नारी-विषाद योग
जब द्रौपदी फिर पूछती है — "सभा में बैठे लोग मौन क्यों हैं?"
आधुनिक गीता का एक नया अध्याय
अर्जुन फिर कृष्ण के सामने खड़ा है।
लेकिन इस बार उसके हाथ में गांडीव नहीं।
उसके सामने कोई युद्धभूमि नहीं।
उसके सामने है—
एक स्त्री की आँखों में जमा हुआ पानी।
एक ऐसी स्त्री, जिसने जीवन भर—
अपनों के लिए सहा,
परिवार के लिए चुप रही,
समाज के लिए अपने सपने छोड़े,
पति के लिए स्वयं को बदला,
बच्चों के लिए अपने आँसू छिपाए—
और अन्त में उसके पास बचा—
दो आँखों के किनारे
और एक लम्बी चुप्पी।
अर्जुन पूछता है—
"माधव, यह कौन-सा विषाद है?"
कृष्ण कहते हैं—
"यह अर्जुन-विषाद नहीं,
यह नारी-विषाद है।"
1. अर्जुन का प्रश्न
अर्जुन कहता है—
"माधव,
पुरुष के दुःख पर तो शास्त्र लिखे गए,
युद्धों की कथाएँ कही गईं,
वीरता के गीत गाए गए।लेकिन उस स्त्री का क्या
जो युद्ध में नहीं गई—
फिर भी जीवन भर युद्ध लड़ती रही?"
कृष्ण मौन हैं।
अर्जुन फिर पूछता है—
"उस स्त्री का क्या
जिसकी आँखों के किनारे
हमेशा भीगे रहे?"
कृष्ण कहते हैं—
"उसे तुम कमजोर मत समझो।
वह रोई है—
क्योंकि उसे बोलने की अनुमति नहीं थी।"
2. नारी का विषाद
कृष्ण कहते हैं—
"अर्जुन, नारी का सबसे बड़ा दुःख
हमेशा हिंसा नहीं होता।कभी-कभी उसका सबसे बड़ा दुःख
यह होता है कि उसकी पीड़ा को
परिवार की 'मर्यादा' कहकर
उससे ही छिपा दिया जाता है।"
वह रोती है—
पर कहा जाता है:
"घर की बात घर में रखो।"
वह विरोध करती है—
"बहुत बोलती है।"
वह चुप रहती है—
"संस्कारी है।"
वह अपने लिए निर्णय लेती है—
"स्वार्थी है।"
वह सब सहती है—
"अच्छी बहू है।"
कृष्ण कहते हैं—
"अर्जुन, यह संस्कार नहीं।
यह चुप्पी की संस्कृति है।"
3. "हमारे घर में ऐसा ही होता है"
अर्जुन पूछता है—
"लेकिन माधव, परिवार तो परम्पराओं से चलता है।"
कृष्ण कहते हैं—
"परम्परा तब तक सुंदर है
जब तक वह मनुष्य को सँवारती है।जिस दिन परम्परा मनुष्य को तोड़ने लगे,
उस दिन उसे धर्म कहकर बचाना अधर्म है।"
"किसी घर में बहू को
अपने माता-पिता से मिलने की स्वतंत्रता न हो—
यह धर्म नहीं।"
"किसी पत्नी को
अपने career, अपने संगीत, अपनी इच्छा
या अपनी पहचान छोड़ने को कहा जाए—
यह धर्म नहीं।"
"किसी स्त्री से कहा जाए—
'तुम्हें हमारे घर के अनुसार ढलना ही होगा'—
यह धर्म नहीं।"
"यह सत्ता है, अर्जुन।
और सत्ता जब संस्कार का वस्त्र पहन ले,
तो उसे पहचानना कठिन हो जाता है।"
4. द्रौपदी आज भी पूछ रही है
अर्जुन देखता है—
सभा वही है।
चेहरे बदल गए हैं।
कपड़े बदल गए हैं।
सभागार बदल गया है।
लेकिन प्रश्न वही है।
द्रौपदी पूछती है—
"जब मेरे साथ अन्याय हो रहा था,
तब सभा में बैठे इतने लोग मौन क्यों थे?"
कृष्ण कहते हैं—
"यही प्रश्न आज भी जीवित है।"
जब किसी बेटी को विवाह के बाद प्रताड़ित किया जाता है—
कितने लोग बोलते हैं?
जब बहू के साथ अन्याय होता है—
कितने बुजुर्ग कहते हैं:
"यह गलत है"?
जब पत्नी की स्वतंत्रता को
"परिवार की मर्यादा" कहा जाता है—
कितने पुरुष कहते हैं:
"नहीं, यह ठीक नहीं"?
