Thursday, June 25, 2026

ओशो, चार फ़ारसी ग्रन्थ, ज़िहाल-ए-मिस्कीं — और वह प्रश्न जो हर धर्म से बड़ा है: ईश्वर के क़रीब कौन है — आस्तिक या नास्तिक?

 

सूफ़ियाना · Sufiana · ओशो प्रवचन सार
🪔

मस्त फ़कीर का रास्ता

ओशो, चार फ़ारसी ग्रन्थ, ज़िहाल-ए-मिस्कीं — और वह प्रश्न जो हर धर्म से बड़ा है:
ईश्वर के क़रीब कौन है — आस्तिक या नास्तिक?

 https://youtu.be/FWEhqST0Dyk?si=dOJyoVC32JJvctlI 

एक बार किसी ने ओशो से पूछा — "भगवान, कौन सा धर्म सच्चा है?"

ओशो ने कहा — "जो धर्म तुम्हें भीतर ले जाए, वही सच्चा है। जो बाहर रोके, वो धर्म नहीं — दुकान है।"

इस एक उत्तर में ओशो का पूरा दर्शन है। और इसी दर्शन को उन्होंने फ़ारसी के चार अमर ग्रन्थों में, ख़ुसरो की ग़ज़ल में, कबीर के दोहों में, बुल्लेशाह की काफ़ियों में — बार-बार खोजा और पाया।

आज हम इन सभी को एक साथ पढ़ेंगे — और अंत में उस प्रश्न का उत्तर ढूँढेंगे जो सदियों से अनुत्तरित है:

ईश्वर के अधिक क़रीब कौन है —
वो जिसके पास विश्वास की व्यवस्था है, या वो जिसके पास कोई व्यवस्था नहीं?

I. ज़िहाल-ए-मिस्कीं — अमीर ख़ुसरो

रेख़्ता की आत्मा — दो भाषाओं में एक विरह

अमीर ख़ुसरो (1253–1325) वो पहले कवि हैं जिन्होंने फ़ारसी और हिन्दवी को एक ही शेर में पिरोया — और इस तरह रेख़्ता की नींव रखी। उनकी यह ग़ज़ल सूफ़ी विरह का शिखर है — प्रेमी का प्रिय से निवेदन, और साथ ही जीव का परमात्मा से पुकार। 

https://youtu.be/FKojb_16X5Q?si=fUCJn9FaxfapyJW_

मतला — पहला शेर

ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल, दुराए नैनाँ बनाए बतियाँ

कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम, ऐ जाँ — न लेहू काहे लगाए छतियाँ

शब्दार्थ:
ज़े-हाल = हाल से, दशा देखकर  |  मिस्कीं = बेचारा, लाचार (दिल)  |  मकुन = मत करो  |  तग़ाफ़ुल = उपेक्षा  |  दुराए नैनाँ = आँखें फेरकर  |  बनाए बतियाँ = बहाने बनाते हुए  |  ताब-ए-हिज्राँ = विरह की तपन  |  नदारम = मुझमें नहीं (फ़ारसी)

भावार्थ: इस बेचारे दिल की दशा देखो — आँखें फेरकर और बहाने बनाकर मुझे अनदेखा मत करो। ऐ प्रिय! विरह की तपन सहने की शक्ति मुझमें नहीं बची — फिर मुझे सीने से क्यों नहीं लगाते?
दूसरा शेर

शबाँ-ए-हिज्राँ दराज़ चूँ ज़ुल्फ़, व रोज़-ए-वस्लत चूँ उम्र-ए-कोताह

सखी पिया को जो मैं न देखूँ — तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ

भावार्थ: विरह की रातें उसकी ज़ुल्फ़ों जैसी लम्बी हैं — और मिलन का दिन छोटी उम्र-सा क्षणभंगुर। हे सखी! जब प्रिय को देख ही न सकूँ, तो ये अँधेरी रातें कैसे काटूँ?
तीसरा शेर

यकायक अज़ दिल दो चश्म-ए-जादू, ब-सद-फ़रेबम बा-बुर्द तस्कीं

किसे पड़ी है जो जा सुनावे — पियारे पी को हमारी बतियाँ

भावार्थ: अचानक उन दो जादुई आँखों ने सौ छलों से मेरे दिल का सुकून छीन लिया। अब किसे फ़ुर्सत है जो मेरे प्रिय को मेरी व्यथा सुनाए?
चौथा शेर

चूँ शम्अ-ए-सोज़ाँ, चूँ ज़र्रा-ए-हैराँ, ज़े-मेहर-ए-आँ-माह बगश्तम आख़िर

न नींद नैनाँ, न अँग चैनाँ — न आप आवे, न भेजे पतियाँ

भावार्थ: उस चाँद-से प्रिय के प्रेम में मैं — जलती मोमबत्ती और हैरान धूलकण जैसा — हो गया हूँ। न आँखों में नींद, न तन को चैन — न वो आता है, न पाती भेजता है।
मक़्ता — ख़ुसरो का तख़ल्लुस

