आदर्श भारतीय नारी — या हिंदुत्व की रूप-माया?
उमा भारती · साध्वी ऋतम्भरा · स्मृति ईरानी · कंगना रनौत
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पूरक पोस्ट: रूप-पूजा श्रृंखला — भाग २
"स्त्री तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग-पग-तल में।" — जयशंकर प्रसाद, कामायनी
"जिस देश में स्त्री को देवी बनाकर पूजा जाता है, उसी देश में उसे इंसान का दर्जा नहीं दिया जाता।" — एक आधुनिक सत्य
दोस्तों,
पिछली पोस्ट में हमने बात की थी रूप-पूजा की — मूर्ति, मंदिर, और उस बहुरूपिए राजनीतिक दशानन की जो हर संकट में नया धार्मिक चोला पहन लेता है।
आज उसी श्रृंखला की दूसरी कड़ी।
विषय है: आदर्श भारतीय नारी का हिंदुत्व-संस्करण।
हिंदुत्व की राजनीति ने चार स्त्रियों को "आदर्श भारतीय नारी" के रूप में प्रस्तुत किया है — दुर्गा के अवतार, शक्ति की प्रतीक, राष्ट्रमाता की छवियाँ।
आइए इन चारों को दृष्टि से देखें।
सबकुछ दिखता है। दृष्टि होनी चाहिए।
पहला रूप: उमा भारती — "क्रांतिकारी साध्वी" का मुखौटा
जो दिखाया गया:
भगवा वस्त्र। निडर वाणी। गाँव की गरीब लड़की जो पहाड़ बन गई। मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री। गंगा की रक्षक।
उमा भारती की कहानी सुनने में बड़ी प्रेरणादायी लगती है — टीकमगढ़ के एक किसान परिवार से, धार्मिक प्रवचन देते हुए, BJP की सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए।
यह हिंदुत्व का प्रिय कथानक है: स्त्री = शक्ति = दुर्गा।
जो छुपाया गया:
उमा भारती बाबरी मस्जिद विध्वंस के दिन अयोध्या में मौजूद थीं और उन पर आरोप है कि उन्होंने भड़काऊ भाषण दिए और हिंसा को उकसाया। उन पर बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में आपराधिक षड्यंत्र के आरोप लगाए गए।
राम जन्मभूमि आंदोलन में उनकी प्रमुख भूमिका से उनका राजनीतिक उत्थान हुआ, जहाँ उनके भावावेशपूर्ण भाषणों ने कारसेवकों को गोलबंद किया और अयोध्या विवाद के इर्द-गिर्द हिंदू राष्ट्रवादी भावनाओं को बढ़ाकर BJP के चुनावी लाभ में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
लिबरहान आयोग — जिसने बाबरी मस्जिद विध्वंस की जाँच की — ने उमा भारती को उन ६८ लोगों में शामिल किया जो देश को "साम्प्रदायिक कलह की कगार पर" ले जाने के लिए व्यक्तिगत रूप से दोषी थे।
गंगा की "रक्षक" बनीं — नदी साफ नहीं हुई। मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं — १ वर्ष में इस्तीफा देना पड़ा। मंत्री पद मिला — हटा दिया गया।
असली प्रश्न:
क्या यह "आदर्श नारी" है — जिसने जनता को साम्प्रदायिक आग में झोंकने का काम किया?
या यह हिंदुत्व का वह प्रिय यंत्र है — जो स्त्री को "दुर्गा" बनाकर हिंसा का औजार बनाता है?