जब कोई स्त्री वर्षों से रो रही होती है—
कितने लोग पूछते हैं:
"तुम वास्तव में कैसी हो?"
5. भीष्म फिर मौन हैं
अर्जुन पूछता है—
"माधव, सभा में भीष्म जैसे लोग क्यों चुप थे?"
कृष्ण कहते हैं—
"क्योंकि ज्ञान और साहस
दो अलग बातें हैं।"
"बहुत लोग जानते हैं
कि कुछ गलत हो रहा है।"
"लेकिन वे बोलते नहीं।"
"क्यों?"
"कुल की प्रतिष्ठा।"
"रिश्ते खराब हो जाएँगे।"
"लोग क्या कहेंगे।"
"बेटा नाराज़ हो जाएगा।"
"बिरादरी क्या सोचेगी।"
फिर कृष्ण कहते हैं—
"अर्जुन, अन्याय करने वाला दोषी है।
लेकिन अन्याय देखकर
केवल इसलिए मौन रहने वाला भी
उस व्यवस्था को जीवित रखता है।"
6. आधुनिक कृपाचार्य
अर्जुन पूछता है—
"और कुलगुरु?"
कृष्ण कहते हैं—
"यदि कुलगुरु केवल यह सिखाए कि
'बहू को परिवार की परम्परा माननी चाहिए',
लेकिन यह न सिखाए कि
'परिवार को भी बहू की गरिमा का सम्मान करना चाहिए',
तो वह कुलगुरु नहीं—
परम्परा का चौकीदार है।"
"कुलगुरु का धर्म कुल को बचाना नहीं।
कुल को मनुष्यत्व के योग्य बनाए रखना है।"
7. नारी से हमेशा त्याग क्यों?
अर्जुन पूछता है—
"माधव, स्त्री से ही त्याग क्यों माँगा जाता है?"
कृष्ण कहते हैं—
"क्योंकि समाज ने त्याग को
स्त्री का गुण बना दिया
और अधिकार को पुरुष का।"
"उससे कहा—
सहो।"
"समझो।"
"समायोजन करो।"
"घर बचाओ।"
"पति का साथ दो।"
"ससुराल निभाओ।"
लेकिन कृष्ण का स्वर कठोर हो जाता है—
"अर्जुन, घर बचाने की जिम्मेदारी
केवल स्त्री की क्यों?"
"यदि विवाह दो लोगों का है,
तो त्याग भी दो लोगों का।"
"यदि परिवार दो पक्षों का है,
तो adjustment भी दोनों का।"
"यदि प्रेम है,
तो स्वतंत्रता भी होनी चाहिए।"
8. प्रेम या स्वामित्व?
अर्जुन पूछता है—
"माधव, फिर प्रेम क्या है?"
कृष्ण कहते हैं—
"प्रेम वह नहीं
जिसमें तुम कहते हो—
'तुम मेरी हो।'"
"प्रेम वह है
जिसमें तुम कहते हो—
'तुम अपनी हो,
और मैं तुम्हारे साथ हूँ।'"
"पत्नी तुम्हारी सम्पत्ति नहीं।"
"पति भी पत्नी की सम्पत्ति नहीं।"
"बेटी परिवार की इज्जत नहीं।"
"बेटा परिवार का उत्तराधिकारी मात्र नहीं।"
"मनुष्य को मनुष्य रहने दो।
तभी प्रेम जन्म लेगा।"
9. विवाह पर कृष्ण का उपदेश
अर्जुन कहता है—
"माधव, माता-पिता अपनी बेटी का विवाह कैसे तय करें?"
कृष्ण कहते हैं—
"कुल मत देखो—कुल की चेतना देखो।"
"धन मत देखो—धन के प्रति दृष्टि देखो।"
"जाति मत देखो—मनुष्य के प्रति व्यवहार देखो।"
"प्रतिष्ठा मत देखो—घर के भीतर स्त्रियों की स्थिति देखो।"
"परिवार की बाहरी शालीनता मत देखो—
असहमति होने पर उनका व्यवहार देखो।"
"बहू के आने के बाद
घर की स्त्रियों से पूछो—
'तुम स्वतंत्र हो?'"
"बेटी से पूछो—
'क्या तुम वहाँ अपने जैसी रह सकोगी?'"
