धर्म, राजनीति और आध्यात्मिक क्लेश : इन्दिरा गांधी से जयप्रकाश नारायण, आनन्दमूर्ति, ISKCON और वैश्वीकरण तक—‘स्व’ की मेरी यात्रा
गुरु के प्रकाश से वैश्विक जीवन की उलझनों तक
लगभग तीस वर्षों की पेशेवर यात्रा ने वास्तव में मुझे क्या दिया?
1996 में अपनी Master's degree पूर्ण करने के बाद Indian Oil Corporation से आरम्भ हुई यह यात्रा केवल नौकरी और करियर की यात्रा नहीं रही।
यह उस पीढ़ी की यात्रा भी रही जो भारत में 1990 के दशक के आरम्भिक globalization की लहर के साथ बड़ी हुई।
मैं भी उसी लहर का एक हिस्सा बना।
लगभग एक दशक भारत में काम किया।
फिर लगभग एक दशक Middle East में।
और उसके बाद 2010–11 से जीवन की यात्रा ने नए रूप लिए।
पीछे मुड़कर देखने पर आज प्रश्न केवल इतना नहीं है कि—
कहाँ काम किया?
कितना आगे बढ़े?
कितना कमाया?
बल्कि शायद अधिक गहरा प्रश्न यह है—
इस पूरी यात्रा में चेतना कहाँ थी?
मनुष्य वैश्विक हो गया।
उसका करियर अनेक देशों में फैल गया।
उसकी आर्थिक आकांक्षाएँ बढ़ गईं।
उसकी पहचान अनेक संस्थाओं और व्यवस्थाओं से जुड़ गई।
लेकिन क्या उसका भीतर भी उतना ही विकसित हुआ?
यहीं से मेरे लिए आध्यात्मिक क्लेश का प्रश्न प्रारम्भ होता है।
गुरु पूर्णिमा और गायत्री : प्रकाश केवल ज्ञान नहीं, चेतना की दिशा है
गुरु पूर्णिमा पर गुरु के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना केवल किसी परम्परा का पालन नहीं है।
मेरे लिए गुरु का अर्थ धीरे-धीरे उस शक्ति से जुड़ने लगा है जो चेतना को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए।
गायत्री मंत्र का केंद्रीय भाव भी मेरे लिए केवल उच्चारण का विषय नहीं है।
वह एक प्रार्थना है—
हमारी बुद्धि प्रकाशित हो।
हमारी चेतना सही दिशा की ओर प्रेरित हो।
हमारे भीतर वह प्रकाश आए जो केवल सूचना नहीं, विवेक दे।
आज की दुनिया में सूचना बहुत है।
ज्ञान भी बहुत है।
तकनीक बहुत है।
लेकिन क्या विवेक उसी अनुपात में बढ़ा है?
यहीं आधुनिक मनुष्य का एक बड़ा संकट है।
हमारे पास पहले से अधिक information है।
लेकिन शायद पहले से अधिक inner noise भी है।
हम पहले से अधिक connected हैं।
लेकिन अपने भीतर से अधिक disconnected भी हो सकते हैं।
हम वैश्विक नागरिक हैं।
लेकिन क्या हम अपनी चेतना के नागरिक भी हैं?
Globalization : बाहर का विस्तार और भीतर का विस्थापन
1990 के दशक के बाद globalization ने भारत सहित विश्व के जीवन को बदल दिया।
करियर अब एक शहर तक सीमित नहीं रहा।
देश बदलने लगे।
संस्थाएँ बदलने लगीं।
पहचान बदलने लगी।
भारत से Middle East और फिर आगे की वैश्विक पेशेवर दुनिया—मेरे अपने अनुभव में भी जीवन लगातार बदलती परिस्थितियों के बीच चलता रहा।
लेकिन globalization के साथ एक दूसरा प्रश्न भी आया—
यदि मनुष्य हर जगह जा सकता है, तो वह भीतर कहाँ स्थिर होगा?
यदि काम बदलता रहे—
तो मेरी पहचान क्या है?
यदि देश बदल जाए—
तो मेरा केंद्र कहाँ है?
यदि करियर रुक जाए—
तो मैं कौन हूँ?
यदि आर्थिक स्थिति बदल जाए—
तो क्या मेरा मूल्य भी बदल जाएगा?
यदि संगठन बदल जाए—
तो क्या मेरा जीवन भी बदल जाएगा?
यहीं बाहरी globalization और भीतर की खोज एक-दूसरे के सामने खड़े हो जाते हैं।
बाहर की दुनिया कहती है—
Move faster.
