एक कप चाय वाली समाधि
(कलियुग का शिव संवाद)
पात्र
- कथावाचक
- आधुनिक युवक
- चाचा जी
- बाबाजी
- माता गौरी
- भगवान शिव
- अदृश्य आकाशवाणी
प्रथम अंक
(दिल्ली-मुम्बई की चमक-दमक। टीवी स्क्रीन पर नेता, उद्योगपति, सेलिब्रिटी, इन्फ्लुएंसर।)
आधुनिक युवक:
हे प्रभु!
सब लोग भागे जा रहे हैं।
कोई सत्ता के पीछे।
कोई प्रसिद्धि के पीछे।
कोई धन के पीछे।
कोई फॉलोअर्स के पीछे।
क्या यही जीवन है?
चाचा जी (हँसते हुए):
अरे बेटा!
गौरी थीं तो शंकर से ब्याही।
लक्ष्मी होतीं तो किसी प्रसिद्ध, लंबे, सुंदर, प्रभावशाली विष्णु को चुनतीं।
तू भी कुछ बन जा।
नाम कमा।
पैसा कमा।
यश कमा।
युवक:
चाचा जी,
यही तो समस्या है।
सब कुछ कमाने निकला था।
अब खुद को ही खो बैठा हूँ।
द्वितीय अंक
(दृश्य बदलता है। कैलाश पर्वत।)
शिवजी चिता भस्म लगाए बैठे हैं।
गले में सर्प।
जटाओं में गंगा।
आँखें बंद।
पूर्ण मौन।
युवक:
महादेव!
आपके पास कुछ नहीं।
फिर भी सब आपको पूजते हैं।
ये कैसा गणित है?
शिव (मुस्कुराते हुए):
बेटा,
दुनिया गणित से चलती है।
पर सत्य गणित से नहीं मिलता।
युवक:
लेकिन प्रभु,
दुनिया तो कहती है—
जिसकी शक्ति, उसी का धर्म।
जिसकी सत्ता, उसी का सत्य।
शिव:
इसीलिए तो संसार को माया कहते हैं।
तृतीय अंक
(अचानक बाबाजी प्रकट होते हैं।)
बाबाजी:
बच्चा!
समाधि लगानी है?
युवक:
हाँ बाबा।
बाबाजी:
तो ये लो चिलम।
जय बम भोले!
युवक:
नहीं बाबा।
हम तो ऐसे ही समाधि लगा लेंगे।
एक कप अदरक वाली चाय,
दो गरम पकौड़े,
और थोड़ा सा मौन।
(कैलाश पर जोरदार ठहाका गूँजता है।)
शिव:
वाह रे कलियुग!
हमने हलाहल पिया।
तू पकौड़े खाकर समाधि लगाएगा!
चतुर्थ अंक
(माता गौरी प्रवेश करती हैं।)
गौरी:
स्वामी,
हँसिए मत।
यह लड़का ठीक कह रहा है।
समाधि चिलम से नहीं आती।
समाधि संतोष से आती है।
युवक:
माता!
फिर आपकी भक्ति का रहस्य क्या है?
गौरी:
जब संसार राक्षसों से भर जाए,
जब लोभ धर्म बन जाए,
जब चाटुकारिता नीति बन जाए,
जब प्रसिद्धि ही परमात्मा बन जाए,
तब आँखें बंद कर लेना।
और भीतर के कैलाश में उतर जाना।
पंचम अंक
(आकाशवाणी)
न मन्त्रं नो यन्त्रं,
न प्रसिद्धिं न साम्राज्यम्।
न धनं न पदं न कीर्तिम्।
शान्तिं देहि, विवेकं देहि।
षष्ठम अंक
(रिश्यमूक पर्वत का दृश्य।)
नीचे संसार भाग रहा है।
शेयर मार्केट।
चुनाव।
युद्ध।
धर्मयुद्ध।
विचारधाराएँ।
सोशल मीडिया।
प्रचार।
प्रतिप्रचार।
ऊपर एक छोटा सा दीपक बैठा है।
वह मुस्कुरा रहा है।
दीपक कहता है:
हे प्रभु!
