**The Hypocrisy of Yogi Adityanath’s Government in Uttar Pradesh: Image vs. Reality**
Lucknow, Uttar Pradesh — Yogi Adityanath, the saffron-robed Chief Minister of Uttar Pradesh since 2017, has cultivated a public image as a decisive, no-nonsense administrator. He projects “zero tolerance” for crime, aggressive promotion of Hindu cultural revival, and strong governance in India’s most populous state. Yet critics, including opposition voices, point to glaring inconsistencies between this projection and ground realities — from pandemic mismanagement to selective outrage over protests and persistent social issues.
### The Ganga’s Unquiet Dead: COVID Crisis
One of the most haunting images associated with UP during the 2021 COVID-19 second wave was bodies floating in the Ganges. Reports from districts like Ghazipur and Ballia documented hundreds of corpses washing up or buried shallowly on riverbanks.
The state government faced accusations of underreporting deaths and inadequate preparedness. Crematoriums were overwhelmed, oxygen supplies critically short, and families too poor or stigmatized to perform proper last rites. CM Yogi Adityanath’s administration later ordered dignity in cremations and banned river dumping, but the visual evidence had already spread nationally. Opposition parties labeled it a failure bordering on criminal negligence. While not “genocide” as some hyperbolic WhatsApp forwards claim — the wave devastated the entire country — the gap between the government’s claims of control and the river’s testimony fueled deep public anger.
### Farmers, Protests, and Selective Law & Order
The government frequently touts improved law and order, citing encounters with criminals. However, incidents involving protesters tell a different story. The 2021 Lakhimpur Kheri violence, where a convoy linked to a Union Minister’s son allegedly ran over farmers protesting the now-repealed farm laws, resulted in multiple deaths. Eight to nine people died, including farmers. Yogi Adityanath called it “unfortunate” and promised investigation, but critics accused the administration of shielding the powerful.
Farmers dying on roads or facing hardship during protests, and earlier handling of agitations, have drawn similar charges of heavy-handedness against the voiceless. Contrast this with the government’s sharp criticism of the Shaheen Bagh protests in Delhi (2019-2020) — a sit-in against the Citizenship Amendment Act led largely by Muslim women. Yogi Adityanath publicly questioned “where are the men?” and framed it as a threat to peace, despite it occurring outside his jurisdiction.
This raises questions of hypocrisy: protests challenging the government’s ideological agenda face swift condemnation or force, while incidents involving ruling dispensation allies receive measured responses.
### Social Issues: Children, Women, and Cultural Claims
Uttar Pradesh continues to report high numbers of crimes against women and children, with NCRB data often placing the state at or near the top nationally. Cases like Unnao and Hathras drew international attention for alleged delays, political interference, and victim-blaming. While the government has enacted laws denying anticipatory bail in such cases and runs “Operation Conviction,” implementation gaps and political protection allegations persist.
The “Baba” culture and temple ecosystem, which the government actively promotes through renovation projects and spiritual tourism, has also faced scrutiny. Allegations occasionally surface of misuse of temple premises or ashrams — from exploitation scandals to commercial activities. Critics juxtapose grand temple redevelopment rhetoric with reports of elderly devotees or vulnerable individuals facing issues in such spaces. The state’s push to regulate religious donations and properties is defended as reform but viewed by some as selective control.
### The Broader Picture
Supporters argue Yogi’s government inherited a broken system from previous SP and BSP regimes, improved investment climate, built expressways, and cracked down on “bahubali” (strongman) politics. Crime statistics are contested — encounters are popular among the masses tired of lawlessness.
Yet the pattern of narrative control is evident: successes are amplified, systemic failures attributed to “previous governments” or “conspiracy,” and inconvenient visuals (Ganga bodies, protest violence) downplayed. The poetic jab circulating in critical circles — *Koi kare nautanki, koi bajave ghanti, aur pet bharen tanki* (Some do drama, some ring bells, and fill their stomachs) — captures public cynicism about performative politics.
Uttar Pradesh remains a complex state of 240 million people. Governance here tests the tension between majoritarian cultural assertion and basic state capacity — delivering healthcare, justice, and dignity during crises. The Yogi government’s tenure highlights real administrative shifts alongside persistent credibility gaps when rhetoric collides with rivers full of the dead, roads stained by protest, and unfulfilled promises of safety and equity.
Whether this constitutes hypocrisy or the inevitable messiness of governing India’s heartland is for voters to judge in elections. For now, the disconnect between the projected “New UP” and lingering old problems continues to fuel debate.
