Saturday, May 2, 2026

पंच तत्वों की कृपा — एक कविता

 

पंच तत्वों की कृपा — एक कविता

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कुंती देवी पर जब कृपा बरसी,
पाँच देवों की छाया हँसी,
जन्मे पाँच पांडव ऐसे,
जैसे उँगलियाँ जुड़ बनें मुट्ठी।


एक में बल, एक में नीति,
एक में ज्ञान, एक में प्रीति,
एक में धैर्य, पाँचों में एकता—
यही तो थी प्रकृति की रीति।


मैंने पूछा गुरुदेव से जाकर—
“आजकल कृपा क्यों नहीं होती?
क्यों नहीं उतरते देव हमारे,
क्यों धरती अब सूनी रोती?”


गुरु मुस्काए, धीमे बोले—
“बेटा, प्रश्न बड़ा गहरा है,
देव कृपा तो आज भी बरसे,
पर पात्र कहाँ अब ठहरा है?”


चारदीवारी में बंद हुआ मन,
आंगन सूना, हवा भी कैद,
रोशनदानों से रिश्ता टूटा,
छत भी अब बस कंक्रीट का भेद।


मिट्टी, जल, अग्नि, वायु, आकाश—
पाँचों तत्व हुए पराए,
जब घर ही प्रकृति से कट जाए,
तो देवता कैसे मुस्काए?


अब तो जन्में कौरव नये-नये,
रिश्ते भी कुछ कृत्रिम से,
जननी, माता, ममता खोई,
बंधन बस औपचारिक से।


ना आंगन की वह गोद रही,
ना छप्पर की ठंडी छाँव,
ना माँ के हाथों का वह स्पर्श,
ना जीवन में सरल बहाव।


मोह-माया का शोर बहुत है,
तू-तू मैं-मैं की दीवारें,
पाँच उँगलियाँ बिखरी-बिखरी,
मुट्ठी बनना अब है भारी।


गुरु बोले— “समझो फिर से,
देव कृपा कोई कथा नहीं,
जब तत्वों से संगति होगी,
कृपा बरसने में देर नहीं।”


🪶 अंतिम पंक्ति

जब मन, घर और जीवन में,
पाँच तत्व फिर से मिल जाएँ—
तब ही कुंती सी कृपा बरसे,
और पांडव फिर जन्म में आएँ।


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