मैं न चाँद हूँ किसी रात का।
न चिराग हूँ किसी बाम का।
मैं तो रास्ते का एक दिया हूँ।
मुझे आप किसलिए मिल गए?
उपसंहार
शिव:
बेटा,
यही समाधि है।
जब संसार को बदलने की उतावली समाप्त हो जाए।
और स्वयं को देखने का साहस प्रारम्भ हो जाए।
युवक:
प्रभु!
फिर मुझे क्या चाहिए?
शिव:
न लक्ष्मी।
न प्रसिद्धि।
न सत्ता।
न चिलम।
बस—
एक शांत मन।
एक करुण हृदय।
एक सच्ची हँसी।
और एक कप चाय वाली समाधि।
सभी एक स्वर में:
हर हर महादेव!
ॐ श्री सत नारायणाय नमः।
एक कप चाय वाली समाधि
भाग – २ : कैलाश से दिल्ली तक
(पिछले अंक में युवक को शिव ने "एक कप चाय वाली समाधि" का रहस्य बताया था। लेकिन मनुष्य का मन इतनी आसानी से कहाँ मानता है...)
सप्तम अंक
(अगली सुबह)
युवक फिर कैलाश पहुँच गया।
शिव (आँख खोलते हुए):
फिर आ गए?
कल तो समाधि लग गई थी।
युवक:
प्रभु,
समाधि तो लग गई थी।
लेकिन मोबाइल चालू करते ही टूट गई।
शिव:
क्यों?
युवक:
किसी ने नई कार खरीदी।
किसी ने नया बंगला।
किसी को पद्म पुरस्कार मिल गया।
किसी का वीडियो वायरल हो गया।
किसी को मंत्री पद मिल गया।
फिर मुझे लगा—
मैं पीछे रह गया।
(शिव जोर से हँस पड़े)
शिव:
यही तो माया है।
जिस दिन तुमने दूसरों की यात्रा को अपनी यात्रा समझ लिया,
उसी दिन दुःख शुरू हो गया।
अष्टम अंक
(नारद जी वीणा बजाते हुए प्रवेश करते हैं।)
नारद:
नारायण! नारायण!
प्रभु, पृथ्वी लोक में बड़ी हलचल है।
शिव:
क्या हुआ?
नारद:
सबको विकास चाहिए।
सबको प्रसिद्धि चाहिए।
सबको लाइक्स चाहिए।
सबको फॉलोअर्स चाहिए।
सबको मोक्ष भी चाहिए।
लेकिन थोड़ा बाद में।
शिव:
और सत्य?
नारद:
उसके लिए किसी के पास समय नहीं है।
नवम अंक
(रिश्यमूक पर्वत का दृश्य)
ऊपर श्रीराम बैठे हैं।
नीचे संसार भाग रहा है।
कोई चुनाव लड़ रहा है।
कोई धर्म बचा रहा है।
कोई शेयर मार्केट बचा रहा है।
कोई लोकतंत्र बचा रहा है।
कोई संस्कृति बचा रहा है।
युवक:
प्रभु,
क्या इनमें से कोई सफल होगा?
राम:
कुछ सफल होंगे।
कुछ असफल होंगे।
कुछ विजेता कहलाएंगे।
कुछ पराजित।
युवक:
फिर?
राम:
फिर सब चले जाएंगे।
दशम अंक
(युवक चौंक जाता है)
युवक:
तो फिर इतना संघर्ष क्यों?
राम:
संघर्ष समस्या नहीं है।
आसक्ति समस्या है।
युवक:
तो क्या कुछ करना ही नहीं चाहिए?