Akshat Agrawal Musings
Tuesday, June 2, 2026
The Hypocrisy of Yogi Adityanath’s Government in Uttar Pradesh: Image vs. Reality
क्या ब्रह्मा ने तुम्हारी तकदीर में सिर्फ आराम लिखा है?
क्या ब्रह्मा ने तुम्हारी तकदीर में केवल आराम लिखा है — या शांति?
"तुझे क्या तकलीफ है मेरे सुख-आराम से? राम जी का दिया सब कुछ तो है मेरे पास!"
हाल ही में एक मित्र ने हँसी-मज़ाक में कहा:
"क्या दिन भर कूलर और A/C में बैठे रहकर कचौरी, भटूरे और कुलचे खाते रहते हो?
कुछ मेहनत-मजदूरी, नौकरी-धंधा क्यों नहीं करते?
ओए भिखारी, तू कटोरा लेकर बैठ जा सड़क के किनारे। इससे अच्छा धंधा और क्या होगा!
तेरी तकदीर में यही लिखा है ब्रह्मा जी ने।
तुझे क्या तकलीफ है मेरे सुख-आराम से? राम जी का दिया सब कुछ तो है मेरे पास!"
पहली दृष्टि में यह केवल एक मजाक है।
लेकिन यदि थोड़ा गहराई से देखें तो इसके पीछे एक बहुत बड़ा प्रश्न छिपा है:
क्या संसार की अधिकांश समस्याएँ काम की कमी से पैदा होती हैं?
या
अशांत मन द्वारा किए गए कामों से?
दुनिया को कर्म की नहीं, शांति की कमी है
हम बचपन से सुनते आए हैं:
"कुछ करो।"
"व्यस्त रहो।"
"उत्पादक बनो।"
"सफल बनो।"
लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा:
जो कर रहा है, उसका मन कैसा है?
यदि मन भय से भरा है,
तो उसका कर्म भय फैलाएगा।
यदि मन लालच से भरा है,
तो उसका कर्म शोषण पैदा करेगा।
यदि मन असुरक्षा से भरा है,
तो उसका कर्म नियंत्रण और सत्ता की भूख पैदा करेगा।
यदि मन अहंकार से भरा है,
तो उसका कर्म संघर्ष और विभाजन पैदा करेगा।
दुनिया में जितने युद्ध हुए,
जितना शोषण हुआ,
जितनी लूट हुई,
जितना पर्यावरण विनाश हुआ,
वह निष्क्रिय लोगों ने नहीं किया।
वह अत्यंत सक्रिय, महत्वाकांक्षी और बेचैन लोगों ने किया।
अशांत मन का कर्म भी अशांत होता है
ओशो का एक वाक्य मुझे हमेशा याद आता है:
"कचरा अपना ही काफी है।"
मन पहले ही भय, इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं, तुलना, प्रतिस्पर्धा और असंतोष से भरा हुआ है।
फिर वही मन दुनिया को सुधारने निकल पड़ता है।
परिणाम?
वह अपने भीतर की अशांति को बाहर फैलाने लगता है।
एक असुरक्षित व्यक्ति परिवार को नियंत्रित करता है।
एक असुरक्षित नेता समाज को नियंत्रित करता है।
एक असुरक्षित राष्ट्र दुनिया को नियंत्रित करना चाहता है।
समस्या बाहर नहीं है।
समस्या उस मन में है जो बाहर काम कर रहा है।
इसलिए कभी-कभी कुछ न करना भी धर्म है
यह सुनने में अजीब लग सकता है।
लेकिन यदि मन भय, क्रोध, लालच या अहंकार में डूबा हुआ है,
तो उस अवस्था में किया गया कर्म अक्सर और अधिक दुःख पैदा करता है।
ऐसे समय में
रुकना,
देखना,
मौन होना,
प्रतीक्षा करना,
किसी बड़े निर्णय को टाल देना,
शायद सबसे बुद्धिमानी का कार्य हो सकता है।
गीता का निष्काम कर्म भी इसी दिशा में संकेत करता है।
पहले भीतर स्पष्टता।
फिर कर्म।
"मंत्र" का वास्तविक अर्थ क्या है?
