भीष्म, गद्दी और मौन का पाप
“देख अर्जुन…
ये रहा तेरा पितामह।
जिसे संसार धर्मात्मा कहता है।
जिसे लोग प्रतिज्ञा पुरुष कहते हैं।
जिसके चरण छूकर राजे-महाराजे स्वयं को धन्य मानते हैं।
पर आज यह यहां धर्म की रक्षा के लिए नहीं खड़ा।
यह खड़ा है —
गद्दी की रक्षा के लिए।
अहंकार की रक्षा के लिए।
अपने प्रण की जिद्द की रक्षा के लिए।”
महाभारत केवल युद्ध नहीं था।
वह सभ्यता का आईना था।
भीष्म जैसे महापुरुष का पतन इसलिए नहीं हुआ कि वह शक्तिहीन थे।
उनका पतन इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने अन्याय को पहचानने के बाद भी सत्ता का साथ छोड़ा नहीं।
उन्होंने देखा:
- द्रौपदी का अपमान,
- छल से जुआ,
- अंधा पुत्रमोह,
- राज्य का भ्रष्टाचार,
- अधर्म का गठबंधन,
फिर भी सिंहासन के प्रति अपनी प्रतिज्ञा को धर्म से ऊपर रखा।
यहीं से विनाश शुरू होता है।
सबसे खतरनाक व्यक्ति वह नहीं जो खुलकर अधर्म करे।
सबसे खतरनाक वह है — जो सब समझता हो, पर अपनी प्रतिष्ठा, सुविधा, वफादारी, पद, परिवार, संस्था या “प्रतिज्ञा” के कारण मौन खड़ा रहे।
इतिहास में ऐसे लोग सम्मानित दिखते अवश्य हैं, पर अंततः वे अधर्म की ढाल बन जाते हैं।
श्रीकृष्ण का क्रोध दुर्योधन पर उतना नहीं था, जितना उन लोगों पर था जो सत्य जानकर भी तटस्थ बने रहे।
क्योंकि अत्याचारी अकेले शक्तिशाली नहीं होता।
उसे शक्ति मिलती है:
- बुद्धिजीवियों के मौन से,
- बुजुर्गों की निष्क्रियता से,
- धर्माचार्यों की सुविधा से,
- और समाज के डर से।
“मार अर्जुन!”
यह केवल हिंसा का आह्वान नहीं था।
यह मोह भंग का आदेश था।
उन बाणों का अर्थ था:
- भ्रम को भेदना,
- झूठी महानता को गिराना,
- सत्ता से चिपके अहंकार को तोड़ना,
- और उस मौन को समाप्त करना जो अधर्म को जीवन देता है।
भीष्म की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं थी कि वे बाणों की शय्या पर गिरे।
सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि वे अपनी प्रतिज्ञा के कैदी बन चुके थे।
उनकी जिद्द उन्हें जीने भी नहीं दे रही थी, और मरने भी नहीं।
यही अहंकार का अंतिम परिणाम है।
मनुष्य अपने ही बनाए व्रत, अपनी ही बनाई छवि, अपनी ही बनाई “महानता” का बंदी बन जाता है।
आज भी समाज में अनेक भीष्म खड़े हैं।
शिक्षित।
सम्मानित।
प्रभावशाली।
धार्मिक दिखने वाले।
पर सत्य के क्षण में — सिंहासन के साथ।
वे हर युग में मिलेंगे:
- राजनीति में,
- मीडिया में,
- परिवारों में,
- संस्थाओं में,
- कॉर्पोरेट जगत में,
- और धार्मिक मंचों पर भी।
महाभारत हमें सिखाता है:
अधर्म हमेशा दुर्योधन के रूप में नहीं आता।
कभी-कभी वह भीष्म के मौन में भी छिपा होता है।
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