Compete harder.
Earn more.
Grow continuously.
लेकिन भीतर का प्रश्न पूछता है—
Grow into what?
और शायद यही प्रश्न आध्यात्मिक यात्रा का आरम्भ है।
आध्यात्मिक क्लेश क्या है?
मेरी वर्तमान समझ में आध्यात्मिक क्लेश केवल दुःख या धार्मिक संकट नहीं है।
यह वह स्थिति भी हो सकती है जब मनुष्य का बाहरी जीवन चलता रहता है—
लेकिन भीतर उसकी चेतना अपने मूल केंद्र से कटने लगती है।
जब—
कर्म है, लेकिन उसका अर्थ नहीं है।
सफलता है, लेकिन संतोष नहीं है।
धर्म है, लेकिन आत्मबोध नहीं है।
संगठन है, लेकिन संग नहीं है।
जानकारी है, लेकिन विवेक नहीं है।
राजनीति है, लेकिन नैतिक दिशा नहीं है।
आध्यात्मिक भाषा है, लेकिन भीतर प्रकाश नहीं है।
तब शायद मनुष्य जिस क्लेश का अनुभव करता है, उसे केवल आर्थिक या मानसिक समस्या कहकर समझना पर्याप्त नहीं है।
वह आध्यात्मिक विस्थापन भी हो सकता है।
विष्णु की सत्ता : परिवर्तन के बीच वह क्या है जो धारण करता है?
जीवन का एक गहरा अनुभव यह है कि सब कुछ बदलता रहता है।
नौकरी बदलती है।
देश बदलते हैं।
राजनीतिक व्यवस्थाएँ बदलती हैं।
विचारधाराएँ बदलती हैं।
संगठन बनते और टूटते हैं।
व्यक्ति आते और चले जाते हैं।
लेकिन इस निरंतर परिवर्तन के बीच मनुष्य एक ऐसे आधार की खोज करता है जो केवल परिवर्तनशील न हो।
मेरे वीडियो के शीर्षक—
“Universal Consciousness — Vishnu ki Satta Sustains”
—में मेरे लिए यही केंद्रीय प्रश्न निहित है।
विष्णु की सत्ता को मैं केवल एक बाहरी धार्मिक प्रतीक के रूप में नहीं देखना चाहता।
बल्कि उस धारण करने वाली सत्ता के प्रतीक के रूप में भी देखता हूँ जिसके बिना यह निरंतर परिवर्तन अर्थहीन अराजकता बन सकता है।
यदि ब्रह्मांड में केवल परिवर्तन हो और कोई sustaining principle न हो—
तो व्यवस्था कहाँ से आएगी?
यदि मनुष्य के जीवन में केवल ambition हो और कोई आंतरिक आधार न हो—
तो स्थिरता कहाँ से आएगी?
शायद यही कारण है कि भारतीय चेतना ने सृष्टि को केवल बनाने और नष्ट करने की प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा।
उसने धारण करने वाली सत्ता की भी कल्पना की।
मेरे लिए यह प्रश्न व्यक्तिगत है—
मेरे जीवन को वास्तव में क्या sustain कर रहा है?
पैसा?
करियर?
प्रतिष्ठा?
संगठन?
राजनीतिक पहचान?
या कोई गहरी चेतना?
इन्दिरा गांधी और सत्ता का आध्यात्मिक प्रश्न
इन्दिरा गांधी का युग भारतीय इतिहास में केवल राजनीतिक शक्ति का अध्याय नहीं है।
वह यह प्रश्न भी उठाता है—
जब मनुष्य परिवर्तन के लिए सत्ता प्राप्त करता है, तब सत्ता स्वयं मनुष्य की चेतना को कितना बदल देती है?
राजनीतिक सत्ता के पास व्यवस्था बदलने की क्षमता होती है।
लेकिन सत्ता के पास मनुष्य को बदलने की क्षमता नहीं होती।
कई बार सत्ता स्वयं मनुष्य के भीतर भय, असुरक्षा और नियंत्रण की इच्छा को बढ़ा सकती है।
यहीं राजनीति और अध्यात्म का एक गहरा तनाव दिखाई देता है।
राजनीति पूछती है—
मेरे पास कितनी शक्ति है?
आध्यात्मिकता पूछती है—
मेरे ऊपर मेरी अपनी शक्ति कितनी है?
