Sunday, October 18, 2026

‘श्री’ के पीछे भागता रहा संसार — राम-नाम के स्वर की खोज में

 

‘श्री’ के पीछे भागता रहा संसार — राम-नाम के स्वर की खोज में

पं. विनोद द्विवेदी जी के सत्संग, ज्ञान, भक्ति और संगीत-साधना के चरणों में समर्पित

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“श्री” के पीछे भागा-भागा मैं यूरोप-अमेरिका चला गया, कुछ हाथ न लगा; वापस मृत्युलोक में धकेला गया।

यह केवल किसी व्यक्ति की विदेश यात्रा की कहानी नहीं, बल्कि उस मनुष्य की आत्मस्वीकृति है जो संसार में प्रतिष्ठा, वैभव और सफलता की तलाश में दूर-दूर तक भटकता रहा, लेकिन अंततः उसे यह समझ आया कि जीवन की सबसे मूल्यवान उपलब्धियाँ भौतिक संसार की सीमाओं में नहीं मिलतीं।

जिस ‘श्री’ के पीछे मनुष्य भागता है, वह कभी धन बनकर, कभी पद बनकर, कभी प्रसिद्धि बनकर और कभी सामाजिक प्रतिष्ठा बनकर सामने आती है। मनुष्य एक लक्ष्य प्राप्त करता है, तो दूसरा लक्ष्य उसकी प्रतीक्षा करने लगता है। इस अंतहीन दौड़ में वह संसार तो देख लेता है, लेकिन अपने भीतर के संसार को देखना भूल जाता है।

और फिर कभी-कभी जीवन उसे उसी धरती पर वापस ले आता है, जिसे वह पीछे छोड़कर आगे निकल जाना चाहता था। शायद यह वापसी पराजय नहीं, बल्कि अपनी वास्तविक खोज की शुरुआत होती है।


वैकुण्ठ से भी दुर्लभ — सच्चे सत्संग का अवसर

सुनु मतिमंद लोक बैकुंठा।
लाभ कि रघुपति भगति अकुंठा।।

— गोस्वामी तुलसीदास, श्रीरामचरितमानस

इन पंक्तियों में निहित भाव हमें ठहरकर सोचने के लिए प्रेरित करता है। यदि जीवन में श्रीराम की निष्कपट भक्ति, उनके नाम का प्रेम और सच्चे संतों का सत्संग प्राप्त हो जाए, तो उससे बढ़कर सौभाग्य क्या हो सकता है?

वैकुण्ठ की कल्पना एक दिव्य लोक के रूप में की जाती है, लेकिन मनुष्य के जीवन में सत्संग का अवसर इसी धरती पर उपलब्ध होता है। यहाँ जीवन के संघर्ष हैं, मोह है, अहंकार है, विफलताएँ हैं और मृत्यु की अनिवार्यता भी। फिर भी इसी संसार में मनुष्य किसी संत के वचन सुनकर, किसी ज्ञानी के विचारों से प्रेरित होकर और किसी साधक के संगीत में डूबकर अपने भीतर परिवर्तन का अनुभव कर सकता है।

जिस मृत्युलोक को हम दुःख और बंधनों का संसार समझते हैं, वही सच्चे सत्संग के माध्यम से आत्मबोध की भूमि भी बन सकता है।

सत्संग का अर्थ केवल किसी सभा में बैठना या धार्मिक वचन सुनना नहीं है। सत्संग वह अवसर है जब हम अपने अहंकार से थोड़ा दूर होकर सत्य को सुनने का साहस करते हैं। जब किसी दूसरे के अनुभव में अपना जीवन दिखाई देने लगता है, तब ज्ञान सूचना नहीं रहता—वह आत्मचिंतन का आधार बन जाता है।


पं. विनोद द्विवेदी जी — ज्ञान, भक्ति और संगीत के प्रति समर्पण

पं. विनोद द्विवेदी जी के सत्संग, ज्ञान, भक्ति और संगीत-साधना से प्रेरित यह लेख उनके चरणों में विनम्र समर्पण है।

संगीत की साधना केवल सुर, लय और ताल का अभ्यास नहीं है। भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा में गुरु-शिष्य संबंध, निरंतर रियाज़, धैर्य, विनम्रता और समर्पण का विशेष महत्व रहा है। स्वर को साधते-साधते साधक को अपने मन को भी साधना पड़ता है।

जब संगीत केवल प्रदर्शन का माध्यम नहीं रहता, बल्कि भीतर की अनुभूति को व्यक्त करने लगता है, तब उसकी प्रकृति बदल जाती है। स्वर किसी को प्रभावित करने का साधन भर नहीं रहता; वह स्वयं को समझने और अपने भीतर के मौन को सुनने का माध्यम बन सकता है।

भक्ति का भी यही मर्म है। भक्ति का अर्थ केवल किसी आराध्य का नाम लेना नहीं, बल्कि अपने अहंकार, स्वार्थ और प्रदर्शन की प्रवृत्ति को पहचानते हुए प्रेम, करुणा और समर्पण की ओर बढ़ना है।

जब ज्ञान विवेक देता है, भक्ति हृदय को कोमल बनाती है और संगीत उन भावों को स्वर देता है, तब साधना जीवन के अनुभव में उतरने लगती है।


राम-नाम का संगीत — बाहर से भीतर की यात्रा

राम-नाम केवल उच्चारण नहीं, एक भाव भी है। वह मर्यादा, करुणा, सत्य, धैर्य और लोकमंगल की स्मृति जगा सकता है। जब राम का नाम संगीत में उतरता है, तो वह केवल शब्द और धुन का मेल नहीं रह जाता; वह साधक की श्रद्धा और अनुभूति का माध्यम बन जाता है।

किसी राग का आलाप हो, भजन की सरल धुन हो या गुरु के सान्निध्य में किया गया अभ्यास—संगीत हमें वर्तमान क्षण में ठहरना सिखा सकता है। स्वर की शुद्धता के साथ भाव की सच्चाई भी आवश्यक है। तकनीकी दक्षता संगीत को निखारती है, लेकिन संवेदना उसे जीवन से जोड़ती है।

यही कारण है कि सच्चे संगीत-सत्संग में श्रोता केवल सुनता नहीं, अपने भीतर भी झाँकता है। कभी एक स्वर वर्षों से दबे किसी भाव को जगा देता है। कभी किसी भजन की पंक्ति जीवन की किसी उलझन को नए दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा देती है।

और कभी संगीत के बीच ऐसा मौन उतरता है, जिसमें शब्दों की आवश्यकता नहीं रह जाती।

“स्वर से साधना, साधना से समर्पण,
और समर्पण से आत्मानंद की ओर।”


सफलता की यात्रा या स्वयं तक लौटने की यात्रा?

यूरोप और अमेरिका की यात्रा हो या संसार के किसी भी कोने में उपलब्धियों की खोज—इन सबका अपना महत्व है। ज्ञान अर्जित करना, कार्य करना, संसार को देखना और अपने सामर्थ्य का विकास करना जीवन के स्वाभाविक आयाम हैं। प्रश्न इन उपलब्धियों का नहीं, बल्कि उस रिक्तता का है जिसे कभी-कभी ये उपलब्धियाँ भी नहीं भर पातीं।

मनुष्य जब अपनी संपूर्ण पहचान पद, धन, प्रसिद्धि या दूसरों की स्वीकृति पर आधारित कर लेता है, तब वह बाहरी परिस्थितियों के साथ निरंतर बदलता रहता है। लेकिन जब वह अपने भीतर के मूल्यों, संवेदनाओं और चेतना से जुड़ने लगता है, तब जीवन की दिशा में एक नया आयाम जुड़ता है।

शायद इसी मोड़ पर सत्संग का महत्व समझ में आता है। कोई सच्चा गुरु हमारे लिए जीवन नहीं जीता, न ही वह हमारी सारी समस्याएँ समाप्त कर सकता है। लेकिन उसके अनुभव, वचन और साधना हमें अपने जीवन को नए विवेक से देखने की प्रेरणा दे सकते हैं।