दूसरा रूप: साध्वी ऋतम्भरा — "घृणा की पुजारन"
जो दिखाया गया:
सफेद साड़ी। कमल की माला। राम-कथा की मधुर वाचक। "दुर्गा वाहिनी" की संस्थापक। बेटियों के लिए सैनिक स्कूल। पद्म भूषण (२०२५)।
जो रिकॉर्ड में दर्ज है:
१९८९ और १९९२ के बीच ऋतम्भरा ने मुसलमानों के विरुद्ध युद्ध का आह्वान करने वाले कई सार्वजनिक भाषण दिए। उनकी नरसंहारी बयानबाज़ी की कैसेटें मंदिरों और सार्वजनिक सभाओं में पूरे भारत में बजाई गईं। अपने भाषणों में उन्होंने मुसलमानों की तुलना दूध में नींबू और मक्खियों से की, यह आरोप लगाते हुए कि वे हिंदुओं को संख्या में पीछे छोड़ने के लिए बड़ी संख्या में बच्चे पैदा कर रहे हैं।
राजनीति विज्ञानी और लेखक क्रिस्टोफ़ जैफ्रलो के अनुसार, उनके भाषण "सबसे आक्रामक" माने जाते थे।
आज ऋतम्भरा समवेद गुरुकुलम गर्ल्स सैनिक स्कूल की प्रमुख हैं — जो उन लगभग २५ सैनिक स्कूलों में से एक है जो RSS, BJP, हिंदुत्व संगठनों और अन्य हिंदू धार्मिक संगठनों से जुड़े लोगों द्वारा संचालित हैं।
और अब — पद्म भूषण।
बाबरी मस्जिद विध्वंस में कथित संलिप्तता के लिए कई FIR में नामित, VHP की तेजतर्रार प्रचारक साध्वी ऋतम्भरा को BJP सरकार ने पद्म भूषण — देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार — दिया है।
सितम्बर २०२२ में अमेरिका के न्यू जर्सी में उनके एक फंडरेजिंग कार्यक्रम को भारतीय-अमेरिकी समूहों के विरोध और हंगामे के बाद रद्द करना पड़ा।
एक विडंबना:
जो महिला "दुर्गा वाहिनी" — "दुर्गा की सेना" — की संस्थापक है, उसने अपनी "सेना" बनाई लड़कियों को "हिंदू संस्कृति की रक्षा" के नाम पर इस्तेमाल करने के लिए।
दुर्गा एक देवी थीं — जो असुरों का नाश करती थीं।
ऋतम्भरा के असुर कौन थे? अल्पसंख्यक, ईसाई मिशनरी, मदर टेरेसा।
यह दुर्गा की पूजा नहीं है। यह दुर्गा के नाम पर नफ़रत का व्यापार है।
तीसरा रूप: स्मृति ईरानी — "तुलसी" से मंत्री तक
जो दिखाया गया:
"क्योंकि सास भी कभी बहू थी" की तुलसी विरानी — जिसने करोड़ों भारतीय महिलाओं के दिलों में "आदर्श बहू" की छवि बसाई। फिर राजनीति में आईं, अमेठी जीतीं, मंत्री बनीं।
स्मृति ईरानी के दादा एक स्वयंसेवक थे, और माँ BJP की बूथ कार्यकर्ता — यह रिश्ता पारिवारिक है।
जो वास्तविकता है:
पहली विडंबना — शिक्षा मंत्री और डिग्री का सवाल: जब वे मानव संसाधन विकास मंत्री थीं, तो उनकी शैक्षणिक योग्यता पर गंभीर प्रश्न उठे। हलफनामे में दी गई जानकारी और विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड में विसंगतियाँ मिलीं। वही महिला जो "शिक्षा" की मंत्री थीं, अपनी डिग्री नहीं बता सकती थीं।
दूसरी विडंबना — "महिला एवं बाल विकास" और गोवा शराब प्रकरण: महिला एवं बाल विकास मंत्री रहते हुए उनके परिवार के गोवा में शराब लाइसेंस से जुड़े मामले उजागर हुए — वही मंत्री जिनके विभाग का काम था बच्चों को शराब से दूर रखना।
तीसरी विडंबना — अमेठी की हार (२०२४): २०१९ में राहुल गाँधी को अमेठी से हराकर जो "महाविजय" मिली थी, वह २०२४ में धूल में मिल गई। अमेठी की जनता ने जवाब दे दिया।
चौथी विडंबना — "तुलसी" का पुनर्जन्म: २०२५ में लगभग दो दशकों के अंतराल के बाद, ईरानी ने "क्योंकि सास भी कभी बहू थी २" में तुलसी विरानी के रूप में अभिनय किया।
अमेठी से हारीं। मंत्री पद गया। तो वापस धारावाहिक!
असली प्रश्न:
"तुलसी" एक आदर्श थी — पतिव्रता, त्यागी, सहनशील।
लेकिन क्या यही आदर्श है हिंदुत्व की "आदर्श नारी" का?
एक ऐसी स्त्री जो पुरुष-प्रधान राजनीतिक तंत्र की सेवा करे, और जब काम नहीं आए — तो वापस TV धारावाहिक की "आदर्श बहू" बन जाए?
यह सशक्तीकरण है या उपकरणीकरण?
