्न = साधना

और—

मानवता = अंतिम परीक्षा।


22. भविष्य के भारतीय घराने

मुझे लगता है कि भविष्य में तीन प्रकार की संस्थाएँ दिखाई देंगी।

पहला — Museum Gharana

परम्परा संरक्षित रहेगी।

लेकिन जीवन से दूर होती जाएगी।

दूसरा — Commercial Academy

संगीत सिखाया जाएगा।

Degrees, certificates, competitions और performances होंगे।

लेकिन गहराई सीमित हो सकती है।

तीसरा — Living Gurukul

परम्परा + research + technology + व्यक्तिगत साधना + ethical formation।

SSG का लक्ष्य तीसरा होना चाहिए।


23. और यह मॉडल केवल हिन्दुस्तानी संगीत तक सीमित नहीं होना चाहिए

भारत की शक्ति उसकी विविधता है।

एक आधुनिक SSG में हिन्दुस्तानी संगीत की गहरी साधना के साथ:

  • कर्नाटक संगीत,
  • ध्रुपद,
  • खयाल,
  • ठुमरी,
  • लोक-संगीत,
  • सूफ़ी संगीत,
  • बाउल,
  • भक्ति-संगीत,
  • वैदिक chant,
  • बौद्ध chanting,
  • और विश्व की अन्य contemplative musical traditions

का संवाद हो सकता है।

यह syncretism नहीं है।

यह comparative listening है।

हर परम्परा को उसकी अपनी integrity में समझते हुए उस common human experience को सुनना:

जहाँ सत्य, प्रेम और करुणा की कोई भाषा नहीं होती।


24. यही है "एक अनहद नाद"

कभी-कभी ऐसा लगता है कि मानव सभ्यता ने धर्मों को तो बहुत सुना—

लेकिन मनुष्य को नहीं सुना।

हमने शास्त्र सुने।

मंत्र सुने।

अज़ान सुनी।

गुरबाणी सुनी।

भजन सुने।

कीर्तन सुने।

कव्वाली सुनी।

लेकिन क्या हमने उस underlying human longing को सुना—

जो इन सबके भीतर प्रेम, सत्य और करुणा की खोज करती है?

यही वह जगह है जहाँ:

नाद ब्रह्म

एक धार्मिक label से आगे बढ़कर एक civilisational metaphor बन सकता है।


25. SSG के लिए मेरा प्रस्ताव

यदि SSG को वास्तव में Saraswati Sangeet Gurukul के रूप में विकसित करना है, तो उसका लक्ष्य केवल classes चलाना नहीं होना चाहिए।

उसे एक living ecosystem बनना चाहिए:

गुरुकुल

जहाँ शिष्य रहते, सीखते और साधना करते हैं।

संगीत-बैठक

जहाँ संगीत प्रदर्शन नहीं, संवाद बनता है।

Research Centre

जहाँ घरानों और oral traditions का documentation हो।

Listening Archive

जहाँ महान recordings संरक्षित हों।

Satsang of Music

जहाँ धर्मोपदेश नहीं, संगीत और चिंतन के माध्यम से संवाद हो।

Intergenerational Forum

जहाँ बच्चे, युवा, गुरु और senior rasikas एक साथ बैठें।

Global Fellowship

जहाँ दुनिया के अलग-अलग contemplative music traditions के साधक मिलें।


26. सबसे महत्वपूर्ण safeguard

लेकिन SSG स्वयं वही गलती न दोहराए जिसकी आलोचना यह पूरा विचार कर रहा है।

कल कोई यह न कहे:

"SSG में ऐसा ही होता है।"

और वही एक दिन SSG की नई रूढ़ि बन जाए।

इसलिए SSG का पहला principle होना चाहिए:

"परम्परा का सम्मान करो; परम्परा को प्रश्न करने का अधिकार कभी मत खोओ।"

और गुरु से भी कहा जाए:

"आप हमारे मार्गदर्शक हैं; हमारी विवेक-बुद्धि के स्वामी नहीं।"

यही आधुनिक गुरु–शिष्य परम्परा की नैतिक रीढ़ होगी।


27. निष्कर्ष — क्या नाद ब्रह्म पुनर्स्थापित हो सकता है?

हाँ।

लेकिन किसी मंदिर, मंच या संस्था में केवल "नाद ब्रह्म" लिख देने से नहीं।

और न ही पुराने गुरुकुल का बाहरी रूप पुनः बना देने से।

नाद ब्रह्म तभी पुनर्स्थापित होगा जब:

संगीत फिर से साधना बने।

गुरु फिर से जीवन का exemplar बने।

शिष्य फिर से साधक बने।

घराना फिर से living tradition बने।

परम्परा फिर से प्रश्न स्वीकार करे।

और संगीत फिर से मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने लगे।

भारत में इसके लिए संस्थागत आधार भी मौजूद हैं। Sangeet Natak Akademi राष्ट्रीय स्तर पर संगीत, नृत्य और नाटक की intangible heritage को संरक्षित और विकसित करने का काम करती है; उसके वर्तमान mandate में research, teaching, inter-regional exchange और cultural enrichment भी शामिल हैं। भारत सरकार की Guru–Shishya Parampara Scheme भी veteran practitioners के माध्यम से विभिन्न performing arts के transmission को समर्थन देती है। UNESCO भी intangible heritage को स्थिर museum-object नहीं, बल्कि living expressions that evolve as societies grow and adapt के रूप में देखता है।

यही भविष्य का रास्ता है:

Preserve the tradition.
Question the rigidity.
Deepen the practice.
Open the doors.
And let the music evolve.


अन्तिम आह्वान

शायद हमें भारत में फिर से हजारों गुरुकुलों की आवश्यकता नहीं।

हमें कुछ ऐसे जीवित गुरुकुलों की आवश्यकता है जो यह सिद्ध कर सकें कि:

गुरु–शिष्य परम्परा आधुनिक भी हो सकती है।

घराना खुला भी हो सकता है।

शास्त्रीय संगीत जीवंत भी हो सकता है।

आध्यात्मिकता धर्मांध हुए बिना संभव है।

और—

साधना बिना किसी संकीर्ण पहचान के भी संभव है।

क्योंकि अन्ततः:

सत्य का कोई घराना नहीं।

प्रेम की कोई जाति नहीं।

करुणा का कोई सम्प्रदाय नहीं।

और नाद का कोई पासपोर्ट नहीं।

जिस दिन हमारी साधना हमें यह सुनने लगे—

"मैं" और "तुम" के बीच जो अनावश्यक शोर है, उसके पार भी कुछ है—

शायद उसी दिन नाद ब्रह्म साधना फिर से जीवित होना शुरू होगी।

और शायद—

पुरब से पश्चिम तक, उत्तर से दक्षिण तक, जब कभी सत्य, प्रेम और करुणा की बात होगी—तो अलग-अलग धर्मों और भाषाओं के पीछे वही एक अनहद नाद सुनाई देगा।

SSG — Saraswati Sangeet Gurukul

संगीत सीखने के लिए नहीं केवल।
संगीत में स्वयं को सुनने के लिए।

सुर से स्वर।
स्वर से नाद।
नाद से मौन।
मौन से सत्य।
सत्य से प्रेम।
प्रेम से करुणा।


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