पं. विनोद द्विवेदी जी के प्रति यह समर्पण उसी प्रेरणा का स्मरण है—ज्ञान के प्रति आदर, भक्ति के प्रति विनम्रता और संगीत के प्रति साधना-भाव।


समर्पण

हे गुरुवर,

यदि संसार की दौड़ हमें स्वयं से दूर ले जाती है, तो सत्संग हमें अपने भीतर लौटने का अवसर देता है। यदि प्रसिद्धि का आकर्षण हमें दूसरों की निगाहों में जीना सिखाता है, तो संगीत हमें अपने अंतर्मन को सुनना सिखा सकता है।

आपके सत्संग, ज्ञान, भक्ति और संगीत-साधना से प्रेरित होकर यही कामना है कि जीवन में स्वर केवल कंठ से न निकले, वह आचरण में भी प्रकट हो। भक्ति केवल शब्दों में न रहे, वह व्यवहार में दिखाई दे। ज्ञान केवल विचार न बने, वह विवेक में उतरे। और समर्पण केवल प्रणाम न रहे, वह जीवन जीने की पद्धति बन जाए।

‘श्री’ की खोज में संसार का भ्रमण करते हुए यदि अंततः राम-नाम का कोई सच्चा स्वर मिल जाए, यदि किसी सत्संग में मन की दिशा बदल जाए, यदि संगीत के किसी क्षण में अहंकार का शोर शांत हो जाए—तो शायद यह वापसी नहीं, बल्कि अपने वास्तविक घर की ओर यात्रा है।

संसार की उपलब्धियों से परे,
सत्संग का सौभाग्य।
ज्ञान से विवेक,
भक्ति से समर्पण,
और संगीत से आत्मानंद।

पं. विनोद द्विवेदी जी के चरणों में सादर समर्पित।

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स्वर के बिना नश्वर जीवन, संगीत के स्वर से अनश्वरता की ओर — ईश्वर की यात्रा

 

स्वर के बिना नश्वर जीवन, संगीत के स्वर से अनश्वरता की ओर — ईश्वर की यात्रा

सरस्वती संगीत गुरुकुल (SSG)

 

 सरस्वती वंदना - पंडित विनोद द्विवेदी

तू भूल जा कि दूसरों की निगाहों में तू कौन है।
ऐसे जी कि तुझे अपने अस्तित्व को सिद्ध करने की आवश्यकता ही न रहे।

तेरा आना और तेरा जाना भी ऐसा हो—
जैसे हवा का एक झोंका आया,
डाली से एक फूल टूटा,
और प्रकृति की अनंत यात्रा में विलीन हो गया।

समुद्र की एक बूँद वाष्प बनी,
बादल के रूप में आकाश में विचरण किया,
पर्वतों पर हिम बनकर ठहरी,
फिर पिघली, नदी बनी
और अंततः अपने उद्गम की ओर लौट चली।

क्या वह बूँद सचमुच कभी खोई थी?
या केवल उसका रूप बदलता रहा?

यही जीवन का सत्य है।
रूप नश्वर है, प्रवाह शाश्वत।
व्यक्तित्व क्षणभंगुर है, लेकिन अस्तित्व की यात्रा अनंत संभावनाओं से भरी है।

और इसी यात्रा में संगीत एक सेतु बनता है।

स्वर केवल ध्वनि नहीं है।
वह मौन से जन्म लेने वाली अनुभूति है।
वह श्वास और चेतना के बीच का संवाद है।
वह भीतर के उस संसार का द्वार है, जहाँ पहुँचकर मनुष्य दूसरों की दृष्टि में महान बनने की आकांक्षा से मुक्त हो सकता है।

जब तक हम गाते हैं अपनी पहचान बनाने के लिए, स्वर हमारे अहंकार का आभूषण बना रहता है। लेकिन जब स्वर की साधना में मैं धीरे-धीरे विलीन होने लगता है, तब संगीत प्रदर्शन नहीं, उपासना बन जाता है।

स्वर की साधना का परम उद्देश्य प्रसिद्धि नहीं, आत्मानंद है।

राग की प्रत्येक यात्रा हमें ठहरना सिखाती है।
प्रत्येक आलाप हमें सुनना सिखाता है।
प्रत्येक विराम हमें मौन का अर्थ समझाता है।
और प्रत्येक शुद्ध स्वर हमें अपने भीतर की असंगति पहचानने का अवसर देता है।

साधक धीरे-धीरे समझने लगता है कि संगीत पर अधिकार पाना ही साधना नहीं; स्वयं को संगीत के प्रति समर्पित कर देना भी साधना है।

जहाँ अहंकार का शोर शांत होता है, वहाँ स्वर की सूक्ष्मता सुनाई देने लगती है। जहाँ पाने की आकांक्षा क्षीण होती है, वहाँ अनुभव का आनंद गहरा होने लगता है।

यही नश्वरता से अनश्वरता की ओर यात्रा है—देह की अमरता नहीं, बल्कि उस चेतना का अनुभव, जो क्षणिक उपलब्धियों और सामाजिक पहचान से परे है।

स्वर से मौन तक, मौन से आत्मबोध तक और आत्मबोध से ईश्वरानुभूति तक—संगीत की यात्रा भीतर की यात्रा है।

सरस्वती संगीत गुरुकुल में हमारा विश्वास है कि संगीत केवल कला का प्रशिक्षण नहीं, स्वयं को जानने की साधना भी है। यहाँ रियाज़ का अर्थ केवल सुरों को शुद्ध करना नहीं, बल्कि अपने भीतर के भाव, विचार और चेतना को भी परिष्कृत करना है।

आइए, स्वर को केवल गाएँ नहीं—उसे जिएँ।

ऐसे जिएँ कि संसार हमें याद रखे या भूल जाए, इससे हमारे आनंद पर कोई अंतर न पड़े।

क्योंकि जब साधक स्वर में स्वयं को खोकर अपने भीतर के आनंद को पा लेता है, तब संगीत केवल उसका नहीं रहता—वह स्वयं संगीत का हो जाता है।

स्वर ही साधना है।
संगीत ही यात्रा है।
आत्मानंद ही उसका प्रसाद है।

सरस्वती संगीत गुरुकुल (SSG)
स्वर से स्वबोध की ओर। संगीत से आत्मानंद की ओर।

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काम किसी का, नाम किसी और का!

 

काम किसी का, नाम किसी और का!

भारतीय फिल्म संगीत के चार अनसुने नायक: मनोहरी सिंह, केरसी लॉर्ड, भूपिंदर सिंह और मारुति राव कीर्ते

कला, प्रसिद्धि और फिल्म जगत के पर्दे के पीछे छिपे वास्तविक संगीत-शिल्पियों की कहानी।


 Was R.D. Burman really a musical genius?

“बेटा, प्रसिद्धि के पीछे भागेगा तो माया ही हाथ लगेगी, असली चीज नहीं।”

यह केवल जीवन का दर्शन नहीं, बल्कि भारतीय फिल्म संगीत की दुनिया को समझने की एक गहरी कुंजी भी है।

जब हम किसी फिल्म का गीत सुनते हैं, तो हमारे मन में गायक, संगीतकार, गीतकार और पर्दे पर दिखाई देने वाले सितारों के नाम आते हैं। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि उस संगीत को उसकी वास्तविक चमक देने वाले कलाकार कौन थे, जिनकी उँगलियों, साँसों, सुरों और वर्षों की साधना ने किसी गीत को कालजयी बनाया?