चौथा रूप: कंगना रनौत — "रानी" की राजनीति
जो दिखाया गया:
चार राष्ट्रीय पुरस्कार। "क्वीन।" निडर। "मणिकर्णिका।" पद्मश्री। मंडी से सांसद।
कंगना की कहानी वास्तव में प्रभावशाली है — अपनी प्रतिभा से बॉलीवुड में जगह बनाई, नेपोटिज्म का विरोध किया, मजबूत महिला किरदार निभाए।
लेकिन फिर...
जो वास्तविकता है:
कंगना रनौत की दूसरी निर्देशन कृति, जीवनी नाटक "Emergency" (२०२५), जिसमें उन्होंने इंदिरा गाँधी की भूमिका निभाई, को आलोचकों ने बुरी तरह नकारा।
किसान आंदोलन पर बयान: २०२१ में उन्होंने किसान आंदोलन को "खालिस्तानियों" और "सेक्स वर्कर्स" का जमावड़ा बताया। किसानों की माताएँ ट्रैक्टरों पर थीं, बुजुर्ग दादाएँ धूप में बैठे थे — और कंगना ने उन्हें "यौनकर्मी" कहा।
बांग्लादेश पर बयान: उन्होंने कहा कि बांग्लादेश को "दोबारा पाकिस्तान में मिला देना चाहिए।" एक सांसद का बयान — जिसने संसदीय मर्यादा को ताक पर रखा।
आपातकाल फिल्म और चुनाव: "Emergency" — एक ऐसी फिल्म जो इंदिरा गाँधी और कांग्रेस की आलोचना पर केंद्रित थी — चुनाव से पहले रिलीज होनी थी। चुनाव आयोग ने रोका। फिल्म बाद में रिलीज हुई और बुरी तरह फ्लॉप हुई।
मणिकर्णिका की विडंबना: उन्होंने "रानी लक्ष्मीबाई" की भूमिका निभाई — एक महिला जिसने स्वतंत्रता के लिए लड़ी। और अब वे उसी BJP की सांसद हैं जो किसानों पर, पत्रकारों पर, विपक्ष पर दमन करती है।
लक्ष्मीबाई ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध लड़ी थीं। कंगना उस दल की सेवा करती हैं जो अपने ही नागरिकों के विरुद्ध लड़ता है।
एक और कड़वा सच:
जो महिला कभी बॉलीवुड के "गैंग" का विरोध करती थी — अपनी स्वतंत्र आवाज़ के लिए जानी जाती थी — वह आज सत्ता के सबसे बड़े "गैंग" की प्रवक्ता है।
यह "रानी" है — या हिंदुत्व के दरबार की "रानी-दासी"?
इन चारों में एक समानता क्या है?
यहाँ रुकिए। गहरी साँस लीजिए। और सोचिए।
ये चारों महिलाएँ — उमा, ऋतम्भरा, स्मृति, कंगना — अलग-अलग पृष्ठभूमि से हैं। अलग-अलग कहानियाँ हैं।
लेकिन हिंदुत्व की राजनीति ने इन्हें एक ही साँचे में ढाला है:
साँचा १ — "दुर्गा अवतार":
स्त्री को शक्ति का प्रतीक बनाओ — लेकिन वह शक्ति केवल "शत्रु" (मुसलमान, ईसाई, कांग्रेस, किसान) के विरुद्ध इस्तेमाल हो। स्वयं उस तंत्र के विरुद्ध नहीं जो उसे इस्तेमाल कर रहा है।
साँचा २ — "त्यागी माँ":
स्त्री का निजी जीवन, निजी इच्छाएँ, निजी विकल्प — सब "राष्ट्र" के लिए समर्पित। उमा अविवाहित साध्वी। ऋतम्भरा सन्यासिनी। स्मृति "बहू"। कंगना भी जब राजनीति में आईं तो "माँ भारती की सेविका।"
साँचा ३ — "विरोधियों की शत्रु":
इन चारों की "शक्ति" का उपयोग हमेशा "अन्य" के विरुद्ध होता है। अल्पसंख्यक, विपक्ष, किसान, पत्रकार — जो भी सत्ता से प्रश्न करे।
साँचा ४ — "उपकरण और भुला दो":
उमा भारती — बाबरी के बाद किनारे कर दिया गया। ऋतम्भरा — नब्बे के दशक के बाद "निम्न प्रोफाइल" में डाल दिया गया। स्मृति ईरानी — अमेठी हारीं, मंत्रालय गया। कंगना रनौत — Emergency फ्लॉप, अगला रोल क्या?
जब "उपकरण" काम का नहीं रहता — तो बदल दो।
यह हिंदुत्व की "नारी-शक्ति" का असली सच है।
तुलना करें — असली आदर्श नारियाँ कौन थीं?