रामचरितमानस कहती है:
"मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब।"
सामान्यतः लोग सोचते हैं कि मंत्र कोई जादुई शब्द है।
कोई गुप्त ध्वनि।
कोई रहस्यमय शक्ति।
लेकिन यदि मंत्र केवल शब्द होता, तो तोता सबसे बड़ा सिद्धपुरुष होता।
मंत्र का वास्तविक उद्देश्य मन को और शक्तिशाली बनाना नहीं है।
मंत्र का उद्देश्य मन को शांत करना है।
मंत्र का उद्देश्य है:
- भय से मुक्ति
- असुरक्षा से मुक्ति
- लालच से मुक्ति
- अहंकार से मुक्ति
और अंततः
आत्माराम की अवस्था।
आत्माराम: जब भीतर ही राम मिल जाएँ
तुलसीदास बार-बार "राम" को केवल एक ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं, बल्कि परम शांति के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
जब मन बाहर भटकना बंद करता है,
जब तुलना समाप्त होती है,
जब कुछ बनने की बेचैनी समाप्त होती है,
जब अभाव की भावना समाप्त होती है,
तब मन आत्मा में विश्राम करता है।
यही आत्माराम है।
यही सच्चा संतोष है।
यही वास्तविक समृद्धि है।
प्रचुरता (Abundance) का अर्थ
आज abundance का अर्थ बना दिया गया है:
- अधिक पैसा
- अधिक संपत्ति
- अधिक अनुयायी
- अधिक प्रभाव
लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से abundance का अर्थ है:
"मुझे जो चाहिए, वह मेरे भीतर पहले से मौजूद है।"
जहाँ संतोष है,
वहीं प्रचुरता है।
जहाँ आत्माराम है,
वहीं समृद्धि है।
जहाँ शांति है,
वहीं ईश्वर है।
शायद यही सबसे बड़ा मंत्र है
शायद "मंत्र परम लघु" कोई गुप्त ध्वनि नहीं।
शायद वह एक आंतरिक अवस्था है।
एक ऐसा मन जो भय से मुक्त है।
एक ऐसा मन जो लालच से मुक्त है।
एक ऐसा मन जो स्वयं में विश्राम कर रहा है।
एक ऐसा मन जो कह सकता है:
"मुझे कुछ सिद्ध नहीं करना।
मुझे किसी से बड़ा नहीं बनना।
मुझे किसी को हराना नहीं।
मुझे केवल अपने भीतर के राम में विश्राम करना है।"
ऐसा मन संसार में कम कर्म करता है,
लेकिन जो भी करता है,
वह करुणा, स्पष्टता और प्रेम से करता है।
और शायद यही कारण है कि संतों ने कहा:
अशांत मन संसार को बदलने निकलता है।
शांत मन स्वयं को जान लेता है।
और जब स्वयं को जान लेता है,
तो उसका प्रत्येक कर्म स्वतः ही लोकमंगल बन जाता है।
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Monday, June 1, 2026
बाबा मुक्ति स्तोत्र (ग्राम्य भाषा में, कलियुग के पोस्टाचार्यन के नाम)
बाबा मुक्ति स्तोत्र
(ग्राम्य भाषा में, कलियुग के पोस्टाचार्यन के नाम)
शिष्य उवाच —
हे बाबा!
दिन भर में कतनी पोस्ट ठेलत हो?
कउनो फँसा कि नाहीं?
बाबा उवाच —
बच्चा!
फँसावनौ बड़ा कठिन तप है।
आज नाहीं,
त काल।
काल नाहीं,
त परसों।
कबहूँ न कबहूँ
कउनो न कउनो अइहै।
शिष्य उवाच —
बाबा!
जौन एक ठो थी,
ऊ भी भाग गई।
बाबा उवाच —
अरे मूर्ख!
पोस्ट में हमार फोटो कहाँ लगायो था?
ज्ञान-व्यान से का होत है?
फोटो लगाव,
भक्त बनाव।
शिष्य उवाच —
बाबा!
तुम्हार फोटो में अइसन का है?
बाबा उवाच —
फोटोए ब्रह्म है।
रीलए वेद है।
फॉलोअरए साधना है।
लाइकए मोक्ष है।
तब साधक गरियावत बोला —
ओए बाबा जी!
तोहरे से किसने माँगा ज्ञान?
हम त चाय पिये आये रहे।
बाबा उवाच —
यही त लीला है बच्चा।
कउनो चाय पीये आवत है।
कउनो दुःख सुनावे आवत है।
कउनो ज्ञान लेवे आवत है।
सबके हाथ में
सदस्यता फॉर्म पकड़ा दिहल जात है।
जय हो पोस्टाचार्य महाराज की।
जय हो रीलानन्द स्वामी की।
जय हो लाइकानन्द परमहंस की।
जय हो फॉलोअरगिरि पीठाधीश्वर की।
मुक्ति मंत्र
न बाबा पे भरोसा।
न फोटो पे भरोसा।
न रील पे भरोसा।
न लाइक पे भरोसा।
अपने दिमाग पे भरोसा।
अपने विवेक पे भरोसा।
साँच पे भरोसा।
फलश्रुति
जौन मनई रोज सबेरे
ई स्तोत्र पढ़ि लेत है,
ऊ बाबा के कोर्स,
प्रीमियम दीक्षा,
वीआईपी दर्शन,
विशेष अनुष्ठान,
ऑनलाइन मोक्ष योजना,
आदि से यथाशक्ति बचल रहत है।
अंतिम चौपाई
पोस्ट पोस्ट सब जगत ठगाना।
फोटो देखि भटका जमाना॥
जाग रे भाई, आँखि उघार।
विवेक बिना सब बेकार॥
॥ इति श्री बाबा मुक्ति स्तोत्र समाप्त ॥ 🙏
श्री बाबा-मुक्ति स्तोत्रम्
(कलियुगे सोशल-मीडिया-प्रसिद्ध-बाबानां निवृत्तये)
ॐ नमो विवेकाय।
शिष्य उवाच —
दिनेषु कतिपयान् पोस्टान् क्षिपसि भोः बाबा?