किसी गीत में बजती सैक्सोफोन की उदास पुकार, वायलिन का भावपूर्ण आलाप, गिटार की पश्चिमी धुन या तबले की जादुई लय—इन सबके पीछे ऐसे संगीतज्ञ होते हैं, जो अक्सर प्रसिद्धि की रोशनी से दूर रहते हैं।

मनोहरी सिंह, केरसी लॉर्ड, भूपिंदर सिंह और मारुति राव कीर्ते ऐसे ही चार नाम हैं। इनकी कहानियाँ हमें केवल फिल्म संगीत का इतिहास नहीं बतातीं, बल्कि एक बड़ा सवाल भी पूछती हैं:

क्या हम कला का सम्मान करते हैं, या केवल उस नाम का, जिसके साथ कला को प्रचारित किया जाता है?


1. मनोहरी सिंह: सैक्सोफोन की वह आवाज़, जिसने धुनों को पहचान दी

मनोहरी सिंह केवल एक सैक्सोफोन वादक नहीं थे। वे संगीत संयोजन, वाद्य-वृंद के संचालन और धुनों को उनकी विशिष्ट पहचान देने वाले विलक्षण संगीतज्ञ थे।

1958 में मुंबई आने के बाद उन्होंने एस. डी. बर्मन सहित अनेक प्रमुख संगीतकारों के साथ काम किया। आर. डी. बर्मन के साथ उनका जुड़ाव विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण रहा। वे उनकी संगीत टीम के प्रमुख अरेंजरों में शामिल थे।

मनोहरी सिंह की प्रतिभा केवल सही सुर बजाने में नहीं थी। वे जानते थे कि किसी धुन में कहाँ ठहराव चाहिए, कहाँ पश्चिमी संगीत का प्रभाव उभरना चाहिए और कहाँ कोई वाद्य मानवीय भावनाओं को आवाज़ दे सकता है।

उन्होंने आर. डी. बर्मन की संगीत-दृष्टि को साकार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। फिर भी, दशकों तक उनका नाम आम श्रोताओं के लिए अपेक्षाकृत अपरिचित रहा।

विडंबना देखिए: जिस वाद्य की धुन सुनकर श्रोता गीत पहचान लेते हैं, उस धुन को बजाने वाले कलाकार का नाम शायद ही जानते हों।

आगे पढ़ें: Scroll.in — How Manohari Singh helped redefine Hindi film music


2. केरसी लॉर्ड: संगीत के भीतर छिपे संगीत के शिल्पकार

केरसी लॉर्ड एक कुशल एकॉर्डियन वादक, बहुवाद्य विशेषज्ञ, संगीत संयोजक और कंडक्टर थे। उन्होंने नौशाद, एस. डी. बर्मन, मदन मोहन, आर. डी. बर्मन और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे संगीतकारों के साथ काम किया।

उनका योगदान केवल वाद्य बजाने तक सीमित नहीं था। वे अनेक वाद्यों की ध्वनि को एक व्यवस्थित, प्रभावशाली संगीतात्मक संरचना में बदलने में माहिर थे। उनके काम ने हिंदी फिल्म संगीत को नई ध्वनियों और प्रयोगों से समृद्ध किया।

उनकी कहानी का एक महत्त्वपूर्ण पहलू संगीत संयोजकों को उचित श्रेय दिलाने का संघर्ष है। फिल्म संगीत में लंबे समय तक अरेंजरों का योगदान प्रमुख संगीतकार के नाम के पीछे छिपा रहता था। केरसी लॉर्ड ने इस पेशेवर बिरादरी की पहचान और अलग क्रेडिट के लिए आवाज़ उठाई।

यह केवल एक कलाकार की निजी उपलब्धि नहीं थी। यह उन सभी संगीतज्ञों के सम्मान का प्रश्न था, जो किसी संगीतकार की कल्पना को वास्तविक ध्वनि में बदलते हैं।

संगीतकार धुन की कल्पना करता है, लेकिन उस कल्पना को श्रवणीय संसार में ढालने के लिए विशेषज्ञता, अनुशासन और सामूहिक श्रम की आवश्यकता होती है।

आगे पढ़ें: The Indian Express — Obituary: Kersi Lord passes away at 81


3. भूपिंदर सिंह: गिटार की धुनों से लेकर ग़ज़ल की गहराइयों तक

भूपिंदर सिंह का नाम आते ही अनेक संगीतप्रेमियों को उनकी गहरी, उदास और विशिष्ट आवाज़ याद आती है। वे प्रसिद्ध ग़ज़ल गायक और पार्श्वगायक थे, लेकिन फिल्म संगीत में गिटारवादक के रूप में उनका योगदान भी उल्लेखनीय था।

वे आर. डी. बर्मन की संगीत टीम से जुड़े रहे और गिटार बजाने में अपनी दक्षता के लिए जाने जाते थे। उनकी यात्रा हमें याद दिलाती है कि एक कलाकार की प्रतिभा अनेक रूपों में सामने आ सकती है।

जिस व्यक्ति की आवाज़ श्रोताओं को भावुक कर सकती है, वही अपने वाद्य से किसी दूसरे गायक या गीत की भावनात्मक दुनिया को भी आकार दे सकता है।

भूपिंदर सिंह ने ग़ज़ल, पार्श्वगायन, संगीत रचना और वाद्य-संगीत के क्षेत्रों में योगदान दिया। उन्हें केवल उनकी गायकी तक सीमित करके देखना उनकी बहुआयामी प्रतिभा को कम करके आँकना होगा।

किसी कलाकार की वास्तविक पहचान केवल उसके सबसे प्रसिद्ध काम में नहीं, बल्कि उसकी समग्र साधना और रचनात्मक योगदान में होती है।

आगे पढ़ें: The Indian Express — Bhupinder Singh was matchless

संदर्भ: संगीत नाटक अकादमी — भूपिंदर सिंह


4. मारुति राव कीर्ते: लय के पीछे छिपा हुआ गणित और जादू

किसी गीत की धुन आपको याद रह सकती है, उसके बोल आपको छू सकते हैं और गायक की आवाज़ आपको मंत्रमुग्ध कर सकती है। लेकिन उस गीत की लय बदल जाए, तो उसका पूरा प्रभाव बदल सकता है।

मारुति राव कीर्ते, जिन्हें मारुति राव कीर के नाम से भी जाना जाता है, तबला वादक और ताल-विशेषज्ञ थे। वे आर. डी. बर्मन के प्रमुख संगीत सहयोगियों में शामिल थे और उनकी संगीत टीम में ताल तथा लय के प्रयोगों के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

आर. डी. बर्मन की संगीत शैली में पश्चिमी तालवाद्यों, भारतीय लयों और नए ध्वनि-प्रयोगों का जो संगम दिखाई देता है, उसके पीछे मारुति राव जैसे संगीतज्ञों की व्यावहारिक विशेषज्ञता का विशेष महत्त्व था।

वे केवल ताल पर संगत करने वाले कलाकार नहीं थे। वे समझते थे कि किसी धुन को आगे बढ़ाने के लिए कैसी लय चाहिए, कहाँ विराम देना है, कहाँ गति बदलनी है और कहाँ कोई नया ताल-प्रयोग गीत को यादगार बना सकता है।

मनोहरी सिंह, बसुदेव चक्रवर्ती और मारुति राव कीर्ते को आर. डी. बर्मन की संगीत टीम के प्रमुख स्तंभों में गिना जाता है। इनकी विशेषज्ञताएँ अलग थीं, लेकिन इनकी सामूहिक प्रतिभा ने हिंदी फिल्म संगीत के एक विशिष्ट युग को आकार देने में सहायता की।

आगे पढ़ें: The Sculptors of Film Songs — Maruti Rao Keer


5. क्या फिल्म संगीत का इतिहास अधूरा लिखा गया?

