यह रचना फ़िल्मी गीत "मेरे महबूब तुझे मेरी मुहब्बत की कसम" की विनयपूर्ण पुकार और गीता के अर्जुन-कृष्ण संवाद की आध्यात्मिक प्यास—दोनों को एक साथ जोड़ने का प्रयास करती है।
ओ मेरे खुदा तुझे खुदाई की कसम
ओ मेरे खुदा तुझे खुदाई की कसम, फिर मुझे सत्य-अहिंसा की ज्योत दे दे, भटक गया हूँ मैं अपने ही वन में, मेरा खोया हुआ आत्मस्वरूप दिखला दे।
मैंने इक बार तेरी झलक से अनंत आकाश का सौंदर्य देखा था, उसी नूर की याद में भटक रहा हूँ, फिर वही दिव्य दृष्टि दिखा दे।
तू ही तो था जो अंधियारे पथ पर मेरा सारथी बनकर चला था, फिर से जीवन-रथ की लगाम थाम ले, मेरी दिशा और दशा बना दे।
काम, क्रोध, लोभ, मोह के कौरव चारों ओर डेरा डाले बैठे हैं, हे माधव! मेरे भीतर का अर्जुन जगा, और धर्मयुद्ध का साहस दे दे।
अहंकार की धूल ने दर्पण को इतना मलिन कर डाला है, अपने करुणा-जल से धोकर मुझे मेरा असली चेहरा दिखला दे।
दुनिया के मेले में सब कुछ पाया, पर अपने आप को खो बैठा, अब इस झूठे वैभव से उबारकर मुझे सत्य का खजाना दे दे।
एक बार फिर कुरुक्षेत्र मेरे अंतर्मन में साकार हो रहा है, आकर फिर गीता सुना दे, संशयों का सारा अंधकार मिटा दे।
तेरे नाम की एक किरण भी यदि हृदय में उतर जाए प्रभु, सदियों से सोई चेतना को जागृति का अमृत पिला दे।
मैं न राज्य माँगूँ, न वैभव, न यश, न स्वर्ग का कोई सुख, बस इतनी कृपा कर कि हर प्राणी में तेरा ही स्वरूप दिखा दे।
ओ मेरे खुदा तुझे खुदाई की कसम, मेरी अंतिम विनती सुन ले, तेरे प्रेम में मिट जाऊँ ऐसा वर दे, और मुझको मुझसे मिला दे।
आत्मस्वरूप-विनय
दोहा
ओ मेरे खुदा कृपानिधि, सुनि अरज हमारी आज। सत्य अहिंसा ज्योति दे, मिटै मोह तम काज॥
चौपाई
हे प्रभु दीनदयाल कृपाला। भ्रमित भयो मन अति विकलाला॥
माया मोह घनेरे घेरे। भूले निज पद, पथ सब टेरे॥
एक झलक जब तोहि निहारा। अंतर दीप जला उजियारा॥
क्षण भर को जो दर्शन पायो। जीवन का सत भाव लखायो॥
अब पुनि करहु कृपा भगवंता। बनहु सारथी चित्त अनंता॥
ज्यों कुरुक्षेत्र मध्य रथ हांका। भ्रमित अर्जुन का संशय टांका॥
त्यों मम मन रणभूमि अपारा। काम क्रोध दल करहिं पुकारा॥
लोभ मोह मद मात्सर भारी। घेरे चहुँदिसि सेन हमारी॥
बुद्धि विवेक भयो सब सोया। अंतर ज्ञान सरोवर खोया॥
आवहु नाथ पकड़ि कर मोरा। दिखलावहु निज रूप निहोरा॥
खोया आत्म स्वरूप दिखावा। सत्य मार्ग पुनि हृदय बसावा॥
फिर गीता उपदेश सुनावा। जीवन धर्म रहस्य बतावा॥
कर्म करौं निष्काम सुहाए। फल अभिमान निकट नहिं आए॥
दया धर्म उर बीच बिराजा। सत्य सुधा भरि जीवन साजा॥
अहिंसा की ज्योति प्रज्वलावा। मन मंदिर तम दूर भगावा॥
जागे चेतन शक्ति सुपावन। होय हृदय हरि नाम सुहावन॥
जीव सकल में तोहि निहारी। मिटै भेद बुद्धि संसारी॥
तेरे बल रिपु षड् दल मारौं। काम क्रोध पर विजय सँभारौं॥
लोभ मोह मद दंभ नसावौं। निज अंतर के राम जगावौं॥
जब लग प्राण रहे तन माहीं। सेवा धर्म छूटे नहि काहिं॥
अंत समय जब आवै बेरा। नाम तुम्हारो हो अधेरा॥
दोहा
सारथी बनि साथ रहु, हे करुणा के धाम। खोया मुझको दे मिलन, जागे अंतर राम॥
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