बाएँ से: राधाकृष्णजी बजाज · पंडित जवाहरलाल नेहरू · डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन · विनोबा भावे।
चार जीवन-दर्शन, एक क्षण में — विचार, राजनीति, दर्शन और ऋषित्व का संगम।
यह फ़ोटोग्राफ़ केवल चार व्यक्तियों का नहीं है। यह मानव-चेतना के तीन स्तरों का एक दुर्लभ दृश्य-साक्ष्य है — जब विचारक (Thinker), दार्शनिक (Philosopher) और ऋषि (Seer) एक ही स्थान पर, एक ही क्षण में उपस्थित हों। और उनके बीच में खड़े हों — नेहरू — जो इन तीनों को जोड़ने वाली लोकतांत्रिक चेतना के प्रतीक हैं।
डॉ. राधाकृष्णन और भगवद्गीता — एक असाधारण भाष्य
सर्वपल्ली राधाकृष्णन (१८८८–१९७५) भारत के उन विरल विद्वानों में से हैं जिन्होंने भगवद्गीता को न केवल हिंदू धर्म-ग्रंथ के रूप में, बल्कि सार्वभौमिक मानव-चेतना के दस्तावेज़ के रूप में प्रस्तुत किया। उनकी १९४८ की रचना — The Bhagavadgita — आज भी पूर्वी और पश्चिमी दर्शन के बीच सेतु-ग्रंथ मानी जाती है।
"The Gita is not a scripture for Hindus alone. It is addressed to all men and women who are perplexed by the problem of existence, who are doubtful about their duty. Its teaching is not a creed to be accepted but a challenge to be lived."
— Dr. S. Radhakrishnan, The Bhagavadgita, 1948राधाकृष्णन ने गीता में तीन मार्गों — ज्ञान, भक्ति और कर्म — को केवल धार्मिक पथ नहीं, बल्कि चेतना के तीन स्तरों की अभिव्यक्ति माना। यही वह दृष्टि है जो उन्हें एक साधारण टीकाकार से अलग करती है — वे Philosophy को Darshan बनाते हैं, और Darshan को जीवन।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥हे धनंजय, आसक्ति को त्यागकर सिद्धि-असिद्धि में समभाव रखते हुए
योग में स्थित होकर कर्म करो — यही समत्व-भाव योग है।भगवद्गीता · अध्याय २ · श्लोक ४८
राधाकृष्णन इस श्लोक को Active Mysticism का मूल सूत्र मानते थे — वह रहस्यवाद जो संसार से पलायन नहीं करता, बल्कि संसार में रहते हुए उससे अलिप्त रहता है। यही वह चेतना है जो विचारक से दार्शनिक की ओर, और दार्शनिक से ऋषि की ओर जाती है।
विचारक — नेहरू और राधाकृष्ण बजाज
दार्शनिक — राधाकृष्णन का असाधारण योगदान
जो दार्शनिक है, वह समझता है।
जो ऋषि है — वह हो जाता है।
ऋषि — विनोबा और स्थितप्रज्ञ की अवस्था
राधाकृष्णन ने जिया: Thinking → Philosophising → Seeing।
गीता ने दिखाया: ज्ञान → भक्ति → कर्म।
तीनों एक ही सीढ़ी के तीन पड़ाव हैं।
इस फ़ोटोग्राफ़ को देखिए फिर से। बोधगया — वह भूमि जहाँ सिद्धार्थ बुद्ध हुए। वहाँ चार व्यक्ति एकत्र हैं — जो भारत के चार चेहरे हैं: राजनीतिक चेतना, आर्थिक चेतना, दार्शनिक चेतना और आध्यात्मिक चेतना।
डॉ. राधाकृष्णन उनमें से वह कड़ी हैं जो पश्चिम को पूर्व की भाषा में और पूर्व को पश्चिम की भाषा में समझाते हैं। उनका गीता-भाष्य इसी अनुवाद का श्रेष्ठतम उदाहरण है।

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