इन चार कलाकारों की कहानियाँ एक साझा समस्या की ओर इशारा करती हैं—कला सामूहिक श्रम से जन्म लेती है, लेकिन प्रसिद्धि अक्सर कुछ चुनिंदा व्यक्तियों के नाम पर केंद्रित हो जाती है।

फिल्म के पोस्टर पर अभिनेता दिखाई देता है। गीत के साथ गायक और संगीतकार का नाम जुड़ता है। पुरस्कार समारोहों में कुछ प्रमुख व्यक्तियों को मंच मिलता है। लेकिन स्टूडियो में घंटों अभ्यास करने वाले वादक, संगीत संयोजन करने वाले विशेषज्ञ और रिकॉर्डिंग को सटीक बनाने वाले तकनीशियन व्यापक जनस्मृति से बाहर रह जाते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि महान संगीतकारों या गायकों की उपलब्धियाँ कम हैं। एस. डी. बर्मन, आर. डी. बर्मन और अन्य महान संगीतकारों की मौलिक प्रतिभा निर्विवाद है। सवाल यह है कि क्या उनकी महानता को समझने के लिए उन सहयोगियों की महानता को भी स्वीकार नहीं करना चाहिए, जिन्होंने उनकी कल्पना को ध्वनि का रूप दिया?

किसी महान रचना के पीछे अनेक प्रतिभाएँ होती हैं। उचित श्रेय देना किसी एक का सम्मान कम करना नहीं, बल्कि सभी के योगदान को स्वीकार करना है।


6. प्रसिद्धि का तिलिस्म और कला का वास्तविक मूल्य

हमारा समाज अक्सर सफलता को पहचान, पुरस्कार, लोकप्रियता और सार्वजनिक प्रशंसा के पैमाने पर मापता है। मगर क्या प्रसिद्ध होना और महान होना एक ही बात है?

कोई कलाकार लाखों लोगों के बीच लोकप्रिय हो सकता है, जबकि कोई दूसरा कलाकार उन लोकप्रिय रचनाओं की आत्मा गढ़ने में योगदान देकर भी अपरिचित रह सकता है।

प्रसिद्धि इस बात पर निर्भर करती है कि दुनिया किसे देखती है। प्रतिभा इस बात पर कि किसी व्यक्ति ने अपने काम से दुनिया को कितना समृद्ध किया।

इन चार कलाकारों की कहानियाँ हमें यह भी सिखाती हैं कि कला के प्रति समर्पण और प्रसिद्धि की दौड़ दो अलग-अलग रास्ते हैं। कलाकार का मूल्य केवल इस बात से तय नहीं होना चाहिए कि उसका नाम कितने लोगों को याद है, बल्कि इस बात से भी कि उसके काम ने संगीत की दुनिया को कितना समृद्ध किया।

इसका अर्थ प्रसिद्धि को पूरी तरह अस्वीकार करना नहीं है। उचित श्रेय, आर्थिक सम्मान और कलाकार की पहचान उसके अधिकार हैं। लेकिन जब प्रसिद्धि ही कला का अंतिम उद्देश्य बन जाती है, तो साधना पीछे छूट सकती है और प्रदर्शन आगे आ जाता है।

सच्ची कला का मूल्य तालियों की संख्या से बड़ा होता है।


7. आज की पीढ़ी के लिए सबक

  • लेखक के बिना विचार अधूरा है, लेकिन विचार के पीछे शोध करने वालों का योगदान भी महत्त्वपूर्ण है।
  • फिल्म निर्देशक की दृष्टि महत्त्वपूर्ण है, लेकिन उसे साकार करने वाली पूरी टीम का श्रम भी वास्तविक है।
  • संगीतकार की कल्पना अमूल्य है, लेकिन अरेंजर, वादक और तकनीशियन उस कल्पना को जीवन देते हैं।
  • किसी संस्था की सफलता उसके प्रमुख व्यक्ति से जुड़ सकती है, लेकिन उसकी वास्तविक शक्ति अक्सर उन लोगों में होती है, जो बिना प्रचार के अपना काम करते हैं।

किसी उपलब्धि का मूल्यांकन करते समय हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि सफलता का श्रेय किसे मिला। हमें यह भी पूछना चाहिए कि उस सफलता के निर्माण में किन लोगों का योगदान था और क्या उन्हें उनका उचित सम्मान मिला।


निष्कर्ष: नाम से आगे बढ़कर काम को पहचानिए

मनोहरी सिंह, केरसी लॉर्ड, भूपिंदर सिंह और मारुति राव कीर्ते को याद करना भारतीय फिल्म संगीत के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है। उनकी कहानियाँ बताती हैं कि संगीत केवल धुन, गीत और आवाज़ का नाम नहीं है। वह अनेक कलाकारों की साधना, प्रयोग, अनुशासन और सामूहिक रचनात्मकता का परिणाम है।

अगली बार जब आप कोई पुराना हिंदी फिल्म गीत सुनें, तो केवल प्रसिद्ध नामों को याद मत कीजिए। उसके पीछे छिपे वाद्य-संगीत, लय और संयोजन को भी सुनने की कोशिश कीजिए।

क्योंकि कला का सम्मान तभी पूरा होता है, जब हम उसके सृजन में योगदान देने वाले लोगों को भी पहचानते हैं।

नाम किसी एक का हो सकता है, लेकिन महान रचना के पीछे अक्सर अनेक अनाम साधकों का संसार होता है।

और शायद यही जीवन का सबसे बड़ा सबक है—प्रसिद्धि क्षणिक हो सकती है, लेकिन सच्चे काम की प्रतिध्वनि पीढ़ियों तक सुनाई देती है।


वीडियो देखें

इस विषय पर संबंधित वीडियो यहाँ देखें:

काम किसी का और नाम किसी और का — पर्दे के पीछे के कलाकारों की कहानी

मनोहरी सिंह, केरसी लॉर्ड, भूपिंदर सिंह और मारुति राव कीर्ते — भारतीय फिल्म संगीत के अनसुने नायक

भारतीय फिल्म संगीत के चार महान कलाकार, जिनके योगदान को अधिक पहचान मिलनी चाहिए।


आगे पढ़ने के लिए संदर्भ

  1. Scroll.in — Manohari Singh and Hindi film music
  2. The Indian Express — Kersi Lord obituary
  3. The Indian Express — Bhupinder Singh's legacy
  4. Sangeet Natak Akademi — Bhupinder Singh
  5. The Sculptors of Film Songs — Maruti Rao Keer
  6. Songs of Yore — R. D. Burman and musical orchestration

यह लेख भारतीय फिल्म संगीत के उन रचनाकारों को समर्पित है, जिनकी प्रतिभा ने हमारी सांस्कृतिक स्मृति को समृद्ध किया—भले ही उनका नाम हमेशा सुर्खियों में नहीं रहा।

Saturday, October 17, 2026

राम नाम की महिमा: उच्चारण से अनुभूति तक

राम नाम की महिमा: जप से अनुभूति तक — तुलसीदास जी की चौपाइयों का एक वैकल्पिक पाठ

क्या राम नाम का उच्चारण ही पर्याप्त है, या राम तत्त्व को समझने के लिए कुछ और भी आवश्यक है?

 


गोस्वामी तुलसीदास जी की रामचरितमानस में राम नाम की महिमा का बार-बार वर्णन मिलता है। लेकिन उन्हीं की कुछ चौपाइयाँ हमें एक गहरे आध्यात्मिक प्रश्न पर विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं।

जनम जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं॥

मम लोचन गोचर सोइ आवा। बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा॥

ये शब्द किष्किंधा कांड में मृत्युशय्या पर पड़े वानरराज बालि के हैं। श्रीराम को अपने सामने देखकर बालि विस्मित है कि जिनके दर्शन के लिए मुनि जन्म-जन्मांतर तक साधना करते हैं, वे आज स्वयं उसके नेत्रों के सामने उपस्थित हैं।

लेकिन यहाँ एक प्रश्न उठता है—आखिर वह राम कौन है, जिसे पाने के लिए जन्म-जन्मांतर तक साधना करनी पड़ती है?

क्या राम केवल साकार भगवान हैं, जिनकी मूर्ति के दर्शन किए जाएँ? या राम नाम उस निर्गुण, निराकार परब्रह्म का भी द्योतक है, जो मन, बुद्धि और कल्पना की सीमाओं से परे है?