कश्चित् जनः अद्यावधि फसित्वा दृश्यते किम्?
बाबा उवाच —
वत्स!
अद्य न फसति,
श्वः फसति।
श्वः न फसति,
परश्वः फसति।
फँसनमेव मोक्षमार्गः।
शिष्य उवाच —
हे गुरुदेव!
या एका भक्तिका आसीत्,
सापि पलायिता।
बाबा उवाच —
मा शुचः वत्स।
अग्रिमे पोस्टे
मम चित्रं निवेशय।
ज्ञानस्य किम् प्रयोजनम्?
चित्रमेव परब्रह्म।
ॐ बाबा-फोटो-महिम्ने नमः।
ॐ रीलस्वरूपाय नमः।
ॐ लाइकप्रदाय नमः।
ॐ फॉलोअरवर्धनाय नमः।
ॐ प्रायोजितमोक्षदाय नमः।
रीलं वेदः।
पोस्टः पुराणम्।
फॉलोअराः शिष्याः।
कमेंटाः पुष्पाञ्जलिः।
शेयरः महायज्ञः।
स्पॉन्सरशिप् परमपदम्।
तदा क्रुद्धः साधकः उवाच —
ओए बाबा जी!
त्वत्तः केन ज्ञानं याचितम्?
नाहं मोक्षार्थी।
नाहं फॉलोअरार्थी।
चायार्थमेव आगतः।
बाबा उवाच —
वत्स!
एषैव माया।
चायया आरभ्यते।
दानेन समाप्त्यते।
अथ बाबा-मुक्ति-मन्त्रः —
न बाबा शरणं गच्छामि।
न फोटो शरणं गच्छामि।
न रीलं शरणं गच्छामि।
न फॉलोअरान् शरणं गच्छामि।
विवेकं शरणं गच्छामि।
सत्यं शरणं गच्छामि।
स्वात्मानं शरणं गच्छामि॥
फलश्रुतिः
यः प्रातःकाले
एतत् बाबा-मुक्ति-स्तोत्रं पठति,
तस्य बुद्धिः
रील-मोहात् विमुच्यते।
तस्य चित्तम्
फोटो-प्रलोभनात् रक्ष्यते।
तस्य धनम्
सदस्यता-योजनाभ्यः सुरक्षितं भवति।
तस्य विवेकः
अक्षुण्णः तिष्ठति।
इति श्री
कलियुग-डिजिटल-बाबा-मुक्ति-स्तोत्रम्
सम्पूर्णम्।
॥ ॐ विवेकाय नमः ॥ ॥ ॐ सत्याय नमः ॥ ॥ ॐ स्वाध्यायाय नमः ॥
अशोक वाटिका से मुक्ति तक : सीता, हनुमान और राम की आंतरिक यात्रा
अशोक वाटिका से मुक्ति तक : सीता, हनुमान और राम की आंतरिक यात्रा
"अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥"
रामचरितमानस का यह प्रसंग केवल लंका में बंदी बनी सीता और उन्हें खोजने आए हनुमान का संवाद नहीं है। यह प्रत्येक साधक के भीतर घटने वाली आध्यात्मिक यात्रा का सूक्ष्म चित्रण भी है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने कथा के माध्यम से मनुष्य के आंतरिक संघर्षों, मोह-माया के बंधनों और अंततः आत्म-मुक्ति का मार्ग दिखाया है।
प्रश्न है कि यदि हनुमानजी इतने शक्तिशाली थे, तो उन्होंने सीता जी को उसी समय लंका से मुक्त क्यों नहीं करा दिया?