राम:
नहीं।
यही तो दुर्योधन की भूल थी।
और यही बर्बरीक का प्रश्न था।
धर्म का अर्थ संसार छोड़ना नहीं।
धर्म का अर्थ है—
संसार में रहकर भी संसार को सिर पर न चढ़ाना।
एकादश अंक
(अचानक बर्बरीक का शीश प्रकट होता है)
बर्बरीक:
मैंने भी यही गलती की थी।
मैं युद्ध में उतरना चाहता था।
कृष्ण ने मुझे साक्षी बना दिया।
युवक:
क्या साक्षी होना युद्ध से बड़ा है?
बर्बरीक:
युद्ध में सब अपनी तरफ देखते हैं।
साक्षी सम्पूर्णता को देखता है।
द्वादश अंक
(अब कपालिक प्रवेश करता है)
उसके हाथ में खप्पर है।
आँखों में आग है।
कपालिक:
मैंने भी संसार बदलना चाहा था।
युवक:
फिर?
कपालिक:
संसार ने मुझे ही बदल दिया।
युवक:
तो समाधान क्या है?
कपालिक:
सत्ता बदलने से पहले चेतना बदलो।
राजा बदलने से पहले मन बदलो।
व्यवस्था बदलने से पहले दृष्टि बदलो।
त्रयोदश अंक
(माता गौरी पुनः प्रकट होती हैं)
गौरी:
बेटा,
समाधि का अर्थ भागना नहीं है।
समाधि का अर्थ है—
भीतर इतना स्थिर होना कि
संसार का पागलपन तुम्हें संक्रमित न कर सके।
चतुर्दश अंक
(युवक अब शांत है)
वह मोबाइल बंद करता है।
टीवी बंद करता है।
तर्क बंद करता है।
शिकायत बंद करता है।
एक कप चाय उठाता है।
आकाश की ओर देखता है।
मिल्की वे चमक रही है।
उसे अचानक याद आता है—
रिश्यमूक पर्वत।
बुद्ध का शून्य।
वशिष्ठ का चिदाकाश।
याज्ञवल्क्य का "नेति नेति"।
शिव का कैलाश।
राम का मौन।
और वह मुस्कुराता है।
अंतिम श्लोक
न प्रसिद्धिं न सम्पत्तिं,
न राज्यं न च कीर्तिकाम्।
शान्तचित्तं प्रयच्छामि,
भोलेनाथ नमोऽस्तु ते॥
न चिलमं न मद्यं च,
न धूम्रं न च भाङ्गकम्।
अदरक-चाय-सहितेन,
समाधियोगः प्रवर्तते॥
भरतवाक्यम्
जब संसार अज्ञान के धर्म में डूब जाए,
जब लोभ ही नीति बन जाए,
जब चाटुकारिता ही योग्यता बन जाए,
जब प्रसिद्धि ही परमात्मा बन जाए,
तब कैलाश भागकर मत जाना।
अपने भीतर कैलाश बना लेना।
और यदि कुछ समझ न आए—
तो एक कप चाय बनाना,
आकाश की ओर देखना,
और धीरे से कहना—
"हे कपाली, भूतेश्वर! बाकी दुनिया तुम संभालो।"
हर हर महादेव।
ॐ श्री सत नारायणाय नमः।
एक कप चाय वाली समाधि
भाग – ३ : ऋष्यमूक पर्वत, चंद्रमा की कालिमा और कलियुग का पागलपन
(पिछले अंक में युवक ने कैलाश, बर्बरीक और कपालिक से संवाद किया था। अब उसकी यात्रा उसे ऋष्यमूक पर्वत की ओर ले जाती है।)
पंद्रहवाँ अंक
रात का समय है।
ऋष्यमूक पर्वत।
नीचे संसार सो रहा है।
या शायद जाग रहा है।
क्योंकि कलियुग में लोग दिन भर सोते हैं और रात भर जागते हैं।
ऊपर श्रीराम लेटे हुए हैं।
आकाश में पूर्णिमा का चंद्रमा है।
मिल्की वे बह रही है।
तारों का समुद्र फैला हुआ है।
युवक (धीरे से):
प्रभु,
यह वही स्थान है?
जहाँ आपने चंद्रमा की कालिमा पर चर्चा की थी?