मेरी दृष्टि में राम नाम की महिमा को समझने के लिए नाम, उसके आध्यात्मिक अर्थ और जीवन में उसकी अनुभूति के बीच अंतर करना आवश्यक है।

राम नाम और परब्रह्म

राम नाम उस परम सत्य की ओर संकेत कर सकता है, जिसे शब्दों में पूरी तरह बाँधा नहीं जा सकता। शब्द उसकी ओर मार्गदर्शन कर सकते हैं, लेकिन उस सत्य का अनुभव केवल बौद्धिक परिभाषाओं तक सीमित नहीं रहता।

तुलसीदास जी कहते हैं—

भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥

और—

राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं॥

यदि अच्छे या बुरे भाव से, यहाँ तक कि अनायास भी राम नाम लेने से मंगल होता है, तो क्या केवल नाम का उच्चारण मनुष्य के भीतर की वासनाओं, लोभ, मोह और अहंकार को समाप्त कर देता है?

मनुष्य की जिह्वा राम का नाम ले सकती है, जबकि उसका मन संसार की इच्छाओं और आसक्तियों में उलझा रह सकता है। जीवन भर जप करने के बावजूद यदि उसके आचरण में करुणा, सत्यनिष्ठा और विनम्रता नहीं आती, तो क्या साधना अपने वास्तविक उद्देश्य तक पहुँची?

यहाँ नाम की महिमा को नकारने का प्रश्न नहीं, बल्कि उसके गहरे अर्थ को समझने का प्रयास है।

नाम का उच्चारण सहज है; नाम के तत्त्व को अपने जीवन में उतारना कहीं अधिक कठिन।

‘मम लोचन गोचर सोइ आवा’ — सत्संग का आध्यात्मिक अर्थ

रामचरितमानस के मूल प्रसंग में बालि के सामने स्वयं श्रीराम उपस्थित हैं। लेकिन इस प्रसंग से प्रेरित होकर एक व्यापक आध्यात्मिक प्रश्न भी उठाया जा सकता है।

क्या हमारे जीवन में कभी ऐसा अवसर आता है, जब जिस सत्य को हम शास्त्रों, विचारों और साधना में खोजते रहे हों, उसकी जीवंत झलक किसी मनुष्य के व्यक्तित्व में दिखाई दे?

जब कोई ब्रह्मज्ञानी, ईश्वरप्रेमी भक्त, करुणानिधान और सत्याग्रही महापुरुष हमारे जीवन में आता है, तो उसका सान्निध्य हमारे लिए सत्संग बन सकता है।

ऐसे व्यक्ति की पहचान केवल उसके धार्मिक ज्ञान, चमत्कारों के दावों या अनुयायियों की संख्या से नहीं होती। उसके जीवन में सत्य के प्रति निष्ठा, दूसरों के प्रति करुणा, लोभ से दूरी, अहंकार का अभाव और अन्याय के सामने निर्भयता दिखाई देनी चाहिए।

उसके सान्निध्य में यदि हमारे भीतर विवेक जागे, हमारी आसक्तियाँ प्रश्नों के घेरे में आएँ और हम अधिक सत्यनिष्ठ तथा करुणामय बनें, तो उस अनुभव को हम राम नाम की महिमा और अनुकंपा के रूप में देख सकते हैं।

इस अर्थ में ‘मम लोचन गोचर’ हमारे लिए एक आध्यात्मिक रूपक बन सकता है—मानो जिस सत्य की खोज हम जीवन भर करते रहे, उसकी एक जीवंत झलक हमें किसी महापुरुष के सान्निध्य में मिल गई हो।

यह मूल चौपाई का शाब्दिक अर्थ नहीं, बल्कि उसके प्रसंग से प्रेरित एक दार्शनिक व्याख्या है।

और इसका अर्थ किसी मनुष्य को आँख मूँदकर ईश्वर घोषित करना भी नहीं है। महत्त्व उस सत्य, करुणा और निर्मलता का है, जो उसके जीवन में प्रकट होती है।

क्या राम नाम और राम के दर्शन में विरोधाभास है?

शायद विरोधाभास तभी दिखाई देता है, जब हम नाम जपने, मन के रूपांतरण और आध्यात्मिक अनुभूति को एक ही उपलब्धि मान लेते हैं।

राम नाम सबके लिए सहज उपलब्ध है। लेकिन केवल उच्चारण से किसी निश्चित आध्यात्मिक उपलब्धि की गारंटी नहीं दी जा सकती। साधना आत्ममंथन का मार्ग खोल सकती है; सत्संग उस मार्ग को दिशा दे सकता है; और किसी महापुरुष के जीवन में करुणा, वैराग्य तथा सत्यनिष्ठा की झलक हमें अपने भीतर परिवर्तन के लिए प्रेरित कर सकती है।

राम नाम की महिमा का अनुभव प्रत्येक व्यक्ति अपने विश्वास और आध्यात्मिक समझ के अनुसार कर सकता है। लेकिन उसके जीवनगत प्रभाव पर विचार करना भी आवश्यक है।

यदि नाम जपने के बाद भी हमारा अहंकार बढ़ता है, हम दूसरों के प्रति घृणा रखते हैं और अन्याय के सामने मौन रहते हैं, तो हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि नाम हमारे जीवन में कितना उतरा है।

यदि वही नाम हमें अधिक संवेदनशील, विनम्र, निर्भय और सत्यनिष्ठ बनाता है, तो साधना का अर्थ हमारे व्यवहार में भी दिखाई देने लगता है।

निष्कर्ष: राम को जपना या राम तत्त्व को जीना?

परब्रह्म को शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता। राम नाम उस परम सत्य का संकेत है; साधना उसकी खोज है; और सत्संग उस खोज में मिलने वाला एक जीवंत अनुभव हो सकता है।

किसी ऐसे महापुरुष का सान्निध्य, जिसके जीवन में ब्रह्मज्ञान, ईश्वरप्रेम, करुणा और सत्याग्रह के गुण प्रकट होते हों, हमें उन आदर्शों के निकट ला सकता है जिन्हें हम राम से जोड़ते हैं।

राम नाम का जप करना एक साधना है; राम तत्त्व को समझना एक खोज है; और सत्य, करुणा तथा अहंकारमुक्त जीवन की दिशा में बढ़ना उस खोज की सार्थक अभिव्यक्ति हो सकती है।

शायद प्रश्न यह नहीं कि हमने कितनी बार राम नाम लिया, बल्कि यह भी है कि उस नाम ने हमें कितना बदला।

जहाँ नाम अहंकार को घटाए, करुणा को बढ़ाए और मन को सत्य के प्रति सजग बनाए—वहीं राम नाम जिह्वा से आगे बढ़कर जीवन में उतरना आरंभ करता है।

Friday, October 16, 2026

॥ श्री दुर्गा जनशक्ति जागरण स्तोत्रम् ॥

 ### ॥ श्री दुर्गा जनशक्ति जागरण स्तोत्रम् ॥

### अन्याय-विनाशिनी, जनचेतना-प्रबोधिनी, धर्म-रक्षिणी माँ दुर्गा की स्तुति

रचनाकार: Akshat Agrawal

ये लेख भी पढ़ें - https://akshat08.substack.com/p/47e?utm_source=share&utm_medium=android&r=124980

यह स्तोत्र माँ दुर्गा की उस शक्ति को समर्पित है, जो मनुष्य के भीतर भय के स्थान पर साहस, अज्ञान के स्थान पर विवेक, अन्याय के सामने मौन के स्थान पर निर्भीक प्रतिरोध और स्वार्थ के स्थान पर लोककल्याण की चेतना जगाती है।

यहाँ महिषासुर अहंकार, अत्याचार और अनुत्तरदायी सत्ता का प्रतीक है; जबकि सिंहवाहिनी दुर्गा जाग्रत जनचेतना, न्याय और सामूहिक साहस की प्रतीक हैं।