राजनीति दूसरे को नियंत्रित करना चाहती है।
साधना स्वयं को समझना चाहती है।
जब तक दोनों में संतुलन न हो—
बाहरी शक्ति बढ़ सकती है, लेकिन आंतरिक स्वतंत्रता कम हो सकती है।
जयप्रकाश नारायण और सम्पूर्ण क्रांति का अधूरा प्रश्न
जयप्रकाश नारायण ने सत्ता परिवर्तन से आगे बढ़कर सम्पूर्ण क्रांति की बात की।
लेकिन सम्पूर्ण क्रांति का सबसे कठिन प्रश्न आज भी वही है—
क्या समाज को बदले बिना व्यक्ति बदल सकता है?
और—
क्या व्यक्ति को बदले बिना समाज बदल सकता है?
राजनीतिक क्रांति सत्ता बदल सकती है।
कानून बदल सकती है।
संस्थाएँ बदल सकती है।
लेकिन यदि व्यक्ति की चेतना वही बनी रहे—
तो क्या नई संस्थाएँ धीरे-धीरे पुराने दोषों को पुनः उत्पन्न नहीं करेंगी?
इसीलिए सम्पूर्ण क्रांति का प्रश्न अंततः चेतना के प्रश्न तक पहुँचता है।
मेरे लिए भी यही प्रश्न महत्वपूर्ण है—
क्या केवल SSG जैसा संगठन बना देने से कुछ बदल जाएगा?
नहीं।
यदि संगठन बनाने वाले और उसमें जुड़ने वाले व्यक्तियों की चेतना में कोई परिवर्तन नहीं हुआ, तो संगठन भी अंततः उसी प्रकार की मानवीय प्रवृत्तियों का शिकार हो सकता है—
अहंकार।
प्रतिष्ठा।
नियंत्रण।
प्रतिस्पर्धा।
और सत्ता।
आनन्दमूर्ति : आध्यात्मिक साधना और सामाजिक परिवर्तन के बीच
श्री श्री आनन्दमूर्ति की विचारधारा मेरे लिए इसलिए महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है क्योंकि उसमें व्यक्तिगत साधना और सामाजिक व्यवस्था को अलग-अलग compartments में नहीं रखा गया।
यह दृष्टि पूछती है—
क्या आध्यात्मिक चेतना को सामाजिक अन्याय से उदासीन रहना चाहिए?
लेकिन इसका उल्टा प्रश्न भी उतना ही आवश्यक है—
क्या सामाजिक परिवर्तन के संघर्ष में आध्यात्मिक चेतना को खो देना उचित है?
यहीं आध्यात्मिक क्लेश की संभावना सबसे अधिक है।
मनुष्य न्याय के लिए संघर्ष करता है।
लेकिन धीरे-धीरे संघर्ष उसका नया अहंकार बन सकता है।
मनुष्य संगठन बनाता है।
लेकिन संगठन उसकी नई पहचान बन सकता है।
मनुष्य समाज को मुक्त करना चाहता है।
लेकिन स्वयं विचारधारा का बंदी बन सकता है।
इसलिए आध्यात्मिकता और सामाजिक परिवर्तन का मिलन सरल नहीं है।
वह निरंतर आत्मनिरीक्षण मांगता है।
ISKCON : वैश्विक संगठन और व्यक्तिगत साधना
Globalization ने केवल corporations को वैश्विक नहीं बनाया।
धार्मिक और आध्यात्मिक संगठनों को भी वैश्विक बनाया।
ISKCON इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
भक्ति, संगीत, कीर्तन और अनुशासन के माध्यम से एक वैश्विक आध्यात्मिक समुदाय का निर्माण।
यह मेरे लिए विशेष रूप से रोचक है क्योंकि यहाँ मेरे अपने दो प्रश्न मिलते हैं—
संगीत
और
संगठन।
संगीत व्यक्ति को भीतर से जोड़ सकता है।
संगठन व्यक्तियों को एक-दूसरे से जोड़ सकता है।
लेकिन इनके बीच भी खतरा है।
यदि संगीत केवल performance बन जाए—
तो उसका आंतरिक स्वर खो सकता है।
यदि संगठन केवल institution बन जाए—
तो उसका जीवित संग खो सकता है।
इसलिए मेरे लिए SSG का प्रश्न भी केवल यह नहीं है कि—
कितने कार्यक्रम होंगे?
कितने सदस्य होंगे?
कितनी बड़ी संस्था बनेगी?
बल्कि—
क्या यह लोगों को उनके भीतर के स्वर से जोड़ पाएगा?
