क्या ब्रह्मा ने तुम्हारी तकदीर में केवल आराम लिखा है — या शांति?
"तुझे क्या तकलीफ है मेरे सुख-आराम से? राम जी का दिया सब कुछ तो है मेरे पास!"
हाल ही में एक मित्र ने हँसी-मज़ाक में कहा:
"क्या दिन भर कूलर और A/C में बैठे रहकर कचौरी, भटूरे और कुलचे खाते रहते हो?
कुछ मेहनत-मजदूरी, नौकरी-धंधा क्यों नहीं करते?
ओए भिखारी, तू कटोरा लेकर बैठ जा सड़क के किनारे। इससे अच्छा धंधा और क्या होगा!
तेरी तकदीर में यही लिखा है ब्रह्मा जी ने।
तुझे क्या तकलीफ है मेरे सुख-आराम से? राम जी का दिया सब कुछ तो है मेरे पास!"
पहली दृष्टि में यह केवल एक मजाक है।
लेकिन यदि थोड़ा गहराई से देखें तो इसके पीछे एक बहुत बड़ा प्रश्न छिपा है:
क्या संसार की अधिकांश समस्याएँ काम की कमी से पैदा होती हैं?
या
अशांत मन द्वारा किए गए कामों से?
दुनिया को कर्म की नहीं, शांति की कमी है
हम बचपन से सुनते आए हैं:
"कुछ करो।"
"व्यस्त रहो।"
"उत्पादक बनो।"
"सफल बनो।"
लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा:
जो कर रहा है, उसका मन कैसा है?
यदि मन भय से भरा है,
तो उसका कर्म भय फैलाएगा।
यदि मन लालच से भरा है,
तो उसका कर्म शोषण पैदा करेगा।
यदि मन असुरक्षा से भरा है,
तो उसका कर्म नियंत्रण और सत्ता की भूख पैदा करेगा।
यदि मन अहंकार से भरा है,
तो उसका कर्म संघर्ष और विभाजन पैदा करेगा।
दुनिया में जितने युद्ध हुए,
जितना शोषण हुआ,
जितनी लूट हुई,
जितना पर्यावरण विनाश हुआ,
वह निष्क्रिय लोगों ने नहीं किया।
वह अत्यंत सक्रिय, महत्वाकांक्षी और बेचैन लोगों ने किया।
अशांत मन का कर्म भी अशांत होता है
ओशो का एक वाक्य मुझे हमेशा याद आता है:
"कचरा अपना ही काफी है।"
मन पहले ही भय, इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं, तुलना, प्रतिस्पर्धा और असंतोष से भरा हुआ है।
फिर वही मन दुनिया को सुधारने निकल पड़ता है।
परिणाम?
वह अपने भीतर की अशांति को बाहर फैलाने लगता है।
एक असुरक्षित व्यक्ति परिवार को नियंत्रित करता है।
एक असुरक्षित नेता समाज को नियंत्रित करता है।
एक असुरक्षित राष्ट्र दुनिया को नियंत्रित करना चाहता है।
समस्या बाहर नहीं है।
समस्या उस मन में है जो बाहर काम कर रहा है।
इसलिए कभी-कभी कुछ न करना भी धर्म है
यह सुनने में अजीब लग सकता है।
लेकिन यदि मन भय, क्रोध, लालच या अहंकार में डूबा हुआ है,
तो उस अवस्था में किया गया कर्म अक्सर और अधिक दुःख पैदा करता है।
ऐसे समय में
रुकना,
देखना,
मौन होना,
प्रतीक्षा करना,
किसी बड़े निर्णय को टाल देना,
शायद सबसे बुद्धिमानी का कार्य हो सकता है।
गीता का निष्काम कर्म भी इसी दिशा में संकेत करता है।
पहले भीतर स्पष्टता।
फिर कर्म।
"मंत्र" का वास्तविक अर्थ क्या है?
रामचरितमानस कहती है:
"मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब।"
सामान्यतः लोग सोचते हैं कि मंत्र कोई जादुई शब्द है।
कोई गुप्त ध्वनि।
कोई रहस्यमय शक्ति।
लेकिन यदि मंत्र केवल शब्द होता, तो तोता सबसे बड़ा सिद्धपुरुष होता।
मंत्र का वास्तविक उद्देश्य मन को और शक्तिशाली बनाना नहीं है।
मंत्र का उद्देश्य मन को शांत करना है।
मंत्र का उद्देश्य है:
- भय से मुक्ति
- असुरक्षा से मुक्ति
- लालच से मुक्ति
- अहंकार से मुक्ति
और अंततः
आत्माराम की अवस्था।
आत्माराम: जब भीतर ही राम मिल जाएँ
तुलसीदास बार-बार "राम" को केवल एक ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं, बल्कि परम शांति के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
जब मन बाहर भटकना बंद करता है,
जब तुलना समाप्त होती है,
जब कुछ बनने की बेचैनी समाप्त होती है,
जब अभाव की भावना समाप्त होती है,
तब मन आत्मा में विश्राम करता है।
यही आत्माराम है।
यही सच्चा संतोष है।
यही वास्तविक समृद्धि है।
प्रचुरता (Abundance) का अर्थ
आज abundance का अर्थ बना दिया गया है:
- अधिक पैसा
- अधिक संपत्ति
- अधिक अनुयायी
- अधिक प्रभाव
लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से abundance का अर्थ है:
"मुझे जो चाहिए, वह मेरे भीतर पहले से मौजूद है।"
जहाँ संतोष है,
वहीं प्रचुरता है।
जहाँ आत्माराम है,
वहीं समृद्धि है।
जहाँ शांति है,
वहीं ईश्वर है।
शायद यही सबसे बड़ा मंत्र है
शायद "मंत्र परम लघु" कोई गुप्त ध्वनि नहीं।
शायद वह एक आंतरिक अवस्था है।
एक ऐसा मन जो भय से मुक्त है।
एक ऐसा मन जो लालच से मुक्त है।
एक ऐसा मन जो स्वयं में विश्राम कर रहा है।
एक ऐसा मन जो कह सकता है:
"मुझे कुछ सिद्ध नहीं करना।
मुझे किसी से बड़ा नहीं बनना।
मुझे किसी को हराना नहीं।
मुझे केवल अपने भीतर के राम में विश्राम करना है।"
ऐसा मन संसार में कम कर्म करता है,
लेकिन जो भी करता है,
वह करुणा, स्पष्टता और प्रेम से करता है।
और शायद यही कारण है कि संतों ने कहा:
अशांत मन संसार को बदलने निकलता है।
शांत मन स्वयं को जान लेता है।
और जब स्वयं को जान लेता है,
तो उसका प्रत्येक कर्म स्वतः ही लोकमंगल बन जाता है।
संबंधित लेख
Which Mantra Controls Brahma, Vishnu, Shiva and the Gods?