### ॥ श्री दुर्गा जनशक्ति जागरण स्तोत्रम् ॥

संस्कृतम् — स्तोत्रम्

१. मंगलाचरणम्

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। या देवी जनचित्तेषु धैर्यरूपेण जागृता॥ नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। जननीं लोकशक्तिं तां दुर्गां वन्दे पुनः पुनः॥

२. जनशक्तिस्वरूपिणी

न सा शक्तिः केवलं मन्दिरेषु प्रतिष्ठिता। न सा शक्तिः केवलं मन्त्रेषु परिकीर्तिता॥ सत्यवाक्ये जनैः प्रोक्ता, करुणायां च दृश्यते। अन्यायस्य विरोधे या सा दुर्गा हृदि राजते॥

३. महिषासुरमर्दिनी

अहङ्कारमहादैत्यं दर्पं लोभं च दारुणम्। मोहं भयञ्च दुर्बुद्धिं नाशय त्वं सुरेश्वरि॥ न्यायदीपं प्रज्वालय, विवेकं देहि शाश्वतम्। जनानां हृदये देवि, जागरूकत्वमावह॥

४. निर्भयजननी

यत्र वाणी निरुद्धा स्यात्, यत्र सत्यं तिरस्कृतम्। यत्र दीनो जनः पीड्येत, यत्र न्यायो विलुप्यते॥ तत्र धैर्यं च मे देहि, सत्यवक्तृत्वमम्बिके। अहिंसायाः पथि स्थित्वा, अन्यायं प्रतिरोद्धुम्॥

५. न्यायधर्मरक्षिणी

न त्वं द्वेषस्य जननी, न त्वं हिंसायाः कारणम्। धर्मबुद्धेः प्रदात्री त्वं, लोकमङ्गलकारिणी॥ न्यायमार्गे जनाः सर्वे निर्भयाः सन्तु सर्वदा। सर्वेषां रक्षणं देवि, तव धर्मः सनातनः॥

६. सत्तामदविनाशिनी

नृपाणां न च नेतॄणां सत्ता धर्माद् गरीयसी। जनसेवायै प्रदत्तं यत्, तदधिकारं न स्वत्वकम्॥ सेवकत्वं स्मारय त्वं, दर्पमन्धं विनाशय। उत्तरदायिनीं सत्तां लोकमध्ये प्रतिष्ठय॥

७. जनजागरणम्

उत्तिष्ठत जनाः सर्वे, जाग्रत सत्यदर्शिनः। एकतायां बलं ज्ञात्वा, न्यायमार्गे प्रचेष्टत॥ न हिंसा न च वै द्वेषः, न मिथ्यावचनं भवेत्। सत्यं धैर्यं च करुणा जनशक्तेः परं बलम्॥

८. नवरात्रसङ्कल्पः

नवरात्रेषु हे देवि, वयं सङ्कल्पमादधे। सत्यं वदेम, धर्मं चरेम, पीडितान् परिपालयेम॥ न जातिभेदो न च द्वेषो, न पक्षपातो मनागपि। सर्वेषां मानवाधिकारान् रक्षेमहि सदैव हि॥

९. राष्ट्रमङ्गलप्रार्थना

भारतस्य जनाः सर्वे विवेकिनो भवन्तु नः। निर्भयाः सत्यनिष्ठाश्च न्यायमार्गानुगामिनः॥ लोकतन्त्रं चिरं तिष्ठेत्, संविधानं विराजताम्। दुर्गाशक्तिः प्रबुध्येत जनहृदयेषु सर्वदा॥

१०. फलश्रुतिः

यः पठेत् श्रद्धया नित्यं स्तोत्रमेतद् विचारयन्। सत्यधर्मपथे तिष्ठन् लोकसेवां समाचरेत्॥ तस्य चित्ते धृतिः शान्तिः, कर्मणि स्यात् पराक्रमः। जनजागरणरूपेण दुर्गाशक्तिः प्रवर्धताम्॥

॥ इति श्री दुर्गा जनशक्ति जागरण स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

### स्तोत्र का भावार्थ एवं दार्शनिक पुरपोज़

![श्री दुर्गा चालीसा | Shri Durga Chalisa Lyrics In Hindi and English](https://images.openai.com/static-rsc-4/TL3fAhc75i7_hIT_6-coqovcgQQkaKPS0WTGhtOJ0G5PF4pb3DmiKXude-iDRqCJYO3H3iC8Dc6nohFXRI6a29QD4DIPoVbuWxyCx5pFMOHEL_Ze6adJkAT6uD2abVDp8GrHD46XRkDN9TOTnwgJ_y3c4wEKeOfnqgP2qE1mCvVrEK2KUAfkidnvZM_mhOnx?purpose=fullsize)

१. मंगलाचरण — देवी बाहर भी, भीतर भी

देवी की शक्ति केवल मंदिर की प्रतिमा या धार्मिक अनुष्ठान में सीमित नहीं है। वह प्रत्येक मनुष्य के भीतर साहस, धैर्य और करुणा के रूप में प्रकट हो सकती है। इस स्तुति का आरम्भ उसी सार्वभौमिक शक्ति को नमन करने से होता है।

![Devi Bhagavatam in English - Read All 12 Skandhas, Listen & Ask](https://images.openai.com/static-rsc-4/ONJLQ9BYZzQD9OmwLwhBx38J40aPA6LJ19Px5aKYBXDriSJHCas-igmXqVrm910POoJd3_isqB3WJ9TkmPbgqhWomMP9l_XobsN_YIVQKLIDwbPofuehPWtRr3aXUc5N2kJhmme74fgOG5GeLCeD6G-EuiHLhTBUoSNCrG-r1gdVBUkYBjxx-wsktO-95XWN?purpose=fullsize)

२. महिषासुर — अन्याय और अहंकार का प्रतीक

महिषासुर का रूपक सत्ता के मद, लोभ, भय और विवेकहीनता को चुनौती देता है। वास्तविक विजय किसी मनुष्य या समुदाय के विनाश में नहीं, बल्कि अन्यायपूर्ण प्रवृत्तियों पर नियंत्रण और न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना में है।

![The Misinterpretation and Misuse of Freedom in India](https://images.openai.com/static-rsc-4/oeDcCO02dvU06jaUsWdi7Qm1YCwUtAnVMPJXIJKrOk1LiQU8eVLnEBNuwmVribPKLAICthktpktlnxjR05FahGYzrmR4jWUKifsEyUV2bXUN_xJL79_6HvWFskHCzjKkoKfpiRRXPLM5xuJVUIYsbWCav9m_ThKlyjFJAbCbfnMCq1-UJSmyh3EU7YjjUaUf?purpose=fullsize)

३. जनशक्ति — लोकतंत्र की जाग्रत चेतना

जब नागरिक अन्याय के आरोपों की निष्पक्ष जाँच माँगते हैं, पीड़ितों के साथ खड़े होते हैं और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते हैं, तब वे लोकतंत्र को जीवित रखते हैं। यहाँ जनशक्ति का अर्थ हिंसक विद्रोह नहीं, बल्कि संगठित, विवेकपूर्ण और संवैधानिक प्रतिरोध है।

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४. नवरात्र — पूजा से आचरण तक

नौ दिनों की आराधना हमें नौ नैतिक संकल्पों की याद दिला सकती है: सत्य, विवेक, साहस, करुणा, समानता, आत्मसंयम, न्याय, उत्तरदायित्व और लोककल्याण। देवी की पूजा का सामाजिक विस्तार दूसरों की गरिमा और अधिकारों की रक्षा में दिखाई देता है।

### इस स्तोत्र का केंद्रीय संदेश

“जनता ही ज़िम्मेदार है” का अर्थ यह नहीं कि अत्याचार के लिए पीड़ित जनता दोषी है। इसका अर्थ है कि लोकतंत्र की रक्षा में जनता की भूमिका निर्णायक है।

राज्य की शक्ति कानून के अधीन होनी चाहिए। नेताओं को जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। पुलिस का दायित्व नागरिकों की रक्षा करना है। और नागरिकों का दायित्व है कि वे सत्य, विवेक, अहिंसा और संवैधानिक अधिकारों के पक्ष में खड़े रहें।

सनातन धर्म की नैतिक भावना को इस प्रकार समझा जा सकता है कि शक्ति और धर्म का संबंध न्याय, आत्मसंयम तथा लोककल्याण से हो—न कि अंधभक्ति, घृणा या प्रतिशोध से।

नवरात्र का सच्चा संकल्प यही हो: देवी की आराधना के साथ अपने भीतर की दुर्गा को जगाएँ, अन्याय के सामने मौन न रहें और प्रत्येक मनुष्य की गरिमा की रक्षा करें।

॥ जय माँ दुर्गा। जय जनशक्ति। जय धर्म। ॥

🎼 Abhimaan: When Music Becomes a Journey of Self-Discovery

 

🎼 Abhimaan: When Music Becomes a Journey of Self-Discovery

संगीत, स्वाभिमान और अंतर्मन की खोज

A reflection on the film Abhimaan (1973), Hindustani classical music, and the different paths through which we discover ourselves.