गांधी, विनोबा और नैतिक चेतना का प्रश्न
गांधी ने राजनीति में नैतिकता को प्रवेश दिया।
विनोबा ने सामाजिक परिवर्तन में व्यक्तिगत परिवर्तन और स्वैच्छिक चेतना का प्रश्न उठाया।
उनकी परम्परा हमें याद दिलाती है कि समाज केवल कानून से संचालित नहीं होता।
उसका वास्तविक आधार मनुष्य की चेतना है।
लेकिन इतिहास ने यह भी दिखाया कि केवल नैतिक अपील से हर सामाजिक समस्या हल नहीं होती।
इसलिए भारत की आधुनिक यात्रा लगातार दो प्रश्नों के बीच चलती रही है—
व्यवस्था बदलो।
और
मनुष्य बदलो।
मेरी समझ में दोनों में से किसी एक को चुनना पर्याप्त नहीं है।
धर्म की राजनीति और आध्यात्मिक क्लेश
आज धर्म और राजनीति का संबंध फिर अत्यंत तीव्र हो गया है।
लेकिन मेरा प्रश्न किसी राजनीतिक दल या विचारधारा का समर्थन या विरोध नहीं है।
मेरा प्रश्न अधिक व्यक्तिगत है—
धर्म की राजनीति मेरे भीतर क्या कर रही है?
क्या वह मुझे अपने धर्म को समझने के लिए प्रेरित कर रही है?
या केवल दूसरे के विरुद्ध प्रतिक्रिया करने के लिए?
क्या वह मुझे अधिक सत्यनिष्ठ बना रही है?
या केवल अधिक आक्रामक?
क्या वह मेरे भीतर करुणा और विवेक बढ़ा रही है?
या भय और शत्रुता?
यदि धर्म मेरी चेतना को प्रकाशित नहीं कर रहा—
तो वह धर्म की भाषा हो सकता है, धर्म का अनुभव नहीं।
यहीं गायत्री का प्रश्न फिर लौट आता है—
धियो यो नः प्रचोदयात्।
हमारी बुद्धि प्रेरित हो।
प्रकाशित हो।
केवल उत्तेजित नहीं।
स्वभाव : जब भीतर का स्वर वापस बुलाता है
2016 के बाद मेरी अपनी यात्रा में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ।
स्वाध्याय, चिंतन और मनन के साथ मैंने धीरे-धीरे स्वभाव को समझने का प्रयास किया।
स्व + भाव = स्वभाव
और शायद इसी खोज ने मुझे संगीत की ओर वापस बुलाया।
संगीत मेरे लिए केवल एक hobby नहीं रहा।
वह धीरे-धीरे मेरे भीतर की चेतना का एक स्वाभाविक माध्यम बन गया।
Globalized professional life में मनुष्य की पहचान कई बार उसके designation और organization से बनती है।
लेकिन संगीत ने मुझे एक अलग प्रश्न दिया—
Designation हट जाए तो तुम्हारे भीतर कौन-सा स्वर बचता है?
स्वकर्म : संगीत से समाज तक
लेकिन स्वभाव केवल व्यक्तिगत आनंद तक सीमित नहीं रह सकता।
अगला प्रश्न है—
स्व + कर्म = स्वकर्म
मेरे लिए संगीत ने स्वभाव का द्वार खोला।
लेकिन SSG की दिशा में विचार ने स्वकर्म का प्रश्न उठाया।
क्या संगीत, स्वाध्याय और साधना को केवल व्यक्तिगत अनुभव तक सीमित रखा जाए?
या उन्हें संग और समाज तक ले जाया जाए?
