Thursday, January 15, 2026

ईश्वर का राजनीतिक अपहरण धर्म (ऋत) का विकृतिकरण और सत्ता का दुरुपयोग संत बनाम सत्ता



ईश्वर का राजनीतिक अपहरण

धर्म (ऋत) का विकृतिकरण और सत्ता का दुरुपयोग

संत बनाम सत्ता

(पूर्व लेख का संदर्भ)

यह लेख उस वैचारिक शृंखला का अगला चरण है, जिसमें
राम–रब–नाम को नाम–रूप–गुण से परे, एक साझा चेतना के रूप में समझा गया था।

पिछले लेख का संदर्भ (embedded context):
https://akshat08.blogspot.com/2026/01/blog-post_15.html


प्रस्तावना: सबसे बड़ी ऐतिहासिक विकृति

मानव इतिहास की सबसे बड़ी वैचारिक विकृति यह नहीं थी कि
धर्म बने,
बल्कि यह थी कि—

धर्म को ही “मत”, “religion”, “belief-system” में बदल दिया गया।

जबकि पारंपरिक भारतीय, संत और सूफ़ी दृष्टि में:

  • धर्म = ऋत
  • धर्म = जीवन को धारण करने वाला सत्य
  • धर्म = नैतिक-सत्य का नियम
  • धर्म = चेतना का अनुशासन

धर्म न तो संस्था था,
न ही पहचान-पत्र,
न ही मतदाता सूची।

धर्म आचरण था

यहीं से सत्ता और धर्म के बीच का वास्तविक टकराव शुरू होता है।


1. सत्ता द्वारा धर्म का दुरुपयोग — सही शब्दावली

यह कहना कि “धर्म के नाम पर बने धर्मों का दुरुपयोग हुआ”
स्वयं धर्म को ही दोषी ठहराता है।

सही बात यह है:

👉 धर्म को विकृत करके,
उसे मत / religion / मान्यता बना कर,
सत्ता ने उसका दुरुपयोग किया।

यह विकृतिकरण तीन चरणों में होता है:

  1. धर्म (ऋत) को
    belief-system में बदल देना
  2. belief-system को
    सामूहिक पहचान बना देना
  3. उस पहचान को
    सत्ता का औज़ार बना देना

इस पूरी प्रक्रिया में धर्म नहीं बोलता।
धर्म चुप करा दिया जाता है।


2. धर्म और religion का मूल अंतर (स्पष्ट भेद)

धर्म (ऋत) Religion / मत
जीवन का सत्य विश्वास की प्रणाली
आचरण-केंद्रित पहचान-केंद्रित
भीतर से नियंत्रित बाहर से संचालित
प्रश्न करता है उत्तर थोपता है
सत्ता से असुविधाजनक सत्ता के लिए उपयोगी

सत्ता धर्म से डरती है,
क्योंकि धर्म पूछता है:

  • क्या तुम न्यायी हो?
  • क्या तुम करुणामय हो?
  • क्या तुम सत्यनिष्ठ हो?

religion ये प्रश्न नहीं पूछता।
वह केवल वफादारी मांगता है।


3. ईश्वर का राजनीतिक अपहरण क्या है? (संशोधित परिभाषा)

ईश्वर का राजनीतिक अपहरण
धर्म का नहीं,
धर्म के विकृतिकृत रूप — religion — का राजनीतिक उपयोग है।

यह तब होता है जब:

  • ईश्वर को चेतना के केंद्र से हटाकर
    सत्ता की वैधता का प्रतीक बना दिया जाता है
  • धर्म (ऋत) के स्थान पर
    धार्मिक पहचान निर्णायक हो जाती है
  • आचरण गौण और नारा प्रमुख हो जाता है

इस स्थिति में:

ईश्वर पूज्य नहीं रहता,
उपयोगी बन जाता है।


4. संतों की स्थिति: धर्म की रक्षा, सत्ता का प्रतिरोध

संतों ने कभी धर्म नहीं बनाया।
उन्होंने धर्म को जिया

  • कबीर ने धर्म को
    पाखंड-विरोधी बनाया
  • मीरा ने धर्म को
    “राम रतन” की अनुभूति बनाया
  • नानक ने धर्म को
    “हुक्म” में चलना कहा
  • सूफ़ियों ने धर्म को
    “रब की रज़ा” कहा

संतों के लिए:

  • धर्म = भीतर की आग
  • ईश्वर = चेतना का साक्षी
  • नाम = साधना का उपकरण

इसलिए संत हमेशा सत्ता के लिए
असुविधाजनक रहे।


5. सत्ता की रणनीति: धर्म को religion बनाओ

जब सत्ता धर्म से डरती है,
तो वह उसे समाप्त नहीं करती।

वह उसे बदल देती है

  • ऋत → नियमावली
  • आचरण → पहचान
  • साधना → प्रदर्शन
  • सत्य → नारा

धर्म जीवित रहते हुए भी
निष्प्रभावी हो जाता है।


6. राम–रब–नाम की चेतावनी

राम, रब, अल्लाह, वाहेगुरु —
ये नाम धर्म नहीं थे।

ये धर्म की ओर संकेत थे।

जब तक:

  • राम = मर्यादा
  • रब = ज़िम्मेदारी
  • अल्लाह = न्याय
  • वाहेगुरु = अहंकार-विसर्जन

तब तक धर्म जीवित था।

जिस दिन:

  • राम = सत्ता का प्रतीक
  • रब = पहचान का चिन्ह
  • अल्लाह = डर का माध्यम
  • वाहेगुरु = नारा

उसी दिन
धर्म को religion में बदल दिया गया।


7. संत बनाम सत्ता — वास्तविक संघर्ष

यह संघर्ष धर्म बनाम राजनीति नहीं है।

यह संघर्ष है:

