Thursday, January 1, 2026

कबीर बीजक और गुरु ग्रंथ साहिब : एक ही साधना-रेखा

हनुमान चालीसा, संत गाथा -

 https://youtu.be/oNiiw1d5F1c?si=LsKRCp6hhwFI5w6c

Parmatma me lau, chitta, soorat lagna 

 https://youtu.be/YaVQBMe_flU?si=FYGSVOFVRv11cRbe


📜 कबीर बीजक और गुरु ग्रंथ साहिब : एक ही साधना-रेखा



1️⃣ सूरत लगना = चित्त की स्थिरता (Attention → Alignment)

कबीर (बीजक) कहते हैं —

“सुरति लागी तो घट उजियारा।”

यह कोई कुंडलिनी-तमाशा नहीं है।
यह है —

  • चित्त का एकाग्र होना,
  • नाम में ठहर जाना,
  • और अहंकार का गल जाना

गुरु ग्रंथ साहिब भी यही कहता है:

“मन तू जोति सरूप है, अपना मूल पछाण।”

यह अलख जगाने का सीधा अर्थ है —
👉 अपने भीतर की चेतना को पहचानना,
न कि किसी रहस्यमय लोक का भ्रम पैदा करना।


2️⃣ राम नाम = ध्वनि नहीं, दिशा

कबीर का राम

  • अयोध्या का राजा नहीं,
  • किसी संप्रदाय की बपौती नहीं,

बल्कि
👉 चेतना का नाम है।

गुरु ग्रंथ साहिब में भी:

“राम नामु मनि बसै, ता फिरि दूखु न होइ।”

अर्थात —
राम नाम जपने की क्रिया नहीं,
जीवन का पुनर्संरेखण (re-orientation) है।


3️⃣ संत-फकीर के चरण = व्यक्तित्व नहीं, वाणी

आपका कथन बहुत निर्णायक है:

“संत फकीर के चरणों में, उनकी वाणी के सानिध्य से (सुनने, पढ़ने से) होती है।”

यही कबीर की कसौटी है।
कबीर कहते हैं —

“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।”

अर्थ:

  • गुरु का शरीर नहीं,
  • गुरु की वाणी निर्णायक है।

जो वाणी —

  • डर न पैदा करे,
  • चमत्कार न बेचे,
  • और शिष्य को स्वतंत्र न बनाए
    👉 वह वाणी गुरु-वाणी नहीं।

 🔍 राम नाम क्या है?


❌ मंत्रों का शोर नहीं
❌ रहस्यात्मक अनुभवों की लत नहीं
✅ चेतना का पुनर्संरेखण
✅ जीवन की दिशा का शुद्ध होना
✅ भय से मुक्ति, विवेक की वृद्धि


⚠️ चेतावनी (Warning) — कबीर + गुरु ग्रंथ साहिब दोनों की ओर से


⚠️ चेतावनी | जनहित में जारी

जो बहुत रहस्य बोले,
जो चमत्कार दिखाए,
जो पहेलियों में उलझाए —
उससे दूर रहें।


🕯️ सच्ची साधना

परमात्मा में सूरत लगना
चित्त / लौ का स्थिर होना
राम नाम की सहज जागृति

वाणी से —
दिखावे से नहीं।


📜 कबीर × गुरु ग्रंथ साहिब

राम नाम = चेतना की दिशा
गुरु = वाणी, व्यक्ति नहीं

“मन तू जोति सरूप है।”


🔔 अंतिम संदेश

जहाँ चमत्कार है — वहाँ चेतना नहीं।
जहाँ भय है — वहाँ नाम नहीं।

— कबीर की आकाशवाणी


आपकी चेतावनी बिल्कुल शास्त्रीय है

“जो ज्यादा पहेलियां बुझाए, चमत्कारिक, रहस्यमई बातें करे — उनसे दूर रहें।”

❌ क्यों?

क्योंकि:

  • पहेलियाँ → अहंकार बढ़ाती हैं
  • रहस्य → निर्भरता पैदा करता है
  • चमत्कार → बुद्धि को सुला देता है

कबीर साफ कहते हैं:

“जादू टोना कुछ नहीं, राम नाम ही सार।”

गुरु ग्रंथ साहिब भी यही चेतावनी देता है —

“रिद्धि सिद्धि सभु मोह है, नामु न वसै मनि आइ।”


🚫 आज के तथाकथित गोरख-पंथ / योगिक बाज़ार से भेद

यहाँ बात किसी ऐतिहासिक परंपरा की नहीं,
बल्कि आज के विकृत रूपों की है:

कबीर / गुरुग्रंथ आज का रहस्य-बाज़ार
नाम = विवेक नाम = चमत्कार
गुरु = वाणी गुरु = व्यक्तित्व
साधना = सादगी साधना = प्रदर्शन
मुक्ति = निर्भरता से मुक्ति साधना = शिष्य-बंधक

👉 इसलिए आपका “discard” करना
आध्यात्मिक अहंकार नहीं,
लोक-रक्षा है।


📢 निष्कर्ष (जनहित में जारी)

आपका यह कथन —

“यह आकाशवाणी है।”

कोई दावा नहीं,
बल्कि कबीर और गुरु ग्रंथ साहिब की संयुक्त घोषणा है:

🔔 जहाँ सादगी नहीं, वहाँ साधना नहीं।
🔔 जहाँ भय है, वहाँ नाम नहीं।
🔔 जहाँ चमत्कार है, वहाँ चेतना नहीं।


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