यह पोस्ट किसी को "अच्छे" और "बुरे" में बाँटने के लिए नहीं है।
लेकिन जब "आदर्श भारतीय नारी" की बात हो, तो इतिहास में झाँकना ज़रूरी है।
सावित्रीबाई फुले — जिन्होंने १८४८ में पहला लड़कियों का स्कूल खोला। जातिवाद और पितृसत्ता के विरुद्ध खड़ी हुईं। उन पर गोबर फेंका गया। वे झुकी नहीं।
फातिमा शेख — सावित्रीबाई की साथी, भारत की पहली मुस्लिम महिला शिक्षिका। क्या हिंदुत्व इन्हें "आदर्श" बताता है?
डॉ. सुशीला नय्यर — गाँधी की साथी, डॉक्टर, स्वतंत्रता सेनानी।
कमलादेवी चट्टोपाध्याय — हस्तशिल्प की पुनर्जागरणकर्ता, समाजवादी, राष्ट्रनिर्माता।
मेधा पाटकर — नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता। आदिवासियों के हक के लिए दशकों से संघर्षरत।
इरोम शर्मिला — मणिपुर की "आयरन लेडी", जो AFSPA के विरुद्ध सोलह साल अनशन पर रहीं।
इनमें से एक को भी हिंदुत्व ने "पद्म" नहीं दिया। इनमें से किसी को भी "आदर्श नारी" नहीं बताया।
क्योंकि ये स्त्रियाँ सत्ता की सेवा नहीं करती थीं। ये सत्ता से लड़ती थीं।
और हिंदुत्व को वह "आदर्श नारी" चाहिए जो सत्ता की सेवा करे — सत्ता से प्रश्न न करे।
रूप-पूजा की नारी-राजनीति: एक सूत्र में
याद है पिछली पोस्ट में हमने कहा था:
"रूप की पूजा भारत में बहुत पुरानी है।"
हिंदुत्व ने इन चार महिलाओं को "दुर्गा के रूप" के रूप में प्रस्तुत किया।
लेकिन असली दुर्गा की पूजा उसके सिद्धांतों की पूजा है — न उसके रूप की।
दुर्गा ने असुरों को मारा था।
आज के असुर कौन हैं?
वे नहीं — जिन पर उमा और ऋतम्भरा ने निशाना साधा।
असली असुर हैं: — बेरोजगारी — अशिक्षा — जातीय भेदभाव — महिलाओं पर हिंसा — सांप्रदायिक नफ़रत
इन असुरों के विरुद्ध इन चारों में से कोई नहीं लड़ी।
इसीलिए ये "आदर्श नारी" नहीं हैं।
ये हिंदुत्व की रूप-माया हैं।
अंत में — एक प्रश्न
हमारी आदर्श नारी कैसी हो?
जो पत्थर तोड़े या जो पत्थर की पूजा करे? जो सड़क पर उतरे या जो मंच पर भाषण दे? जो अन्याय से लड़े या जो अन्याय का हथियार बने?
असली रूप-पूजा वह है — जो न रूप देखे, न दिखावा।
जो देखे — आत्मा।
और आत्मा वहाँ है — सावित्रीबाई के स्कूल में, मेधा पाटकर के धरने में, इरोम शर्मिला के अनशन में।
वहाँ नहीं — जहाँ भगवा वस्त्र है, पद्म पुरस्कार है, और नफ़रत के भाषण हैं।
सबकुछ दिखता है।
दृष्टि होनी चाहिए।
प्रेम से बोलो — जय भीम। जय संविधान। जय भारत।
यह पोस्ट "Community Development ग्राम स्वराज" Substack (@akshat08) पर प्रकाशित।
इस श्रृंखला की पहली पोस्ट: "रूप / मूर्ति पूजा — और वो बहुरूपिया जो हर संकट में नया रूप धरता है"
संबंधित शोध पत्र: "रूप-पूजा, मूर्ति-उपासना और हिंदुत्व की राजनीति" — इतिहास पत्रिका हेतु
टिप्पणी:
यह पोस्ट किसी व्यक्ति विशेष की निजी आलोचना नहीं है। यह एक राजनीतिक-वैचारिक विश्लेषण है — इस बात का कि कैसे एक राजनीतिक विचारधारा स्त्री-शक्ति के प्रतीकों का उपयोग अपनी सत्ता को वैधता देने के लिए करती है। सार्वजनिक जीवन में लिए गए सार्वजनिक निर्णयों की जाँच-पड़ताल लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है।
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