सत्यनिष्ठा बनाम सांसारिक चतुराई
ज्ञान क्या है, और अज्ञान किसे कहते हैं?
अक्षत अग्रवाल
"Truth-seeking is research.
Research demands सत्यनिष्ठा.
Without truthfulness, there is only opinion."
आजकल एक वाक्य बहुत सुनने को मिलता है—
"अरे, उसे तो सांसारिक ज्ञान ही नहीं है!"
मैं सोच में पड़ जाता हूँ।
सांसारिक ज्ञान?
या
सांसारिक चालाकी?
दोनों में बहुत अंतर है।
सत्यनिष्ठा क्या है?
सत्य की खोज कोई विरासत नहीं।
न वह जाति से मिलती है।
न परिवार से।
न गुरु की कृपा मात्र से।
न अंधविश्वास से।
सत्य की खोज एक शोध (Research) है।
और हर शोध की पहली शर्त है—
सत्यनिष्ठा।
यानी,
यदि तथ्य मेरे विश्वास के विरुद्ध भी हों,
तो मैं तथ्य को स्वीकार करूँ,
अपने अहंकार को नहीं।
सांसारिक ज्ञान या सांसारिक चालाकी?
बहुत बार जिसे लोग "व्यावहारिक ज्ञान" कहते हैं,
वह वास्तव में होता है—
- दूसरे को नीचा दिखाने की कला,
- बिना अध्ययन के स्वयं को ज्ञानी घोषित करना,
- अफवाहों को ज्ञान कहना,
- भय पैदा करके प्रभाव जमाना,
- धर्म और ज्योतिष का उपयोग विवेक के लिए नहीं, बल्कि नियंत्रण के लिए करना।
यह ज्ञान नहीं।
यह चतुराई है।
और चतुराई हमेशा बुद्धिमत्ता नहीं होती।
अंधविश्वास का कारोबार
जब कोई कहता है—
"आज नाखून मत काटो।"
"आज यह काम मत करो।"
"इस मुहूर्त में ही निर्णय लो।"
तो मेरा प्रश्न होता है—
क्यों?
यदि उत्तर है—
"बस ऐसा ही होता आया है।"
तो यह शोध नहीं।
यह परंपरा हो सकती है,
पर सत्य का प्रमाण नहीं।
परंपरा का सम्मान होना चाहिए,
लेकिन उसे प्रश्नों से डरना नहीं चाहिए।
घर का क्लेश कहाँ से जन्म लेता है?
अक्सर विवाद विचारों से नहीं,
विचारों पर प्रश्न न पूछने से जन्म लेते हैं।
जब हर मत को अंतिम सत्य मान लिया जाता है,
तब संवाद समाप्त हो जाता है।
जहाँ संवाद समाप्त होता है,
वहीं से क्लेश प्रारंभ होता है।
सत्यनिष्ठा कैसी होती है?
सत्यनिष्ठ व्यक्ति कभी यह नहीं कहता—
"मैं सब जानता हूँ।"
वह कहता है—
"मैं खोज रहा हूँ।"
वह प्रमाण पढ़ता है।
वह तर्क सुनता है।
वह अपनी भूल स्वीकार करता है।
उसकी निष्ठा व्यक्ति से नहीं,
सत्य से होती है।
शोध और श्रद्धा
शोध का अर्थ श्रद्धा का विरोध नहीं।
बल्कि—
सच्ची श्रद्धा प्रश्नों से डरती नहीं।
जो विश्वास सत्य पर आधारित है,
वह जाँच के बाद और मजबूत होता है।
जो केवल भय पर आधारित है,
वह प्रश्न आते ही टूट जाता है।
भारतीय परंपरा का वास्तविक संदेश
उपनिषद कहते हैं—
"नेति... नेति..."
यानी—
खोजते रहो।
प्रश्न करते रहो।
सत्य को सीमित मत करो।
गीता कहती है—
"विमृश्यैतदशेषेण..."
पहले विचार करो।
फिर निर्णय लो।
भारतीय ज्ञान परंपरा ने
कभी अंधानुकरण को ज्ञान नहीं कहा।
अंतिम विचार
ज्ञान वह नहीं,
जो दूसरों की बुद्धि उधार लेकर जीता है।
ज्ञान वह है,
जो सत्य की खोज में
अपने अहंकार को भी प्रश्नों के सामने खड़ा कर सके।
इसलिए मेरे लिए—
सत्यनिष्ठा ही वास्तविक शिक्षा है।
बाकी सब—
डिग्रियाँ,
पद,
प्रतिष्ठा,
और सांसारिक चतुराई—
क्षणिक उपलब्धियाँ हैं।
"दूसरे की बुद्धि के सहारे जीना सरल है।
अपनी बुद्धि को सत्य के अनुशासन में विकसित करना—यही साधना है।"
— अक्षत अग्रवाल
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