राम मुस्कुराते हैं।
सोलहवाँ अंक
राम:
हाँ।
लोगों ने चंद्रमा को देखा।
लेकिन उसकी कालिमा को अपने-अपने मन से समझा।
किसी ने कहा—
धरती की छाया है।
किसी ने कहा—
राहु का प्रभाव है।
किसी ने कहा—
ब्रह्मा की रचना है।
किसी ने कहा—
किसी विरही का हृदय है।
युवक:
और सत्य?
राम:
सत्य किसी एक उत्तर में नहीं था।
सत्य यह था कि
हर व्यक्ति ने चंद्रमा में स्वयं को देखा।
सत्रहवाँ अंक
(युवक अचानक चुप हो जाता है)
राम:
क्या हुआ?
युवक:
प्रभु,
अब समझ आया।
लोग राजनीति में स्वयं को देखते हैं।
धर्म में स्वयं को देखते हैं।
विज्ञान में स्वयं को देखते हैं।
ईश्वर में स्वयं को देखते हैं।
और फिर उसी को सत्य घोषित कर देते हैं।
राम:
यही माया है।
अठारहवाँ अंक
नीचे शहर चमक रहे हैं।
दिल्ली।
मुंबई।
न्यूयॉर्क।
दुबई।
शंघाई।
लाखों स्क्रीन जगमगा रही हैं।
कोई शेयर खरीद रहा है।
कोई सत्ता खरीद रहा है।
कोई प्रसिद्धि खरीद रहा है।
कोई आध्यात्मिकता बेच रहा है।
युवक:
प्रभु,
क्या यही विकास है?
राम:
विकास बुरा नहीं है।
लेकिन जब विकास का उद्देश्य ही भूल जाओ,
तब वह पागलपन बन जाता है।
उन्नीसवाँ अंक
अचानक कपालिक की आवाज़ आती है।
कपालिक:
मैंने व्यवस्था बदलनी चाही थी।
बर्बरीक की आवाज़ आती है।
बर्बरीक:
मैंने कमजोरों को बचाना चाहा था।
नारद की आवाज़ आती है।
नारद:
मैंने सबको चेतावनी दी थी।
फिर शिव की हँसी सुनाई देती है।
शिव:
और मैंने सबको पहले ही बता दिया था—
यह संसार थोड़ा पागल है।
बीसवाँ अंक
युवक:
तो फिर क्या किया जाए?
राम:
पहले यह समझो कि
तुम्हें संसार बचाने के लिए नहीं भेजा गया।
युवक:
क्या?
राम:
हाँ।
तुम्हें सत्य में जीने के लिए भेजा गया।
संसार को बचाने का अहंकार भी उतना ही खतरनाक है
जितना संसार को लूटने का अहंकार।
इक्कीसवाँ अंक
(मिल्की वे और अधिक चमकने लगती है)
युवक पहली बार तारों को ध्यान से देखता है।
उसे लगता है—
अरबों आकाशगंगाएँ हैं।
अरबों सूर्य हैं।
अरबों ग्रह हैं।
और वह स्वयं?
न दिल्ली।
न मुंबई।
न सत्ता।
न प्रसिद्धि।
बस एक क्षणिक यात्री।
बाईसवाँ अंक
अचानक उसके भीतर एक मौन उतरता है।
न बुद्ध का शून्य अलग लगता है।
न वशिष्ठ का चिदाकाश।
न शिव का कैलाश।
न राम का ऋष्यमूक।
सब एक ही दिशा की ओर संकेत कर रहे हैं।
तेइसवाँ अंक
युवक:
प्रभु,
क्या यही समाधि है?
