हालात के तीरों से छलनी हैं बदन अपने,
पास आओ कि तीरों के कुछ ज़ख़्म तो भर जाएँ।
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हालात के तीरों से छलनी हैं बदन अपने। (सगुणोपासना की madness, भीष्म प्रतिज्ञा / झक।)
पास आओ कि तीरों के कुछ जख्म तो भर जाएं।
(सत्संग / संगीत से प्रेम / भक्ति / विरह की वेदना से निजात।)
Full kavita -
सगुण की ये झक है कि तेरा रूप ही माँगें,
निर्गुण के समंदर में भी तुझको ही निहारें।
ज्ञानों के बहुत दीपक जलाए हैं हमने,
पर एक तेरी झलक हो तो अँधियारे सँवर जाएँ।
हालात के तीरों से छलनी हैं बदन अपने,
पास आओ कि तीरों के कुछ ज़ख़्म तो भर जाएँ।
विरह की ये अगन भी अजब चीज़ है साईं,
जलती है तो भीतर कोई राग निकलता है।
जब दर्द को छेड़ती है तानपुरे की तान,
बिखरे हुए सुर जैसे ख़ुद-ब-ख़ुद सँवर जाएँ।
सत्संग में बैठें तो ख़बर होती है हमको,
दुख केवल हमारा नहीं—सबका ही सफ़र है।
एक प्रेम की धारा में बह जाएँ जो आँसू,
मन के कई बरसों के पत्थर भी पिघल जाएँ।
हालात के तीरों से छलनी हैं बदन अपने,
पास आओ कि तीरों के कुछ ज़ख़्म तो भर जाएँ।
भीष्म-सी प्रतिज्ञा है—अब लौटना नहीं है,
जिस रूप को माना है, उससे ही निभाना।
लोगों ने कहा छोड़ो ये दीवानगी अपनी,
हमने कहा—इसी झक में शायद हम सँवर जाएँ।
न मंदिर की चाहत है, न तर्कों की विजय अब,
बस नाम रहे होंठों पर और सामने हो सूरत।
तू दूर भी रहे तो तेरा राग साथ होगा,
हम गाते रहें और ये फ़ासले गुज़र जाएँ।
हालात के तीरों से छलनी हैं बदन अपने,
पास आओ कि तीरों के कुछ ज़ख़्म तो भर जाएँ।
शायद यही भक्ति है—ज़ख़्मों को नकारना नहीं,
दर्द को ही प्रेम का एक रास्ता बना लेना।
संगीत मिले, संग मिले, साधना की साँस मिले—
तो विरह के भी मौसम किसी दिन निखर जाएँ।
और जब आख़िरी सुर में ख़ामोशी उतर आए,
न सगुण रहे बाक़ी, न निर्गुण का कोई दावा—
बस प्रेम बचा रहे, और प्रेम में वही तू,
हम मिटते-मिटते शायद तुझमें ही उतर जाएँ।
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