मैं उलझता नहीं, पितरों का तर्पण करता हूँ
कुंभ राशि, सत्य, न्याय और मेरे जीवन का आध्यात्मिक अर्थ
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"क्यों उलझते हो तुम बड़े लोगों से?"
यह प्रश्न मैंने जीवन में अनेक बार सुना है।
हर बार मुस्कुरा कर मन में एक ही उत्तर आया—
"मैं उलझता नहीं हूँ...
मैं पितरों का तर्पण करता हूँ।"
यह तर्पण केवल जल, तिल और मंत्रों का नहीं है।
यह तर्पण है—
- सत्य के पक्ष में खड़े होने का,
- अन्याय पर प्रश्न उठाने का,
- और उस नैतिक ऋण को चुकाने का, जो पीढ़ियों से हमारे भीतर प्रवाहित होता आया है।
मेरी समझ में पितर केवल दिवंगत पूर्वज नहीं हैं।
वे हमारी सामूहिक स्मृति हैं।
वे हमारी गूढ़ चेतना हैं।
वे हमारे भीतर जीवित वह स्वर हैं जो पूछता है—
"क्या तुमने धर्म का साथ दिया?"
मैंने अपने परिवार के इतिहास को केवल घटनाओं की श्रृंखला नहीं माना।
कभी-कभी लगता है कि कुछ अधूरे प्रश्न पीढ़ियों से चलते आए हैं—
- सत्य के,
- न्याय के,
- उत्तराधिकार के,
- और विश्वास के।
मैं इन्हें दोष नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व की दृष्टि से देखना चाहता हूँ।
यदि किसी पीढ़ी ने सत्य से समझौता किया हो,
तो अगली पीढ़ी का धर्म केवल संपत्ति संभालना नहीं,
बल्कि चरित्र की विरासत को पुनः स्थापित करना भी हो सकता है।
शायद इसी कारण मेरे जीवन में बार-बार ऐसे प्रसंग आए,
जहाँ लोग पूछते रहे—
"इतना क्यों बोलते हो?"
"इतना क्यों लिखते हो?"
"सिस्टम से क्यों टकराते हो?"
मेरा उत्तर आज भी वही है—
मैं किसी व्यक्ति से नहीं टकराता।
मैं उस असत्य से प्रश्न करता हूँ जो पीढ़ियों तक जीवित रह सकता है यदि उसे चुनौती न दी जाए।
यदि यह संघर्ष मुझे अकेला बनाता है,
तो शायद यह भी उसी यात्रा का एक भाग है।
महाभारत का विदुर भी भीड़ में रहते हुए अकेला था।
मेरे लिए पितृ तर्पण का अर्थ अब केवल श्राद्ध पक्ष का एक अनुष्ठान नहीं रहा।
यह एक जीवन-दृष्टि है।
जब भी हम—
- सत्य को सुविधा पर चुनते हैं,
- न्याय को पक्षपात पर चुनते हैं,
- और धर्म को भय पर चुनते हैं,
तब हम केवल अपना नहीं,
अपने पितरों का भी सम्मान करते हैं।
इसलिए यदि कोई फिर पूछे—
"क्यों उलझते हो बड़े लोगों से?"
तो शायद मैं फिर मुस्कुरा कर कहूँगा—
"मैं उलझता नहीं हूँ।
मैं पितरों का तर्पण करता हूँ।"
क्योंकि मेरे लिए तर्पण केवल जल अर्पण नहीं,
सत्य और न्याय के प्रति आजीवन निष्ठा का संकल्प है।
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