यहीं से SSG की संभावित यात्रा सामने आती है—
स्व से स्वर।
स्वर से संग।
संग से साधना।
साधना से स्वकर्म।
और स्वकर्म से समाज।
लेकिन यह यात्रा तभी स्वस्थ होगी जब—
संग, स्व को न निगल जाए।
स्थितप्रज्ञता : Globalization और राजनीति दोनों के बीच आंतरिक केंद्र
आज का मनुष्य दो बड़ी शक्तियों के बीच जी रहा है।
एक ओर—
आर्थिक globalization।
दूसरी ओर—
राजनीतिक और धार्मिक polarization।
एक हमें लगातार अधिक सफल बनने के लिए प्रेरित करती है।
दूसरी हमें लगातार किसी पक्ष में खड़ा होने के लिए।
दोनों के बीच स्थितप्रज्ञता का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।
स्थितप्रज्ञता मेरे लिए संसार छोड़ देना नहीं है।
मैंने धन का त्याग नहीं किया है।
करियर का त्याग नहीं किया है।
व्यवसाय की सम्भावना को भी अस्वीकार नहीं किया है।
राजनीति और समाज के प्रश्नों से भी उदासीन होना समाधान नहीं है।
लेकिन—
इनमें से कोई भी मेरी चेतना का अंतिम स्वामी नहीं होना चाहिए।
यही शायद मेरे लिए स्थितप्रज्ञता की साधना है।
आध्यात्मिक क्लेश का समाधान : भागना नहीं, पुनः जुड़ना
आध्यात्मिक क्लेश से बचने का समाधान संसार से भागना नहीं है।
क्योंकि संसार से भागने पर भी मनुष्य अपने भीतर से नहीं भाग सकता।
समाधान शायद यह है कि मनुष्य पुनः जुड़ना सीखे—
अपने गुरु-प्रकाश से।
अपने विवेक से।
अपने स्वभाव से।
अपने स्वकर्म से।
अपने संगीत से।
अपने संग से।
और उस sustaining consciousness से जो परिवर्तन के बीच भी जीवन को धारण करती है।
मेरे लिए यही विष्णु की सत्ता का व्यक्तिगत अर्थ है।
SSG के लिए सबसे बड़ी चुनौती
यदि SSG को आगे बढ़ना है, तो उसकी सबसे बड़ी चुनौती केवल infrastructure, funding, membership या programs नहीं होगी।
सबसे बड़ी चुनौती होगी—
क्या हम अपने मूल स्वर को बचा पाएँगे?
क्या संगीत साधना रहेगा?
क्या धर्म आत्मबोध रहेगा?
क्या संगठन सेवा रहेगा?
क्या नेतृत्व उत्तरदायित्व रहेगा?
क्या विचार संवाद रहेगा?
क्या सफलता के साथ विनम्रता बनी रहेगी?
और—
क्या हम संसार में सक्रिय रहते हुए अपनी चेतना को संसार के शोर में खोने से बचा पाएँगे?
अंतिम प्रश्न : तीस वर्ष बाद मैं क्या देखता हूँ?
1996 से शुरू हुई लगभग तीस वर्षों की पेशेवर यात्रा को आज पीछे मुड़कर देखने पर मेरे सामने केवल उपलब्धियों और असफलताओं की सूची नहीं आती।
मुझे एक लंबी यात्रा दिखाई देती है—
भारत से विश्व तक।
करियर से कर्म तक।
सफलता के प्रश्न से अर्थ के प्रश्न तक।
धर्म की पहचान से धर्म की चेतना तक।
बाहरी संगठन से भीतर के संग तक।
और अंततः—
‘मैं क्या कर रहा हूँ?’ से ‘मैं कौन हूँ?’ तक।
शायद यही मेरी गीता-यात्रा का भी केंद्रीय प्रश्न है।
और शायद आध्यात्मिक क्लेश तब उत्पन्न होता है जब इन दोनों प्रश्नों का संबंध टूट जाता है।
जब—
मैं बहुत कुछ कर रहा हूँ, लेकिन स्वयं को भूल गया हूँ।
मैं धर्म की बात कर रहा हूँ, लेकिन भीतर प्रकाश नहीं है।
मैं संगठन बना रहा हूँ, लेकिन संग खो रहा हूँ।
मैं संसार बदलना चाहता हूँ, लेकिन स्वयं को देखने का समय नहीं है।
मैं सफलता पा रहा हूँ, लेकिन अपने स्वभाव से दूर जा रहा हूँ।
इसलिए आज मेरी यात्रा का सूत्र शायद यही है—
संसार में रहो, लेकिन संसार को अपने भीतर का स्वामी मत बनने दो।
कर्म करो, लेकिन कर्म में स्वयं को मत खो दो।
संग बनाओ, लेकिन स्व को मत खो दो।
धर्म को मानो, लेकिन विवेक को मत छोड़ो।
राजनीति को समझो, लेकिन चेतना को राजनीति का बंदी मत बनने दो।
और—
परिवर्तनशील संसार के बीच उस sustaining consciousness को खोजते रहो जो तुम्हें भीतर से धारण कर सके।
शायद यही ‘विष्णु की सत्ता’ है।
शायद यही गुरु का प्रकाश है।
और शायद यही आध्यात्मिक क्लेश से मुक्ति की दिशा है।
— SSG
स्वाध्याय • गुरु-प्रकाश • संगीत • साधना • स्वभाव • स्वकर्म • स्थितप्रज्ञता • संग • समाज
ॐ भूर्भुवः स्वः।
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥
