सरस्वती, लक्ष्मी और आधुनिक संबंधों का मायाजाल
“जो लक्ष्मी जी को हो पसंद, वही संस्कृत में छंद कहेंगे।
हे मातेश्वरी सरस्वती देवी,
हम तो तेरी करुणा-आराधना में ही डूबेंगे।”
भारतीय सभ्यता ने हमेशा जीवन को केवल अर्थ और उपभोग से नहीं देखा। यहाँ मनुष्य को केवल कमाने वाली मशीन नहीं माना गया।
यहाँ कला थी, साधना थी, भक्ति थी, करुणा थी, विरक्ति थी।
लेकिन आधुनिक समय में धीरे-धीरे सबकुछ बाज़ार बनता जा रहा है।
संबंध भी।
विवाह भी।
कला भी।
भक्ति भी।
आज व्यक्ति का मूल्य उसके भीतर की चेतना से नहीं, बल्कि उसकी आय, स्टेटस, नेटवर्क और “मार्केट वैल्यू” से आँका जाने लगा है।
शायद इसलिए आज का साधक सबसे अधिक अकेला है।
कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना
कितने संबंध आज वास्तव में आत्मिक हैं?
ऊपर से प्रेम, भीतर से गणित।
ऊपर से अपनापन, भीतर से स्वार्थ।
ऊपर से भावनाएँ, भीतर से सुरक्षा और सुविधा का सौदा।
“कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना।
विवाह के बंधन में ही क्यों फँस जाना!”
आधुनिक विवाह का संकट यही है कि वह धीरे-धीरे आध्यात्मिक साझेदारी से हटकर कानूनी, आर्थिक और सामाजिक अनुबंध बनता जा रहा है।
दो लोग आत्म-विकास और धर्मयात्रा के साथी कम, और expectations management के भागीदार अधिक बन गए हैं।
फिर आश्चर्य कैसा कि व्यक्ति भीतर से घुटने लगता है?
साधक और संसार का टकराव
एक साधक का मन स्वभावतः भीतर की ओर जाता है।
उसे मौन चाहिए।
संगीत चाहिए।
प्रभु की भक्ति चाहिए।
सत्य की खोज चाहिए।
लेकिन मायावी संसार साधक को समझ नहीं पाता।
वह पूछता है:
“इससे मिलेगा क्या?”
“कमाओगे कितना?”
“सेटल कब होगे?”
“प्रैक्टिकल कब बनोगे?”
संसार को साधना नहीं दिखती।
उसे केवल utility दिखती है।
यही कारण है कि कई बार अत्यंत संवेदनशील, कलात्मक और भक्तिपूर्ण व्यक्ति आधुनिक संबंधों में स्वयं को विस्थापित महसूस करते हैं।
विवाह: बंधन या साझी साधना?
भारतीय परंपरा में विवाह केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं था।
वह धर्म, अर्थ, काम और अंततः मोक्ष की संयुक्त यात्रा माना गया था।
लेकिन जब विवाह केवल सुविधा, सुरक्षा, स्टेटस या आर्थिक नियंत्रण का माध्यम बन जाए, तब उसमें आत्मा सूखने लगती है।
तभी भीतर से ऐसी पीड़ा निकलती है:
“देखो ब्याह का कॉन्ट्रैक्ट ठीक से पढ़ लो,
कहीं कल कहो — तन, मन, धन सब है मेरा, क्या लागे तेरा!”
यह केवल हास्य या व्यंग्य नहीं है।
यह उस व्यक्ति की कराह है जिसने संबंधों में आध्यात्मिकता खोजी, लेकिन बदले में लेन-देन पाया।
इंजीनियर, भक्त और आधुनिकता का संघर्ष
आज का शिक्षित व्यक्ति विशेष रूप से द्वंद्व में है।
एक ओर आधुनिक पेशेवर जीवन की कठोरता, प्रतिस्पर्धा और मशीन जैसी संरचना।
दूसरी ओर भीतर बैठा संवेदनशील मन जो संगीत, साहित्य, भक्ति और शांति चाहता है।
इसीलिए कभी-कभी जीवन स्वयं एक विडंबना बन जाता है:
“बड़ी गलती करी तैने,
इंजीनियर समझ एक बावरे, साधक, भक्त से रचा लियो ब्याह!
अब इसे स्वांग न कहें तो क्या कहें!”
समाज व्यक्ति के profession को देखता है।
लेकिन उसकी आत्मा को नहीं देखता।
एक इंजीनियर भी भीतर से कवि हो सकता है।
एक कॉर्पोरेट प्रोफेशनल भीतर से विरक्त संत हो सकता है।
एक वैज्ञानिक भीतर से कृष्णभक्त हो सकता है।
लेकिन आधुनिक दुनिया मनुष्य को roles में बाँध देती है।
लक्ष्मी बनाम सरस्वती नहीं, संतुलन की आवश्यकता
भारतीय दर्शन ने कभी लक्ष्मी का विरोध नहीं किया।
समस्या तब शुरू होती है जब लक्ष्मी, सरस्वती को नियंत्रित करने लगती है।
जब धन कला पर शासन करने लगे।
जब बाज़ार भक्ति को निर्देशित करने लगे।
जब संबंध चेतना से अधिक संपत्ति पर टिक जाएँ।
तब भीतर का संगीत टूटने लगता है।
सच्चा संतुलन वहीं है जहाँ लक्ष्मी भी हो, लेकिन सरस्वती के चरणों में विनम्र होकर।
अंतिम प्रार्थना
शायद अंततः हर साधक की पुकार यही होती है:
“प्रभु, मैं जीवन भर आपकी भक्ति करूँ,
और ये गाड़े रहें गिद्ध दृष्टि मेरी जेब पर!”
यह शिकायत केवल किसी व्यक्ति से नहीं है।
यह पूरे भौतिकवादी युग से संवाद है।
एक ऐसा युग जहाँ मनुष्य की आत्मा धीरे-धीरे बाज़ार में नापी जा रही है।
फिर भी आशा शेष है।
जब तक कोई एक व्यक्ति भी संगीत को साधना मानेगा,
प्रेम को व्यापार नहीं बनने देगा,
और सरस्वती की करुणा में डूबा रहेगा —
तब तक भारतीय सभ्यता जीवित रहेगी।
॥ हरि ॐ ॥

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