Friday, January 30, 2026

गड़बड़ानंद स्वामी रचित जुमलेश्वर पुराण

 


जुमलेश्वर गाथा

(एक युग का आत्मालाप — जब शब्दों ने सत्ता पहन ली)


अब जुमलेश्वर गाथा सुनो।
सुनो उस युग की कथा,
जहाँ सत्य बोलने से पहले
तालियाँ देखी जाती थीं,
और न्याय से पहले
कैमरा ऑन होता था।


प्रथम दृश्य : प्रणाम और प्रहार

“प्रभु, पहले झुक कर पैर छुए,
फिर गोली मार दी।”

हाँ… यही कला थी जुमलेश्वर की।
पहले चरण-वंदना,
फिर चरण-भंग।

पहले श्रद्धा,
फिर सर्जिकल स्ट्राइक।

और भीड़ बोली —
“वाह! क्या रणनीति है!”


द्वितीय दृश्य : नाम की राजनीति

“बेटा, आज से जो भी गांधी नाम लेगा,
वो भय-संताप से मुक्त हो जाएगा।”

और फिर क्या था —
गांधी नाम का ठेका खुला,
सत्य बंद हो गया।

किसी ने चरखा नहीं काता,
पर हर कोई राष्ट्रपिता बनने लगा।


शास्त्र बोले — पर कौन सुने?

बिप्रबंस कै असि प्रभुताई।
अभय होइ जो तुम्हहि डराई॥

पर यहाँ तो उल्टा हुआ प्रभु —
जो डराता गया, वही देवता बनता गया।

और जो प्रश्न करता रहा,
उसे राष्ट्रद्रोही कहा गया।


तृतीय दृश्य : प्राण-प्रतिष्ठा का तमाशा

“क्षमा प्रभु, आपके अंदर प्राण प्रतिष्ठा करी,
और आपको लल्लू राम कहकर
उंगली पकड़कर पूरे जगत में घुमाया।”

राम नाम था,
पर रामभाव नहीं।

मूर्ति खड़ी थी,
पर मर्यादा लापता थी।

धूप-दीप जल रहे थे,
और भीतर अहंकार की आग।


चतुर्थ दृश्य : भुजाओं का अहंकार

निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।
सुनि सेवक दुख दीनदयाला। फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला॥

भुजाएँ उठीं,
पर करुणा नहीं।

हाथ उठे,
पर वर नहीं — वार के लिए।

और सेवक?
वह तो तालियाँ बजा रहा था।


पंचम दृश्य : ब्रह्मकुल का अपमान

चल न ब्रह्मकुल (महात्मा) सन बरिआई।
सत्य कहउँ दोउ भुजा उठाई॥

जो मौन थे,
उन्हें डराया गया।

जो तपस्वी थे,
उन्हें ट्रोल किया गया।

क्योंकि अब
ब्रह्म नहीं, ब्रांड चलता था।


षष्ठ दृश्य : बुलडोज़र दर्शन

“हे महिपाल,
ये धरती तेरे जैसे बुलडोजर का बोझ भी सह लेती है,
पर तू खुद अपने ही भार से काँप रहा है।”

धरती ने सब सहा —
राजा, रंक, तानाशाह।

पर इतिहास गवाह है —
हर बुलडोज़र अंत में
खुद मलबा बनता है।


सप्तम दृश्य : त्याग का बाज़ार

“मैंने देश के लिए बीवी छोड़ दी…”

वाह!
अब त्याग भी प्रेस-कॉन्फ्रेंस में बिकता है।

कालनेमी मुस्कुराया,
बोला — “इनाम मिलेगा।”

और सच में मिला —
तालियाँ, पद, और लाइक्स।


अंतिम दृश्य : जो मर चुका है

“इसे गोली नहीं चाहिए,
ये तो दिन में तीन बार गालियाँ खाता है।”

सही कहा।

जो आत्मा से मर चुका हो,
उसे मृत्यु नहीं डराती।

जो विवेक खो चुका हो,
उसे अपमान भी अमृत लगता है।


उपसंहार : काल का निर्णय

बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला।
तोर नास नहि कवनेहुँ काला॥

हे जुमलेश्वर,
तेरा अंत किसी शाप से नहीं होगा।

तुझे मिटाएगा —
तेरा ही अहंकार।

तेरा ही शोर।
तेरा ही झूठ।

क्योंकि—

जो सत्ता सत्य से डर जाए,
उसका पतन काल लिख चुका होता है।


🕯️ अंतिम पंक्ति

“मरे हुए को क्या मारना —
वह तो इतिहास में पहले ही दफ़न हो चुका है।”



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