उत्तर केवल ऐतिहासिक नहीं, आध्यात्मिक भी है।
लंका : मोह और लोभ का साम्राज्य
लंका केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है।
यह उस मानसिक अवस्था का प्रतीक है जहाँ मनुष्य धन, वैभव, प्रतिष्ठा और भोगों के जाल में उलझ जाता है।
आज की भाषा में कहें तो लंका वह संसार है जहाँ—
- संबंध भी लाभ-हानि से मापे जाते हैं।
- सफलता का अर्थ केवल धन और पद बन जाता है।
- मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है।
रावण बाहरी शत्रु कम और भीतर का अहंकार अधिक है।
सीता : संसार में फँसी हुई बुद्धि
वेदांत की दृष्टि से सीता जी को शुद्ध बुद्धि का प्रतीक माना जा सकता है।
यह बुद्धि मूलतः राम अर्थात् सत्य के साथ रहना चाहती है, परंतु मोह, भय, लालच और अहंकार के कारण संसार में फँस जाती है।
सीता जी का दुःख केवल रावण की कैद नहीं है।
वह उस बुद्धि का दुःख है जो जानती है कि उसका वास्तविक घर कहीं और है, परंतु अभी वहाँ पहुँच नहीं पा रही।
यही साधक का शोक है।
अशोक वाटिका : सुख और स्थिरता का भ्रम
अशोक वाटिका का अर्थ है— जहाँ शोक न हो।
परंतु विडम्बना देखिए कि वहीं सीता सबसे अधिक शोकग्रस्त हैं।
यह संसार की सबसे बड़ी माया है।
मनुष्य सोचता है—
"अब नौकरी मिल गई, जीवन सुरक्षित है।"
"अब घर बन गया, जीवन स्थिर है।"
"अब बैंक बैलेंस पर्याप्त है, सब ठीक है।"
बाहर से सब कुछ व्यवस्थित दिखाई देता है।
परंतु भीतर बेचैनी बनी रहती है।
अशोक वाटिका वास्तव में उस भ्रम का प्रतीक है जहाँ हम स्थिरता और सुरक्षा खोजते हैं, जबकि जीवन स्वयं अनित्य है।
हनुमान : अहंकार से मुक्त चेतना
हनुमान केवल एक वीर योद्धा नहीं हैं।
वे उस चेतना के प्रतीक हैं जो लोभ, मोह, मान और प्रतिष्ठा की इच्छा से मुक्त हो चुकी है।
जिस व्यक्ति को न धन का अहंकार है, न विद्या का अहंकार, न पद का अहंकार— वही हनुमान भाव को स्पर्श कर सकता है।
हनुमान का सम्पूर्ण अस्तित्व सेवा में है।
उनका परिचय शक्ति से नहीं, भक्ति से है।
इसलिए वे अशोक वाटिका तक पहुँच पाते हैं।
जहाँ संसार नहीं पहुँच सकता, वहाँ भक्ति पहुँच जाती है।
"अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई"
यहाँ एक गहरा रहस्य छिपा है।
हनुमान चाहते तो सीता को तुरंत मुक्त करा सकते थे।
परंतु वे कहते हैं—
"प्रभु आयसु नहिं।"
अर्थात् आध्यात्मिक मुक्ति केवल व्यक्तिगत प्रयास से नहीं होती।
अहंकार छोड़ना आवश्यक है, परंतु अंतिम मुक्ति ईश्वर की कृपा से ही पूर्ण होती है।
साधना हमें तैयार करती है।
कृपा हमें पार ले जाती है।
राम : स्थितप्रज्ञ और जीवन्मुक्त का आदर्श
गीता में श्रीकृष्ण जिस स्थितप्रज्ञ का वर्णन करते हैं—
- सुख-दुःख में सम
- लाभ-हानि में सम
- जय-पराजय में सम
राम उसी आदर्श का साकार रूप हैं।
उपनिषद जिस जीवन्मुक्त की बात करते हैं, राम उसी चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं।
वे परिस्थितियों के दास नहीं हैं।
वे धर्म के अनुसार चलते हैं, चाहे परिणाम कुछ भी हो।
इसलिए राम केवल एक राजा नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप का प्रतीक हैं।
वानर सेना : साधु-संतों का समुदाय
वानर सेना को केवल बंदरों की सेना समझना कथा को सीमित कर देना होगा।
आध्यात्मिक दृष्टि से वानर सेना उन साधकों, संतों और भक्तों का प्रतीक है जिन्होंने जीवन का केन्द्र संसार नहीं, ईश्वर को बना लिया है।
वे पूर्ण नहीं हैं।
