सुभाषितानि – अमर गीत
एक गीत में पूरी श्रीमद्भागवत कथा
"रात और दिन दिया जले, मेरे मन में फिर भी अंधियारा है..."
पुराने फिल्मी गीतों की यही विशेषता थी कि वे केवल प्रेम-विरह की कहानी नहीं कहते थे, बल्कि मानव जीवन की आध्यात्मिक यात्रा को भी स्पर्श कर जाते थे। यदि हम ध्यान से सुनें तो यह गीत वस्तुतः जीव की उस व्यथा को व्यक्त करता है जिसका वर्णन श्रीमद्भागवत, गीता और रामचरितमानस बार-बार करते हैं।
१. "रात और दिन दिया जले, मेरे मन में फिर भी अंधियारा है"
बाहर प्रकाश है, भीतर अंधकार है।
ज्ञान की पुस्तकें हैं, संतों के प्रवचन हैं, मंदिर हैं, आश्रम हैं, कथा-कीर्तन हैं। फिर भी मनुष्य दुखी, भ्रमित और अशांत है।
संत वाणी तो दीपक है। महापुरुषों का जीवन मशाल है, जो हमें मार्ग दिखाती है।
"सदियों यूँ ही जलती रहे गांधी तेरी मशाल,
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।"
गांधी का कमाल कोई जादू नहीं था। उन्होंने मनुष्य को यह दिखाया कि सत्य, त्याग और सेवा की शक्ति तलवार और ढाल से भी बड़ी होती है।
"दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल।"
यही बात तुलसीदास जी हनुमान जी के बारे में कहते हैं—
"राम काज लगि तव अवतारा।"
हनुमान जी का जन्म केवल अपने लिए नहीं हुआ। उनका सम्पूर्ण जीवन रामकाज के लिए समर्पित था।
फिर आगे—
"प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही,
जलधि लाँघि गए अचरज नाहीं।"
जब मुख में प्रभु की मुद्रिका हो, जब हृदय में ईश्वर का स्मरण हो, जब कर्म परोपकार के लिए हो, तब समुद्र भी बाधा नहीं बनता।
आज का मनुष्य भी भवसागर पार करना चाहता है।
परंतु प्रश्न यह है कि वह किसके लिए जी रहा है?
यदि जीवन केवल—
- धन कमाने के लिए,
- पद पाने के लिए,
- दूसरों से आगे निकलने के लिए,
व्यतीत हो रहा है, तो वह समुद्र में तैर नहीं रहा, बल्कि धीरे-धीरे डूब रहा है।
राम का स्मरण करते हुए, राम का कार्य करते हुए, परोपकार करते हुए भवसागर सहज ही पार हो जाता है।
स्वार्थ मनुष्य को डुबोता है।
सेवा उसे तैराती है।
२. "जाने कहाँ है वो साथी, तू जो मिले जीवन उजियारा है"
यह साथी कौन है?
संसार का कोई व्यक्ति?
कोई मित्र?
कोई जीवनसाथी?
भागवत कहती है— नहीं।
वह साथी स्वयं परमात्मा है।
जीव अनेक जन्मों से उसी को खोज रहा है, परंतु भूल से संसार में ढूँढ़ रहा है।
जब मनुष्य सोचता है—
"बस यह नौकरी मिल जाए।"
"बस इतना धन आ जाए।"
"बस यह पद मिल जाए।"
तब उसे लगता है कि उसके जीवन का अंधकार मिट जाएगा।
लेकिन एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी खड़ी हो जाती है।
अंधकार वहीं का वहीं रहता है।
कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जहाँ धर्म है, जहाँ लोककल्याण की भावना है, जहाँ निष्काम कर्म है, वहीं मैं हूँ।
जहाँ लोभ है, अहंकार है, संग्रह की लालसा है, केवल "मैं" और "मेरा" है, वहाँ ईश्वर दूर हो जाता है।
इसलिए जीवन का वास्तविक साथी कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि वह चेतना है जो धर्म, सेवा और प्रेम के रूप में हमारे भीतर प्रकट होती है।
यही कारण है कि गीता के अंत में संजय घोषणा करते हैं—
"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥"
जहाँ कृष्ण हैं और जहाँ धर्म के लिए कर्म करने वाला अर्जुन है, वहीं विजय है, वहीं प्रकाश है, वहीं कल्याण है।
निष्कर्ष
मनुष्य का दुःख अंधकार के कारण नहीं है।
दुःख इसलिए है कि वह दीपक को देखकर भी प्रकाश की ओर मुख नहीं करता।
संतों की वाणी दीपक है।
महापुरुषों का जीवन मशाल है।
रामकाज नाव है।
और ईश्वर का स्मरण पतवार है।
इन सबके रहते हुए भी यदि मन अंधकार में है, तो समस्या प्रकाश की नहीं, दिशा की है।
इसीलिए गीत का पहला वाक्य सम्पूर्ण भागवत का सार बन जाता है—
"रात और दिन दिया जले, मेरे मन में फिर भी अंधियारा है।"
जब तक दीपक बाहर जलता रहेगा और भीतर नहीं, तब तक अंधियारा बना रहेगा।
और जिस दिन भीतर का दीपक जल गया, उसी दिन जीवन का सारथी मिल जाएगा, और जीवन स्वयं उजियारा हो जाएगा।