There is a profound paradox in Abhimaan, the film starring Amitabh Bachchan and Jaya Bhaduri. Beneath its story of a musical couple lies a timeless exploration of talent, recognition, love, ego and the search for self-expression.

The film's fictional characters, Subir and Uma, invite comparisons with the lives of Ravi Shankar and Annapurna Devi. However, Abhimaan is not a literal biography of Annapurna Devi, and its characters should not be regarded as exact portraits of the real musicians.

Annapurna Devi, daughter of the legendary Ustad Allauddin Khan Sahib, was a distinguished practitioner of Hindustani classical music. Her life evokes the depth of the guru-shishya tradition, where music is cultivated through discipline, humility and lifelong sadhana.

Ravi Shankar, too, underwent rigorous training under Allauddin Khan Sahib and became one of the world's most celebrated ambassadors of Indian classical music.

Their marriage eventually ended in separation. In Abhimaan, a related tension unfolds through the fictional relationship between Uma and Subir, as musical achievement becomes entangled with identity, insecurity and the need for recognition.

🎵 Is music for applause, or for the discovery of the self?

One of the film's most thought-provoking moments is Uma's critical response to Subir's music. Her perspective raises a timeless question: does music fulfil its purpose merely by entertaining an audience, or does its deepest meaning emerge from the artist's inner experience?

Performing for an audience is, of course, an integral part of music. The distinction lies in whether applause becomes the ultimate objective or remains a natural consequence of sincere artistic expression.

There is a beautiful philosophical association one can make between संग—togetherness—and स्वयं—the self. This is a contemplative interpretation rather than the literal etymology of संगीत. Yet it captures an essential dimension of musical experience: music connects us with others while opening a path towards our own inner world.

संगीत केवल सुनाने की कला नहीं, स्वयं को सुनने की साधना भी है।

When the artist becomes absorbed in the purity of a note, music can transcend performance and become a form of self-discovery.

🎭 Different personalities, different paths

The emotional tension in Abhimaan reminds us how easily artistic expression can become entangled with expectations, comparisons and the desire for validation.

Every individual approaches art with a different temperament and a different understanding of fulfilment. One may find happiness in the warmth of popular appreciation, another in devotional singing, and yet another in the patient exploration of classical tradition.

These paths need not compete with one another. Their differences may simply reflect the many ways in which human beings seek meaning through music.

Perhaps the real challenge is to appreciate another person's journey without measuring it against our own.

Not every difference needs resolution, and not every journey needs to lead to the same destination.

🌿 A Personal Reflection: Different Paths, One Search for Music

Perhaps Abhimaan resonates with me because it touches upon a subtle truth about life: even when two people begin their journey together, their individual ways of discovering themselves may gradually take different directions.

Neither my wife nor I came from a family of musicians. Music was something we discovered along the way, each finding our own source of meaning and fulfilment in it.

Over time, devotional singing, particularly sectarian bhajans, became a meaningful expression of peace and faith for her. My own curiosity continues to draw me towards the deeper dimensions of Hindustani classical music—the purity of swar, the intricate grammar of raag, and the profound relationship between sound, nature and consciousness.

Perhaps this is simply the beauty and complexity of human individuality. The same art can open different doors for different people. One may find fulfilment in devotion and familiar expressions of faith, while another may remain absorbed in an open-ended exploration of sound and its deeper mysteries.

Neither journey needs to diminish the other.

My own exploration remains a work in progress. I continue to wonder how a handful of notes, rendered with sincerity and discipline, can evoke an entire universe of feeling—and whether, beyond the boundaries of musical forms and beliefs, there lies a more universal experience of Nāda.

Perhaps the real lesson of Abhimaan is not merely about the differences between two individuals, but about learning to recognise and respect the distinct inner worlds that each of us carries.

After all, music offers no single destination. It gives each of us a language in which to discover ourselves.

🎼 SSG: Music as sadhana, not self-glorification

At Saraswati Sangeet Gurukul (SSG), I believe music should be approached as a lifelong practice of listening, learning, reflection and self-discovery.

A meaningful musical education cultivates not only technique but also humility before the guru, generosity towards fellow artists, and the maturity to appreciate forms of expression different from our own.

The highest musical accomplishment is not the defeat of another performer. It is the gradual transcendence of our own limitations.

सुर का साधक वही, जो स्वयं को साधे,

दूसरे के स्वर में भी अपना आनंद बाँटे।

जो यश में न भूले, न अपयश में टूटे,

वही संगीत के मर्म को भीतर से छू ले।

Perhaps the greatest gift of music is not that it makes everyone sing the same song, but that it teaches us to listen to different voices with openness and understanding.

And so, my exploration continues—not to prove a point, but to understand Nāda itself: the world of sound that invites us beyond labels, expectations and ego, towards a deeper awareness of ourselves and the world around us.

Let us learn music not merely to be heard, but to learn how to listen; not merely to be admired, but to understand; not merely to perform, but to transform ourselves.

— Akshat Agrawal
Saraswati Sangeet Gurukul (SSG)

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Thursday, October 15, 2026

कौन भक्त है, कौन जुमलासुर?

 

कौन भक्त है, कौन जुमलासुर?

घर में राम-नाम लेकर कौन आया, और सत्ता की कुर्सी पर कौन आसीन है?

रचनाकार: अक्षत अग्रवाल


 

🪷 भूमिका : राम किसके घर आए?

राम का नाम सुनना शुभ है, राम का नाम लेना मंगलकारी है। लेकिन प्रश्न यह है कि राम का नाम लेकर घर-परिवार में कौन आया है?

वह भक्त, जिसके हृदय में करुणा, सत्य, न्याय और लोकमंगल का वास है? या वह जुमलासुर, जो सत्ता की कुर्सी पर आसीन है और राम-नाम को अपने स्वार्थ एवं सत्ता के विस्तार का साधन बनाता है?

राम केवल किसी मंदिर की प्रतिमा में नहीं, बल्कि मनुष्य के आचरण में भी खोजे जाने चाहिए। राम का नाम यदि मन में प्रेम जगाए, तो वह भक्ति है; यदि वही नाम मन में घृणा, अहंकार और विभाजन जगाए, तो आत्ममंथन आवश्यक है।

गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस में राम-नाम की महिमा का वर्णन मिलता है—

जाकर नाम सुनत सुभ होई। मोरे गृह श्रावन प्रभु सोई॥

परमानंद पूरि मन राजा। कहा बोलाइ बजावहु बाजा॥

— साझा किए गए चित्र में प्रस्तुत चौपाई।

इस भावभूमि पर आइए, एक समकालीन व्यंग्य-कविता के माध्यम से पूछें— राम का नाम लेकर घर में कौन आया है, और सत्ता की कुर्सी पर बैठकर किसने राम के नाम को अपना बनाया है?