उनमें विविध स्वभाव हैं।
फिर भी उनकी दिशा एक है।
उनका लक्ष्य रामकाज है।
आज भी ऐसी वानर सेना संसार में मौजूद है—
- संतों के रूप में
- समाजसेवियों के रूप में
- निष्काम कर्मयोगियों के रूप में
- उन साधारण लोगों के रूप में जो बिना स्वार्थ दूसरों का कल्याण करते हैं
साधक के लिए संदेश
यह पूरा प्रसंग हमें बताता है कि जब बुद्धि संसार के मोह में फँस जाती है, तब पहले हनुमान आते हैं।
अर्थात् पहले विवेक, भक्ति और सेवा का भाव जागता है।
फिर धैर्य आता है।
फिर राम की कृपा आती है।
और अंततः वानर सेना अर्थात् सत्संग, साधना और सद्गुरुओं का सहयोग प्राप्त होता है।
मुक्ति एक झटके में नहीं होती।
यह भीतर चलने वाली क्रमिक प्रक्रिया है।
इसलिए हनुमान कहते हैं—
"कछुक दिवस जननी धरु धीरा।"
कुछ दिन धैर्य रखो।
यह वचन केवल सीता के लिए नहीं था।
यह हर उस साधक के लिए है जो संसार में रहते हुए भी सत्य की खोज कर रहा है।
जब भक्ति, विवेक और कृपा एक साथ आते हैं, तब लंका का साम्राज्य समाप्त हो जाता है और बुद्धि पुनः राम से मिल जाती है।
यही रामकथा का आध्यात्मिक रहस्य है।
रात और दिन दिया जले, मेरे मन में फिर भी अंधियारा है.
सुभाषितानि – अमर गीत
एक गीत में पूरी श्रीमद्भागवत कथा
"रात और दिन दिया जले, मेरे मन में फिर भी अंधियारा है..."
पुराने फिल्मी गीतों की यही विशेषता थी कि वे केवल प्रेम-विरह की कहानी नहीं कहते थे, बल्कि मानव जीवन की आध्यात्मिक यात्रा को भी स्पर्श कर जाते थे। यदि हम ध्यान से सुनें तो यह गीत वस्तुतः जीव की उस व्यथा को व्यक्त करता है जिसका वर्णन श्रीमद्भागवत, गीता और रामचरितमानस बार-बार करते हैं।
१. "रात और दिन दिया जले, मेरे मन में फिर भी अंधियारा है"
बाहर प्रकाश है, भीतर अंधकार है।
ज्ञान की पुस्तकें हैं, संतों के प्रवचन हैं, मंदिर हैं, आश्रम हैं, कथा-कीर्तन हैं। फिर भी मनुष्य दुखी, भ्रमित और अशांत है।
संत वाणी तो दीपक है। महापुरुषों का जीवन मशाल है, जो हमें मार्ग दिखाती है।
"सदियों यूँ ही जलती रहे गांधी तेरी मशाल,
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।"
गांधी का कमाल कोई जादू नहीं था। उन्होंने मनुष्य को यह दिखाया कि सत्य, त्याग और सेवा की शक्ति तलवार और ढाल से भी बड़ी होती है।
"दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल।"
यही बात तुलसीदास जी हनुमान जी के बारे में कहते हैं—
"राम काज लगि तव अवतारा।"
हनुमान जी का जन्म केवल अपने लिए नहीं हुआ। उनका सम्पूर्ण जीवन रामकाज के लिए समर्पित था।
फिर आगे—
"प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही,
जलधि लाँघि गए अचरज नाहीं।"
जब मुख में प्रभु की मुद्रिका हो, जब हृदय में ईश्वर का स्मरण हो, जब कर्म परोपकार के लिए हो, तब समुद्र भी बाधा नहीं बनता।
आज का मनुष्य भी भवसागर पार करना चाहता है।
परंतु प्रश्न यह है कि वह किसके लिए जी रहा है?
यदि जीवन केवल—
- धन कमाने के लिए,
- पद पाने के लिए,
- दूसरों से आगे निकलने के लिए,
व्यतीत हो रहा है, तो वह समुद्र में तैर नहीं रहा, बल्कि धीरे-धीरे डूब रहा है।
राम का स्मरण करते हुए, राम का कार्य करते हुए, परोपकार करते हुए भवसागर सहज ही पार हो जाता है।
स्वार्थ मनुष्य को डुबोता है।
सेवा उसे तैराती है।
२. "जाने कहाँ है वो साथी, तू जो मिले जीवन उजियारा है"
यह साथी कौन है?
संसार का कोई व्यक्ति?
कोई मित्र?
कोई जीवनसाथी?