और फिर कृष्ण का सबसे स्पष्ट वचन—
**"अपनी बेटी का विवाह ऐसे परिवार में मत करना
जहाँ रूढ़ि को धर्म,
आज्ञाकारिता को संस्कार
और स्त्री की चुप्पी को मर्यादा कहा जाता हो।"**
10. नारी की बेबसी
अर्जुन उस स्त्री की ओर देखता है।
वह कहती नहीं।
कृष्ण कहते हैं—
"उसकी कहानी उसके आँसुओं में लिखी है।"
वह कहना चाहती है—
"मैं थक गई हूँ।"
पर कहती है—
"मैं ठीक हूँ।"
वह कहना चाहती है—
"मुझे भी जीना है।"
पर कहती है—
"आप जैसा उचित समझें।"
वह कहना चाहती है—
"मुझे मेरी पहचान वापस चाहिए।"
पर कहती है—
"घर टूट जाएगा।"
कृष्ण कहते हैं—
"अर्जुन, जिस घर को बचाने के लिए
किसी एक मनुष्य को लगातार टूटना पड़े,
वह घर पहले ही भीतर से टूट चुका है।"
11. "किस्मत" मत कहो
अर्जुन कहता है—
"लोग कहते हैं—
उसकी किस्मत खराब थी।"
कृष्ण कहते हैं—
"हर अन्याय को किस्मत मत कहो।"
"जहाँ व्यवस्था बदली जा सकती थी
और नहीं बदली गई—
वहाँ केवल भाग्य को दोष देना
मनुष्य की जिम्मेदारी से भागना है।"
"किस्मत के नाम पर
अन्याय को पवित्र मत बनाओ।"
12. आँसू कमजोरी नहीं
कृष्ण उस स्त्री की आँखों की ओर देखते हैं—
"अर्जुन, आँसू पराजय नहीं।"
"कभी आँसू वह भाषा होते हैं
जिसे बोलने की अनुमति नहीं मिली।"
"लेकिन मैं चाहता हूँ
कि एक दिन वह स्त्री केवल रोए नहीं—
बोले भी।"
"और जब वह बोले—"
"उसकी बात सुनने वाला समाज हो।"
13. आधुनिक पुरुष के लिए कृष्ण की गीता
अर्जुन पूछता है—
"माधव, पुरुष क्या करे?"
कृष्ण कहते हैं—
"पहले protector बनने का अहंकार छोड़।"
"स्त्री को तुम्हारी सुरक्षा से अधिक
तुम्हारे सम्मान की आवश्यकता है।"
"उसकी ओर से निर्णय मत लो।"
"उसके लिए मत बोलो—
उसे बोलने दो।"
"उसे अपने नाम से पहचानो।"
"उसके सपनों को अपने अहंकार का विस्तार मत बनाओ।"
"पति बनो।
स्वामी नहीं।"
14. पिता के लिए कृष्ण
"अपनी बेटी को केवल अच्छे घर में मत भेजो।"
"उसे ऐसा घर दो
जहाँ उसे स्वयं होने की जगह मिले।"
"उसे यह मत सिखाओ कि
'ससुराल में सब सहना।'"
"उसे सिखाओ—
'अन्याय को पहचानना।'"
"उसे यह मत सिखाओ—
'घर बचाना।'"
"उसे सिखाओ—
'स्वस्थ संबंध बनाना।'"
"उसे केवल खाना बनाना मत सिखाओ।"
"उसे अपने जीवन का निर्णय लेना सिखाओ।"
15. माता के लिए कृष्ण
"अपनी बेटी को यह मत सिखाओ—
'मैंने सहा, तुम भी सह लेना।'"
"तुम्हारी पीढ़ी का दुःख
अगली पीढ़ी का संस्कार नहीं होना चाहिए।"
"जो तुमने सहा
वह तुम्हारी बेटी की नियति नहीं।"
16. सास के लिए कृष्ण
कृष्ण कहते हैं—
"जिस स्त्री को तुमने बहू कहा,
वह भी किसी माँ की बेटी है।"
"और याद रखो—
कभी तुम भी किसी घर में
नई थीं।"
"यदि तुम्हारे साथ अन्याय हुआ था,
तो वही अन्याय आगे मत दो।"
"विरासत में दुःख मिला हो
तो उसे यहीं समाप्त करो।"
17. बेटी के लिए कृष्ण
कृष्ण अब स्त्री से कहते हैं—
"तुम्हें हर सम्बन्ध तोड़ना नहीं है।"
"लेकिन हर सम्बन्ध बचाना भी तुम्हारा कर्तव्य नहीं।"
"समझौता और आत्म-विलोपन
एक बात नहीं।"
"त्याग और आत्म-अस्वीकार
एक बात नहीं।"
"क्षमा और पुनः अत्याचार सहना
एक बात नहीं।"
"प्रेम करो—
पर स्वयं को मिटाकर नहीं।"
18. नारी-विषाद का मोक्ष
अर्जुन पूछता है—
"माधव, इस नारी-विषाद का अंत कैसे होगा?"