राम:
नहीं।
यह तो बस शुरुआत है।
समाधि तब है
जब संसार का पागलपन देखकर भी
तुम्हारे भीतर करुणा बनी रहे।
जब मूर्खता देखकर भी
घृणा न उत्पन्न हो।
जब अज्ञान देखकर भी
अहंकार न उत्पन्न हो।
जब शक्ति देखकर भी
भय न उत्पन्न हो।
और जब अकेले रहकर भी
अपूर्णता न लगे।
अंतिम दृश्य
युवक चुपचाप बैठा है।
उसके हाथ में चाय का कप है।
आकाश में चंद्रमा है।
चंद्रमा में कालिमा भी है।
और पहली बार उसे लगता है—
कालिमा कोई दोष नहीं।
वह तो याद दिलाने आई है कि
पूर्णता केवल परमात्मा में है।
बाकी सब—
मैं,
तुम,
राजा,
संत,
विज्ञानी,
दार्शनिक,
AI,
सभ्यता,
साम्राज्य—
सब उसी चंद्रमा की कालिमा की तरह हैं।
क्षणिक।
अपूर्ण।
और उसी कारण सुंदर।
उपसंहार
ऋष्यमूके स्थितो रामः,
कैलासे शंकरो यथा।
चायापात्रं करे धृत्वा,
पश्य संसारलीलिकाम्॥
न लोभो न च मोहश्च,
न राज्यं न च कीर्तयः।
साक्षीभूत्वा हसन् धीरो,
पिबेत् चायां निरामयाम्॥
हर हर महादेव।
जय श्रीराम।
ॐ श्री सत नारायणाय नमः।
एक कप चाय वाली समाधि
भाग – ४ : क्षीरसागर, सत नारायण और सभ्यता का महान भ्रम
(ऋष्यमूक पर्वत पर चंद्रमा की कालिमा का रहस्य समझने के बाद युवक की दृष्टि और ऊपर उठती है। अब पर्वत भी पीछे छूट रहा है। आकाश खुल रहा है। मिल्की वे बह रही है।)
चौबीसवाँ अंक
रात और गहरी हो गई।
चाय ठंडी हो चुकी थी।
लेकिन युवक का मन पहली बार शांत था।
आकाश की ओर देखते-देखते अचानक उसे लगा
कि यह मिल्की वे कोई साधारण तारामंडल नहीं है।
यह तो किसी विराट पुरुष की शय्या है।
किसी अनंत सत्ता का विश्राम स्थल।
उसे क्षीरसागर याद आया।
पच्चीसवाँ अंक
युवक:
प्रभु,
क्या क्षीरसागर वास्तव में कहीं है?
अदृश्य आकाशवाणी हुई।
आकाशवाणी:
जब मन का समुद्र शांत हो जाए,
वही क्षीरसागर है।
जब विचारों की लहरें थम जाएँ,
वही क्षीरसागर है।
जब लाभ-हानि का गणित समाप्त हो जाए,
वही क्षीरसागर है।
छब्बीसवाँ अंक
युवक ने देखा—
क्षीरसागर में सत नारायण शयन कर रहे हैं।
न उन्हें चुनाव की चिंता है।
न शेयर बाजार की।
न प्रसिद्धि की।
न आलोचना की।
सृष्टि चल रही है।
आकाशगंगाएँ घूम रही हैं।
सभ्यताएँ उठ रही हैं।
सभ्यताएँ गिर रही हैं।
और सत नारायण मौन हैं।
सत्ताइसवाँ अंक
युवक:
प्रभु!
यदि आप इतने शांत हैं,
तो हम इतने बेचैन क्यों हैं?