भागवत कहती है— नहीं।
वह साथी स्वयं परमात्मा है।
जीव अनेक जन्मों से उसी को खोज रहा है, परंतु भूल से संसार में ढूँढ़ रहा है।
जब मनुष्य सोचता है—
"बस यह नौकरी मिल जाए।"
"बस इतना धन आ जाए।"
"बस यह पद मिल जाए।"
तब उसे लगता है कि उसके जीवन का अंधकार मिट जाएगा।
लेकिन एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी खड़ी हो जाती है।
अंधकार वहीं का वहीं रहता है।
कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जहाँ धर्म है, जहाँ लोककल्याण की भावना है, जहाँ निष्काम कर्म है, वहीं मैं हूँ।
जहाँ लोभ है, अहंकार है, संग्रह की लालसा है, केवल "मैं" और "मेरा" है, वहाँ ईश्वर दूर हो जाता है।
इसलिए जीवन का वास्तविक साथी कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि वह चेतना है जो धर्म, सेवा और प्रेम के रूप में हमारे भीतर प्रकट होती है।
यही कारण है कि गीता के अंत में संजय घोषणा करते हैं—
"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥"
जहाँ कृष्ण हैं और जहाँ धर्म के लिए कर्म करने वाला अर्जुन है, वहीं विजय है, वहीं प्रकाश है, वहीं कल्याण है।
निष्कर्ष
मनुष्य का दुःख अंधकार के कारण नहीं है।
दुःख इसलिए है कि वह दीपक को देखकर भी प्रकाश की ओर मुख नहीं करता।
संतों की वाणी दीपक है।
महापुरुषों का जीवन मशाल है।
रामकाज नाव है।
और ईश्वर का स्मरण पतवार है।
इन सबके रहते हुए भी यदि मन अंधकार में है, तो समस्या प्रकाश की नहीं, दिशा की है।
इसीलिए गीत का पहला वाक्य सम्पूर्ण भागवत का सार बन जाता है—
"रात और दिन दिया जले, मेरे मन में फिर भी अंधियारा है।"
जब तक दीपक बाहर जलता रहेगा और भीतर नहीं, तब तक अंधियारा बना रहेगा।
और जिस दिन भीतर का दीपक जल गया, उसी दिन जीवन का सारथी मिल जाएगा, और जीवन स्वयं उजियारा हो जाएगा।
Sunday, May 31, 2026
जै माँ आनंदमयी?
जै माँ आनंदमयी?
स्मरण, भक्ति और हमारी बेचैन आँखें
चित्र में एक साध्वी स्वरूप महिला दिखाई देती हैं।
नीचे लिखा है:
"Remember God, remember God, day after day, hour after hour, remember God."
पहली दृष्टि में यह एक साधारण आध्यात्मिक संदेश लगता है।
लेकिन मेरे मन में एक दूसरा प्रश्न उठता है।
क्या केवल भगवान को याद करना पर्याप्त है?
यदि कोई दिन-रात भगवान को याद करता रहे,
तो क्या उसका अहंकार समाप्त हो जाएगा?
क्या उसकी ईर्ष्या समाप्त हो जाएगी?
क्या उसका भय समाप्त हो जाएगा?
क्या उसका मोह समाप्त हो जाएगा?
यही वह प्रश्न है जिसे कबीर बार-बार उठाते हैं।
"क्या कहा, मोदी जी की वीडियो दिखाऊँ?"
आज का युग बड़ा विचित्र है।
पहले लोग संतों के पीछे भागते थे।
फिर नेताओं के पीछे।
फिर बाबाओं के पीछे।
फिर यूट्यूब चैनलों के पीछे।
अब हर कोई किसी न किसी वीडियो का भक्त है।
किसी का ईश्वर टीवी में है।
किसी का मोबाइल में।
किसी का नेता में।
किसी का बाबा में।
और कोई कहता है:
"आओ, मोदी जी की वीडियो दिखाऊँ।"
मेरा उत्तर है:
"मुझे क्या वो समझ रखा है?"
यदि आध्यात्म का अर्थ केवल किसी व्यक्ति की प्रशंसा सुनना है,
तो फिर आत्मदर्शन कहाँ हुआ?
पीछे बैठी बहनों को क्या परेशानी है?
यह प्रश्न व्यंग्यात्मक भी है और गंभीर भी।
अक्सर आध्यात्मिक सभाओं में लोग सामने गुरु को देख रहे होते हैं,
पर उनका मन कहीं और होता है।
कोई तुलना कर रहा है।
कोई मान-सम्मान खोज रहा है।
कोई मान्यता चाहता है।
कोई चमत्कार।
कोई समाधान।
कोई सांत्वना।
और कोई केवल भीड़ का हिस्सा है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं कि सामने कौन बैठा है।
प्रश्न यह है:
पीछे बैठा मन कहाँ बैठा है?