कृष्ण कहते हैं—
"जब स्त्री को दया नहीं, न्याय मिलेगा।"
"जब उसे संरक्षण नहीं, agency मिलेगी।"
"जब उसे pedestal पर रखने के बजाय
बराबर मनुष्य माना जाएगा।"
"जब विवाह संस्था
दो बराबर मनुष्यों का संवाद बनेगी।"
"जब परिवार की प्रतिष्ठा से पहले
व्यक्ति की गरिमा होगी।"
"जब माँ अपनी बेटी से कह सकेगी—"
'तुम्हें सहना नहीं, जीना है।'"
19. और तब कृष्ण कहते हैं—
"अर्जुन, नारी को देवी बनाने की आवश्यकता नहीं।"
मैं चौंक गया।
कृष्ण बोले—
"देवी बनाकर भी तुम उसे मनुष्य होने से वंचित कर सकते हो।"
"कभी उसे देवी कहते हो।"
"कभी लक्ष्मी।"
"कभी कुलवधू।"
"कभी त्याग की मूर्ति।"
"लेकिन क्या उसे केवल यह अधिकार दोगे कि—"
"वह अपने जीवन की स्वामिनी हो?"
मौन।
"यही पर्याप्त है।"
20. आधुनिक द्रौपदी
द्रौपदी अब सभा के बीच खड़ी होती है।
इस बार वह अकेली नहीं।
उसके पीछे—
सीता है।
मीरा है।
गार्गी है।
मैत्रेयी है।
सावित्रीबाई फुले है।
और आज की वह अनगिनत स्त्री भी—
जिसने अपने आँसू पोंछकर
फिर से जीवन शुरू किया।
द्रौपदी कहती है—
"मुझे बचाने मत आओ।
पहले यह व्यवस्था बदलो
जिसमें मुझे बचाने की जरूरत पड़ती है।"
कृष्ण मुस्कराते हैं।
21. आधुनिक गीता का नारी-श्लोक
नारी न दया-पात्रा,
नारी न कुल-मानम्।
नारी न पराधीना,
नारी स्वयं मानवम्।तस्याः स्वातन्त्र्यं धर्मः।
तस्याः सम्मानः धर्मः।
तस्याः स्वप्नाः धर्मः।
तस्याः वाणी धर्मः।यत्र नारी मौनं बाध्यते,
तत्र धर्मः नास्ति।यत्र नारी भयेन जीवति,
तत्र संस्कारः नास्ति।यत्र नारी प्रेमेण स्वतंत्रा भवति,
तत्रैव परिवारः।
22. अंतिम संवाद
अर्जुन ने पूछा—
"माधव, फिर नारी-विषाद का अंत कब होगा?"
कृष्ण बोले—
"जब तुम उसकी आँखों के आँसू देखकर
केवल यह नहीं पूछोगे—
'क्या हुआ?'बल्कि यह भी पूछोगे—
'हमारी व्यवस्था में ऐसा क्यों हुआ?'"
"जब पिता बेटी को विदा करते समय
केवल यह न कहे—
'अब ससुराल ही तुम्हारा घर है।'"
"बल्कि कहे—
'जहाँ तुम्हारी गरिमा नहीं,
वहाँ लौट आना—
यह घर तुम्हारा हमेशा रहेगा।'"
"जब माँ बेटी को यह न कहे—
'सब सह लेना।'"
"बल्कि कहे—
'सत्य के लिए खड़ी होना।'"
"जब पति कहे—
'तुम मेरी पत्नी हो'
के साथ यह भी कहे—"
'और तुम अपने आप में पूर्ण मनुष्य हो।'"
उपसंहार
फिर वही तानपुरा बजता है।
एक सूक्ष्म सा...
आँखों के किनारे का पानी
धीरे-धीरे सूखता है।
स्त्री पहली बार
अपने आँसू छिपाती नहीं।
वह उन्हें पोंछती है।
खड़ी होती है।
कृष्ण उसकी ओर देखते हैं।
और कहते हैं—
"अब तुम अबला नहीं।
तुम्हें किसी कृष्ण की प्रतीक्षा नहीं।
तुम्हारे भीतर भी वही चेतना है।"
फिर मेरी ओर मुड़कर कहते हैं—
"और अर्जुन—
यदि तुम सचमुच मेरी गीता समझ गए हो,
तो अगली बार किसी द्रौपदी के रोने पर
उसके लिए युद्ध करने से पहले
उस सभा की व्यवस्था बदलना
जिसमें वह रोने को विवश हुई।"
और दूर से फिर वही नाद सुनाई देता है—
सत्य...
प्रेम...
करुणा...
स्वतंत्रता...
और फिर—
मौन।
यही नारी-विषाद योग है।
यही आधुनिक कुरुक्षेत्र में कृष्ण का नया उपदेश है।

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