Summary -
राम कृष्ण आदि लौकिक देवी देवताओं का गुरुग्रंथ साहेब aur अन्य संत साहित्य में भी उल्लेख है। उन्हें नकारा नहीं गया, पर इन सबको परमात्मा के अवतार (निम्न स्तर पर) के रूप में दिखाया गया, इसलिए संत फकीर साहित्य बहुदेववाद का प्रचार नहीं करता, पूरी दुनिया में GOD, अल्लाह, भगवान, ईश्वर, परमात्मा को लेकर कोई मतभेद नहीं।
देवी देवता लौकिक संस्कृति, रीति रिवाजों, त्योहारों का आधार हैं।
https://youtu.be/cjR_Q0wpWO8?si=XKhvZqqth3PmLOj9
जिसने कभी संत महात्माओं के चरणों में सिर नहीं झुकाया, वो तरह तरह की बहकी बहकी बातें करता है, जैसे राहु केतु ने सूर्य को निगल लिया है।
और सूर्य को भी प्रकाश देने वाली परम सत्ता (भर्गो देवस्य) गायत्री की तरफ तो उसका ध्यान ही नहीं। जो हमें परम ज्ञान (धी मही) प्रदान करती है।
https://youtu.be/v1dkhnG542Q?si=FofygkT_Fzt9sQ7Q
https://youtu.be/H7rTnVkXBT0?si=pl6Nok9QsrR38HGf
संत–फकीर वाणी और पुराण–कथाएँ
समझने में कठिन क्यों लगती हैं?
(कबीर बीजक × तुलसी रामायण × गुरु ग्रंथ साहिब)
🔹 भूमिका
अक्सर लोग पूछते हैं —
“अगर संत–वाणी और रामायण–पुराण सत्य हैं, तो वे इतने अस्पष्ट, बहुअर्थी और भ्रमित करने वाले क्यों लगते हैं?”
यह प्रश्न आस्था का नहीं,
भाषा, समाज और सत्ता के इतिहास का है।
1️⃣ भाषा का संकट: शास्त्र से लोक तक
संत–फकीरों और कवियों ने
अध्यात्म को संस्कृत / पाली / अपभ्रंश जैसी दार्शनिक भाषाओं से निकालकर
ग्राम–लोक–भाषा में रखा।
पर यही लोक-भाषा समस्या भी बनी।
उदाहरण: “मन” शब्द
कविता और कथा में मन का अर्थ अलग-अलग हो सकता है:
- चित्त
- अन्तःकरण
- बुद्धि
- अहं
- या केवल तुकबंदी का सहारा
👉 इसलिए एक ही शब्द का
हर जगह एक जैसा अर्थ करना भूल है।
2️⃣ एक शब्द, अनेक अर्थ: मिथ्या नहीं, माध्यम
जैसे —
“33 करोड़ देवता”
यह गणित नहीं है।
यह 33 प्रकार की चेतन प्रवृत्तियों / शक्तियों / मानव-प्रजातीय गुणों का संकेत है।
लेकिन लोक में इसे
👉 गिनती बना दिया गया।
यहीं से
अर्थ-भ्रंश (misinterpretation) शुरू होता है।
3️⃣ संत–वाणी का असली उद्देश्य
❗ संत–वाणी शास्त्र नहीं है
❗ संत–वाणी दर्शन का अनुवाद है
👉 जन-सुलभ अनुवाद
इसलिए:
- संत–वाणी लौकिक भाषा में लिखी गई
- ताकि बहुजन समाज
शास्त्र से कट न जाए - पर इससे अर्थ में
भेद और भ्रम पैदा हुआ
4️⃣ संत–वाणी = राम सेतु (Bridge)
यह बिंदु सबसे निर्णायक है।
संत–वाणी एक सेतु है, ठीक राम सेतु की तरह —
| एक किनारा | दूसरा किनारा |
|---|---|
| अद्वैत / परब्रह्म / निर्गुण | द्वैत / लोक–देवता / सगुण |
| दर्शन | संस्कृति |
| तत्वज्ञान | आस्था |
👉 यह सेतु
टूटे तो समाज बिखर जाता है।
5️⃣ अवतार की अवधारणा: दार्शनिक नहीं, सामाजिक उपकरण
जब संत कहते हैं —
“परमात्मा ने अवतार लिया”
तो उसका अर्थ यह नहीं कि