👉 धर्म (ऋत) बनाम धर्म का विकृतिकृत रूप (religion)

संत धर्म के साथ हैं।
सत्ता religion के साथ।

इसलिए संत अकेले होते हैं,
और सत्ता भीड़ के साथ।


 

नीचे वही लेख अगली तीनों कड़ियों को जोड़ते हुए एक पूर्ण, परिपक्व और सुसंगत रूप में प्रस्तुत है।
यह अब एक समापन-त्रयी (concluding trilogy) जैसा बन जाता है — जहाँ विश्लेषण, चेतावनी और उत्तरदायित्व एक साथ आते हैं।



संत बनाम सत्ता — अंतिम विमर्श


8. Religion क्यों सत्ता को प्रिय है, और धर्म क्यों “खतरनाक”

यह प्रश्न असहज है, पर अनिवार्य है।

Religion सत्ता को क्यों प्रिय है?

Religion (मत / belief-system) सत्ता को इसलिए प्रिय है क्योंकि वह:

  • पहचान देता है — “हम” और “वे”
  • नियम देता है — जिनकी व्याख्या सत्ता कर सकती है
  • भीड़ बनाता है — जिसे दिशा दी जा सकती है
  • वफादारी मांगता है — नैतिकता नहीं

Religion सत्ता से प्रश्न नहीं पूछता।
वह केवल यह पूछता है:
“तुम किस पक्ष में हो?”

इसीलिए religion
राजनीति के लिए सुविधाजनक है।


धर्म (ऋत) सत्ता के लिए खतरनाक क्यों है?

धर्म (ऋत) सत्ता से ऐसे प्रश्न पूछता है जो असहज होते हैं:

  • क्या यह निर्णय न्यायपूर्ण है?
  • क्या यह करुणामय है?
  • क्या यह सत्य के अनुरूप है?
  • क्या यह दुर्बल के पक्ष में है?

धर्म आचरण की कसौटी लगाता है,
जबकि सत्ता बहुमत की

धर्म भीतर से नियंत्रित करता है।
सत्ता बाहर से।

इसीलिए धर्म
सत्ता के लिए खतरनाक है।


9. ऋत, संविधान और नैतिक राज्य

शासन का भूला हुआ आधार

ऋत केवल आध्यात्मिक अवधारणा नहीं थी।
वह शासन का नैतिक आधार भी थी।

प्राचीन भारतीय चिंतन में:

  • राजा धर्म का निर्माता नहीं था
  • राजा धर्म का पालक था

अर्थात सत्ता ऋत के अधीन थी,
ऋत सत्ता के अधीन नहीं।


आधुनिक संविधान और ऋत

आधुनिक संविधान भी
अपने सर्वोत्तम रूप में
ऋत का ही लौकिक रूप है।

संविधान का उद्देश्य है:

  • सत्ता को सीमित करना
  • अधिकार और कर्तव्य का संतुलन
  • न्याय, समानता और गरिमा

जब संविधान को
केवल कानूनी दस्तावेज़ माना जाता है
और नैतिक आधार से अलग कर दिया जाता है,
तो वह भी religion की तरह
खोखला ढांचा बन जाता है।

ऋत के बिना संविधान
केवल प्रक्रिया रह जाता है।
ऋत के साथ संविधान
नैतिक राज्य बनाता है।


नैतिक राज्य क्या है?

नैतिक राज्य वह है जहाँ:

  • कानून से पहले विवेक हो
  • शक्ति से पहले उत्तरदायित्व हो
  • बहुमत से पहले न्याय हो

ऐसा राज्य
धर्म (ऋत) से डरता नहीं,
उससे दिशा पाता है।


10. संतों की चुप्पी और हमारी जिम्मेदारी

आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि
संत कहाँ हैं।

प्रश्न यह है कि
हम क्यों चुप हैं?


संत चुप क्यों हो गए?

संत इसलिए चुप नहीं हुए कि
सत्य समाप्त हो गया।

संत इसलिए चुप हुए क्योंकि:

  • सत्य को नारे में बदल दिया गया
  • धर्म को religion बना दिया गया
  • विवेक को पक्षधरता कहा जाने लगा

संत अकेले होते हैं।
और जब समाज
भीड़ बनना चुन ले,
तो संत हाशिए पर चले जाते हैं।


अब जिम्मेदारी किसकी है?

जब संत चुप होते हैं,
तो जिम्मेदारी नागरिक पर आती है।

धर्म को बचाने की जिम्मेदारी
किसी गुरु, किसी संत,
या किसी संस्था की नहीं —

हमारी है।

  • क्या हम सत्य के साथ खड़े हैं
    या केवल अपने पक्ष के साथ?
  • क्या हम न्याय चाहते हैं
    या सिर्फ़ जीत?
  • क्या हम धर्म जीना चाहते हैं
    या religion दिखाना?

अंतिम समापन:

धर्म की वापसी कैसे होगी?

धर्म की वापसी किसी आंदोलन से नहीं होगी।
धर्म की वापसी किसी सत्ता परिवर्तन से नहीं होगी।

धर्म की वापसी होगी जब:

  • हम आचरण को पहचान से ऊपर रखेंगे
  • हम न्याय को सुविधा से ऊपर रखेंगे
  • हम सत्य को अपने पक्ष से ऊपर रखेंगे

यहीं से
ईश्वर का राजनीतिक अपहरण रुकता है।

और यहीं से
धर्म — ऋत —
फिर से समाज का मौन नैतिक केंद्र बनता है।


अंतिम पंक्ति 

जब धर्म सत्ता का औज़ार बन जाए,
तो ईश्वर कैदी हो जाता है।

और जब धर्म आचरण बन जाए,
तो सत्ता स्वयं अनुशासित हो जाती है।




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