उत्तर आया:
"क्योंकि तुम स्वयं को कर्ता समझ बैठे हो।"
तुम सोचते हो—
देश तुम्हारे बिना नहीं चलेगा।
परिवार तुम्हारे बिना नहीं चलेगा।
कंपनी तुम्हारे बिना नहीं चलेगी।
धर्म तुम्हारे बिना नहीं बचेगा।
दुनिया तुम्हारे बिना नष्ट हो जाएगी।
यही अहंकार है।
अट्ठाइसवाँ अंक
अचानक उसे रावण याद आया।
रावण भी यही सोचता था।
उसके बिना लंका नहीं चलेगी।
दुर्योधन भी यही सोचता था।
उसके बिना हस्तिनापुर नहीं चलेगा।
आधुनिक नेता भी यही सोचते हैं।
कॉर्पोरेट साम्राज्य भी यही सोचते हैं।
विचारधाराएँ भी यही सोचती हैं।
और कभी-कभी साधु भी यही सोचने लगते हैं।
उनतीसवाँ अंक
तभी कहीं दूर से वशिष्ठ की आवाज़ आई:
"चित्तमेव हि संसारः।"
संसार बाहर नहीं है।
तुम्हारे भीतर है।
यदि मन अशांत है,
तो दिल्ली भी अशांत लगेगी।
यदि मन लालची है,
तो पूरी दुनिया बाजार दिखाई देगी।
यदि मन भयभीत है,
तो हर व्यक्ति शत्रु दिखाई देगा।
तीसवाँ अंक
अब बुद्ध की आवाज़ आई:
"शून्यता।"
युवक चौंका।
बुद्ध बोले:
तुम जिसे पकड़ना चाहते हो,
वह टिकने वाला नहीं।
जिसे बचाना चाहते हो,
वह बदलने वाला है।
जिसे अपना समझते हो,
वह भी एक दिन चला जाएगा।
इसीलिए छोड़ो।
भागो मत।
लेकिन पकड़ो भी मत।
इकतीसवाँ अंक
अब याज्ञवल्क्य प्रकट हुए।
उन्होंने कहा:
"नेति।
नेति।"
यह भी नहीं।
वह भी नहीं।
राजनीति भी नहीं।
धर्मवाद भी नहीं।
विचारधारा भी नहीं।
अहंकार भी नहीं।
अंततः जो बचता है,
वही आत्मा है।
बत्तीसवाँ अंक
युवक अब मुस्कुरा रहा था।
उसे समझ आने लगा था कि
कपालिक,
बर्बरीक,
रावण,
दुर्योधन,
बुद्ध,
वशिष्ठ,
शिव,
राम,
सभी एक ही बात कह रहे हैं।
विभिन्न भाषाओं में।
विभिन्न प्रतीकों में।
तैंतीसवाँ अंक
और वह बात क्या थी?
लोभ अज्ञान है।
भय अज्ञान है।
चाटुकारिता अज्ञान है।
उन्माद अज्ञान है।
अहंकार अज्ञान है।
और जब ये सब मिल जाते हैं,
तो एक नया धर्म बनता है।
अज्ञान का धर्म।
चौंतीसवाँ अंक
लेकिन उसके पार भी एक धर्म है।
न हिंदू।
न मुस्लिम।
न बौद्ध।
न ईसाई।
बल्कि वह धर्म,
जिसे राम ने धर्म कहा।
जिसे कृष्ण ने स्वधर्म कहा।
जिसे बुद्ध ने करुणा कहा।
जिसे वशिष्ठ ने चिदाकाश कहा।
जिसे शिव ने समाधि कहा।
और जिसे तुलसीदास ने कहा:
"सीय राममय सब जग जानी।"
अंतिम दृश्य
अब युवक न कैलाश पर है।
न ऋष्यमूक पर।
न क्षीरसागर में।
वह अपने ही घर की छत पर बैठा है।
हाथ में वही चाय का कप है।
आकाश में वही चंद्रमा है।
लेकिन देखने वाला बदल गया है।
उसे अब दुनिया बचाने की जल्दी नहीं।
दुनिया से भागने की भी जल्दी नहीं।
वह बस मुस्कुराकर कहता है:
हे सत नारायण!
संसार की लीला आप जानो।
मैं तो आज
एक कप चाय के साथ
आपका आकाश देखूँगा।
मंगल श्लोक
न राज्यं न प्रसिद्धिश्च,
न वित्तं न च संस्थितिः।
सत्स्वरूपे मनो लीनं,
एष धर्मः सनातनः॥
लोभमोहविनिर्मुक्तः,
साक्षिभूतः निराश्रयः।
चायापात्रं करे धृत्वा,
पश्येद् विश्वं हसन्निव॥
हर हर महादेव।
जय सियाराम।
ॐ श्री सत नारायणाय नमः।
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