स्मरण और सम्मोहन में अंतर
भगवान का स्मरण एक बात है।
किसी व्यक्ति, संगठन, विचारधारा या नेता के सम्मोहन में पड़ जाना दूसरी बात।
स्मरण आपको भीतर ले जाता है।
सम्मोहन आपको किसी और के पीछे लगा देता है।
स्मरण स्वतंत्र बनाता है।
सम्मोहन अनुयायी बनाता है।
कबीर की कसौटी
कबीर शायद पूछते:
राम को याद किया या केवल राम का नाम?
सत्य को जिया या केवल उसका प्रचार किया?
भीतर उतरे या केवल किसी की तस्वीर देखी?
निष्कर्ष
साधना का उद्देश्य किसी चेहरे में खो जाना नहीं है।
न किसी नेता में।
न किसी बाबा में।
न किसी गुरु में।
साधना का उद्देश्य स्वयं को पहचानना है।
यदि दिन-रात भगवान को याद करने से:
- अहंकार कम हो,
- मोह कम हो,
- भय कम हो,
- और करुणा बढ़े,
तो स्मरण सार्थक है।
अन्यथा हम केवल चेहरे बदलते रहेंगे,
और मन की बेचैनी वही रहेगी।
जै माँ आनंदमयी।
और साथ ही—
जरा अपने मन को भी देखो,
वह किसकी वीडियो देखना चाहता है, और क्यों?
Saturday, May 30, 2026
प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगे?
प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगे?
(एक पापी, एक प्रेमी और अपने प्रभु के बीच संवाद)
Inspired by:
प्यार मुझसे जो किया तुमने, तो क्या पाओगे?
टूटा हुआ इक मन,
भटका हुआ जीवन,
और कर्मों के जंगल में
रास्ता खोजता एक मुसाफ़िर।
क्या देखते हो प्रभु?
सूरत मेरी?
इस पर तो समय की धूल जमी है।
बाल सफ़ेद हैं,
चेहरे पर यात्राओं के निशान हैं,
और आँखों में
कुछ अधूरे सपनों की राख।
या फिर देखते हो
सीरत मेरी?
उसे तो मैं स्वयं नहीं समझ पाया।
कभी राम का नाम लिया,
कभी संसार के पीछे भागा।
कभी प्रेम को पूजा समझ बैठा,
कभी मोह को प्रेम।
प्रभु,
सच-सच बताना...
मुझसे कभी पाप हो सकता है?
जब भी कुछ पाया,
उसमें मेरा अहंकार शामिल था।
जब भी कुछ खोया,
उसमें मेरी मूर्खता शामिल थी।
जब भी प्रेम किया,
उसमें स्वार्थ का थोड़ा रंग था।
जब भी त्याग किया,
उसमें प्रशंसा की थोड़ी चाह थी।
तो फिर यह कौन सा जीव है
जो स्वयं को सज्जन समझता फिरता है?
और कौन सा भगवान है
जो फिर भी उसे छोड़ता नहीं?
कभी-कभी लगता है,
तुम्हारी सबसे बड़ी लीला
क्षमा है।
वरना मेरे जैसे लोग
कब के हिसाब-किताब में फँस चुके होते।
मैंने मंदिर भी देखे।
मस्जिद भी देखी।
तीर्थ भी देखे।
राजनीति भी देखी।
ज्ञान भी देखा।
अज्ञान भी देखा।
लेकिन अंत में पाया कि
सबसे कठिन यात्रा
अपने भीतर उतरने की है।
इसलिए आज
तुमसे मोक्ष नहीं माँगता।
स्वर्ग नहीं माँगता।
सिद्धि नहीं माँगता।
बस इतना पूछता हूँ—
यदि मैं इतना ही अपूर्ण हूँ,
तो फिर
प्यार मुझसे जो किया तुमने, तो क्या पाओगे?
और कहीं भीतर से
धीरे-धीरे आवाज़ आती है—
"अरे मूर्ख,
मैं तेरे गुणों से प्रेम नहीं करता।
मैं तो तुझसे प्रेम करता हूँ।
तेरे पापों को जानकर भी,
तेरी मूर्खताओं को देखकर भी,
तेरी बार-बार की भूलों के बाद भी।
क्योंकि तू अभी पूरा नहीं हुआ,
इसलिए तो मेरा है।"
तब सिर झुक जाता है।
और मन कहता है—
**प्रभु,
सूरत भी तुम्हारी,
सीरत भी तुम्हारी।
पाप भी तुम्हारे सामने,
और क्षमा भी तुम्हारी।
अब जो हूँ,
जैसा हूँ,
तेरे हवाले।**