परम तत्व ने शरीर धारण किया।
👉 इसका अर्थ है:
सामान्य जन में परमात्मा के प्रति आस्था जगाने का प्रतीक।
6️⃣ ऐतिहासिक सत्य (असुविधाजनक लेकिन आवश्यक)
❗ ब्राह्मण–पंडित सत्ता ने
- बहुजन / शूद्र समाज को
- अध्यात्म–शास्त्र से
- जानबूझकर दूर रखा
शास्त्र भाषा और अधिकार बन गया।
7️⃣ संतों की रणनीति (बहुत सूक्ष्म)
संतों ने:
- लोक–देवताओं को नकारा नहीं
- क्योंकि इससे संस्कृति टूट जाती
- बल्कि उन्हें परमात्मा का ही रूप कहा
👉 यह समन्वय (integration) था,
संघर्ष नहीं।
📜 उदाहरण 1:
गुरु ग्रंथ साहिब में
हरि, गोपाल, गोविंद जैसे शब्द आते हैं।
❌ इसका अर्थ यह नहीं कि
ग्रंथ द्वारकाधीश कृष्ण की लीला गा रहा है।
✅ इसका अर्थ है:
लोक-परिचित नामों से
निर्गुण परमात्मा की ओर संकेत।
📜 उदाहरण 2:
खुद स्पष्ट कहते हैं:
“राम से बड़ा राम का नाम।”
👉 यह सीधा कथन है:
- रूप से ऊपर नाम
- कथा से ऊपर तत्व
- अवतार से ऊपर चेतना
8️⃣ निष्कर्ष: भ्रम क्यों होता है?
क्योंकि हम:
- लोक–भाषा को शास्त्र मान लेते हैं
- प्रतीक को इतिहास
- और सेतु को अंतिम सत्य
🔔 अंतिम स्पष्टता
संत–वाणी = न दर्शन है, न मिथक
संत–वाणी = सेतु हैजो सेतु को घर बना लेता है,
वह कभी पार नहीं कर पाता।
🔗 Supplementary Reading
(Embedded as requested)
👉 https://akshat08.blogspot.com/2026/01/blog-post.html
नीचे Diagrammatic Explanation दिया गया है —
Philosophy → Sant Vaani → Loka Culture
जिसे आप post / infographic / slide में सीधे बदल सकते हैं।
📐 DIAGRAM : दर्शन से लोक तक की यात्रा
🔍 इस Diagram को कैसे समझें?
1️⃣ दर्शन (Philosophy)
- यहाँ शब्द नहीं, अनुभव प्रधान है
- सामान्य जन के लिए सीधा प्रवेश कठिन
2️⃣ संत–वाणी (Bridge)
- दर्शन को कथा और नाम में बदला गया
- राम, कृष्ण, हरि =
👉 परमात्मा की ओर संकेत - यह अंतिम सत्य नहीं — मार्ग है
संत–वाणी = अनुवाद, सरलीकरण, समन्वय
3️⃣ लोक–संस्कृति (Loka Culture)
- यहाँ दर्शन जीवन-व्यवहार बनता है
- समस्या तब आती है जब:
- प्रतीक को इतिहास मान लिया जाए
- कथा को विज्ञान
- और सेतु को मंज़िल
⚠️ मुख्य चेतावनी (Diagram का सार)
दर्शन को सीधे लोक में उतारोगे — टूट जाएगा
लोक को दर्शन बना दोगे — अंधविश्वास हो जाएगाइसलिए संत–वाणी आवश्यक है,
पर उसे सेतु से अधिक न बनाओ।
🕯️ एक पंक्ति में निष्कर्ष
दर्शन = सत्य
संत–वाणी = मार्ग
लोक–संस्कृति = साधन
जो साधन को सत्य मान लेता है,
वही भ्रम में फँसता है।
Hey माते, aapko abhi bhi koi संशय संदेह?
Sanshayatma Vinadhyati
Sanshay grasta aatma ka kabhi utthan nahi ho sakta, wo sansarik riti riwaajon, teej tyoharon me fansi rahkar, devi devaton me hi ulajhi rahati hai...wo kaise adhyatmik sadhana me lagkar parmatma ki ओर अग्रसर हो?