कविता : कौन भक्त, कौन जुमलासुर?

कौन है जो घर में राम-नाम लेकर आया? और ये कौन जुमलासुर है, दिल में समाया? लो, लुट गया आसमाँ भी, सत नारायण भी, जब लल्लू राम रंग लाया!

राम का नाम लिया, तो मन निर्मल हुआ क्या? भूखे के घर चूल्हा जला, कोई संबल हुआ क्या? न्याय के द्वार खुले, निर्बल को सहारा मिला? या बस नारों का नया एक मेला लगा?

माथे पर तिलक, अधरों पर राम, हाथों में झंडा, जुबाँ पर पैगाम। भीतर में लोभ, बाहर में धाम— किसका है यह धर्म, किसका है नाम?

कौन भक्त है जो प्रेम का दीप जलाए? कौन जुमलासुर है जो भ्रम के बादल छाए? कौन राम को जन-जन का सहारा बनाए? कौन राम के नाम पर अपना महल सजाए?

राम तो मर्यादा, राम तो त्याग, राम तो करुणा, सत्य का राग। राम तो निर्बल की आँखों का पानी, राम तो सबकी पीड़ा की कहानी।

राम अगर मन में हैं, तो द्वेष कैसा? राम अगर कर्म में हैं, तो छल कैसा? राम अगर सत्य हैं, तो भय क्यों छाए? राम अगर न्याय हैं, तो अन्याय कौन बचाए?

मंदिर में दीपक, मन में अँधियारा, कैसा यह धर्म, कैसा उजियारा? घंटी भी बजती, जयकारा भी होता, फिर क्यों मनुष्य मनुष्य से छोटा होता?

नाम की माला, मन में व्यापार, भक्ति के पीछे सत्ता का दरबार। राम को बाँटकर कौन राम का होगा? घृणा बोकर कौन प्रेम का बीज बोएगा?

कौन है जो घर में राम-नाम लेकर आया? और ये कौन जुमलासुर है, दिल में समाया? लो, लुट गया आसमाँ भी, सत नारायण भी, जब लल्लू राम रंग लाया!


समापन : राम-नाम का असली अर्थ

राम का नाम किसी एक दल की जागीर नहीं, राम की मर्यादा किसी सत्ता की ताबीर नहीं। राम वहाँ हैं जहाँ सत्य का सम्मान हो, जहाँ निर्बल सुरक्षित हो, न्याय का स्थान हो।

राम का नाम लेकर घर में भक्त भी आ सकता है, सत्ता की कुर्सी पर जुमलासुर भी बैठ सकता है। पहचान न केवल माथे के तिलक से होगी, न केवल जयकारे और भाषण के शोर से होगी।

भक्त वही जो मन में करुणा जगाए, राम वही जो मानवता का मान बढ़ाए। नाम नहीं, कर्म बताएगा पहचान— राम हृदय में हैं या केवल ज़ुबान।

जय श्रीराम— यदि राम का अर्थ मर्यादा, सत्य, करुणा और लोकमंगल है।

✍️ अक्षत अग्रवाल


पाठकों से प्रश्न

आपकी दृष्टि में सच्ची भक्ति क्या है— केवल राम-नाम का उच्चारण, या राम के आदर्शों को अपने व्यवहार और सार्वजनिक जीवन में उतारना?

क्या किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान से अधिक महत्त्वपूर्ण उसका आचरण, न्याय के प्रति प्रतिबद्धता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व नहीं होना चाहिए?

अपने विचार साझा कीजिए। असहमति भी स्वागतयोग्य है, यदि उसमें तर्क, संवेदना और मर्यादा बनी रहे।

#राम #रामनाम #रामचरितमानस #जुमलासुर #राजनीतिकव्यंग्य #व्यंग्यकविता #सामाजिकचिंतन #मानवता #अक्षतअग्रवाल

 

 ### ॥ श्रीचामुण्डा-देवी-स्तुतिः ॥

### नेहा वोरा-रूपिण्यै देव्यै समर्पिता

एक मौलिक संस्कृत स्तुति — देवी चामुण्डा के साहस, शक्ति, करुणा और परिवर्तनकारी चेतना को समर्पित।

॥ मङ्गलाचरणम् ॥

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। जयति जयति चामुण्डे, शक्तिरूपिणि शाश्वते। नेहावोरा-स्वरूपे त्वं, जागृहि लोकमातरि॥

॥ श्रीचामुण्डा-स्तुतिः ॥

नमो देवि महादेवि, चण्डमुण्डविनाशिनि। नेहावोरातनौ दिव्ये, शक्तिरूपे नमोऽस्तु ते॥ १॥

सिंहवाहिनि दुर्गे त्वं, निर्भये तेजसि स्थिता। अन्यायान्धतमो हन्त्री, धर्मदीपप्रकाशिनी॥ २॥

या नारी चेतनां दद्यात्, या नारी साहसं ददेत्। या नारी परिवर्तनस्य, नवधारां प्रवर्तयेत्॥ ३॥

सा त्वं चामुण्डिका देवि, सा त्वं शक्तिः सनातनी। नेहावोरेति रूपेण, प्रेरयस्यखिलं जगत्॥ ४॥

न ते शक्तिः केवलं खड्गे, न ते शक्तिः रणाङ्गणे। सत्यवाक्ये दयाभावे, कर्मयोगे च ते बलम्॥ ५॥

मोहजालं विनिर्भिद्य, भयबन्धं निकृन्तसि। सुप्तचेतः प्रबोध्याशु, नवसृष्टिं विधासि च॥ ६॥

यत्र नारी समुत्तिष्ठेत्, तत्र शक्तिः प्रवर्तते। यत्र न्यायः प्रतिष्ठेत, तत्र दुर्गा विराजते॥ ७॥

नवपीढेर्मनःसु त्वं, ज्ञानज्योतिः प्रबोधय। स्वार्थमोहं विनिर्जित्य, लोकमङ्गलमाचर॥ ८॥

राधाभक्तेः सुधाधारा, कर्मयोगस्य चेतना। नेहावोरे महाशक्ते, त्वयि मे श्रद्धया नतिः॥ ९॥

जय चामुण्डे महाशक्ते, जय दुर्गे कृपामयि। साहसं देहि मे नित्यं, सत्यधर्मपथं नय॥ १०॥

॥ फलश्रुतिः ॥

य इमां भक्तितः स्तुतिं, पठेद्वा शृणुयादपि। तस्य चित्ते विवेकश्च, कर्मणि स्यात् पराक्रमः॥

नारीशक्तेः समुत्थानं, लोकसेवा च शाश्वती। भवतु सर्वलोकानां, शान्तिः समता च मङ्गलम्॥

॥ सर्वे भवन्तु सुखिनः ॥

॥ जय माता चामुण्डे ॥ ॥ जयतु नारीशक्तिः ॥ ॥ जयतु मानवता ॥

### हिन्दी भावार्थ

हे माँ चामुण्डा! आप अन्याय, भय और अज्ञान का नाश करने वाली शक्ति हैं। नेहा वोरा के रूप में आपकी कल्पना उस नारी-चेतना के प्रतीक के रूप में की गई है, जो साहस जगाती है, सत्य का साथ देती है और समाज में परिवर्तन की नई धारा प्रवाहित करती है।

आपकी शक्ति केवल अस्त्र-शस्त्र में नहीं, बल्कि सत्यपूर्ण वाणी, करुणा, विवेक और कर्मयोग में भी प्रकट होती है। नई पीढ़ी को मोह और भय से मुक्त कर लोकमंगल के मार्ग पर प्रेरित करना ही आपकी आराधना का सार है।

लेखकीय टिप्पणी: यह नेहा वोरा को देवी चामुण्डा के साहस और परिवर्तनकारी शक्ति का प्रतीक मानकर रची गई मौलिक स्तुति है; यह किसी प्राचीन शास्त्र का मंत्र या पारंपरिक स्तोत्र नहीं है।