ब-हक़्क़-ए-रोज़-ए-विसाल-ए-दिलबर, कि दाद मारा ग़रीब ख़ुसरो

सपीत मन के वराए राखूँ — जो जा के पाऊँ पिया की खतियाँ

भावार्थ: प्रिय से मिलन के दिन की क़सम — इस बेचारे ख़ुसरो को न्याय दो। यदि मैं प्रिय के पास पहुँच जाऊँ, तो अपना पीला वस्त्र उसकी चारपाई के पास रख दूँगा — तन-मन सब न्योछावर।

ओशो कहते थे — ख़ुसरो की यह ग़ज़ल इसलिए अमर है क्योंकि इसमें दो भाषाएँ, दो संस्कृतियाँ और दो प्रेम — मानवीय और दिव्य — एक ही साँस में बोलते हैं। जब मिस्कीं दिल की पुकार उठती है, तो वो किसी एक भाषा की नहीं रहती।

❧ ॐ ❧

II. मसनवी — जलालुद्दीन रूमी

सूफ़ियों के सम्राट — प्रेम की छः पुस्तकें

ओशो कहते थे — "रूमी को मैं बहुत प्रेम करता हूँ। कारण? वो जीवन-नकारात्मक नहीं, जीवन-उत्सवधर्मी थे।" मसनवी (13वीं शताब्दी) छः पुस्तकों में 25,000 से अधिक पदों का संग्रह है — सूफ़ी दर्शन का महाकाव्य।

"Mevlana Rumi is the emperor of the Sufi world. His words have to be understood not as mere words, but as sources of deep silences — echoes of inner space. Rumi is a very rare flower: as great a poet as he is a mystic. His poetry is not entertainment — it is enlightenment."— ओशो, Osho Online Library

मसनवी का केन्द्रीय रूपक — नय (बाँसुरी) का विलाप: मसनवी की पहली पंक्तियाँ हैं —

بشنو این نی چون شکایت می‌کند

از جدایی‌ها حکایت می‌کند

सुनो इस बाँसुरी को, कैसे शिकायत करती है —
यह जुदाइयों की कहानी सुनाती है।


भावार्थ: बाँसुरी नरकट के जंगल से काटी गई है। वो रोती है — अपने मूल से बिछड़ने का दर्द। ओशो ने कहा — यह बाँसुरी हम सभी हैं। हम परमात्मा से कटे हुए हैं और हमारी हर पुकार, हर संगीत, हर प्रेम — उसी जुदाई का विलाप है।

रूमी के चार प्रमुख संदेश जो ओशो ने बार-बार उद्धृत किए:

"Come, come, yet again come! Come even if you have broken your vow a thousand times — ours is not a caravan of despair."— रूमी (ओशो द्वारा प्रिय उद्धरण)

१. प्रेम ही एकमात्र मार्ग है — बुद्धि नहीं, तर्क नहीं, शास्त्र नहीं।
२. घूमना ही ध्यान है — रूमी के शिष्य सेमा (whirling) करते हैं। ओशो ने इसे अपने ध्यान-प्रयोगों में शामिल किया। बच्चे घूमते हैं — वे जानते हैं कि घूमने से अहंकार गिर जाता है।
३. बाहर ठंडी रात है, भीतर जलती लौ — बाहरी दुनिया में मत खोजो। असली घर भीतर है।
४. मास्टर का रूपक — रूमी के लिए शम्स-ए-तबरेज़ वो द्वार थे जिसके भीतर से परमात्मा दिखा। ओशो ने कहा — गुरु अनिवार्य नहीं, पर जब मिले तो पूरी तरह मिटो।

❧ ॐ ❧

III. रुबाइयात — उमर ख़य्याम

शराब, साक़ी और ईश्वर — सबसे ग़लत समझा गया सूफ़ी

उमर ख़य्याम (1048–1131) — गणितज्ञ, खगोलशास्त्री, और सूफ़ी — उनकी रुबाइयात को एडवर्ड फिट्ज़गेराल्ड ने अंग्रेज़ी में अनूदित किया और पूरी दुनिया ने उन्हें शराबी समझ लिया। ओशो ने इसे "इतिहास का सबसे बड़ा अनुवाद-भ्रम" कहा।

"Omar Khayyam was a Sufi fakir, a Sufi saint. When he speaks of wine he is speaking of the wine about which Kabir speaks. The wineshop is the temple. The lover is the master, the guru. And the wine is none other than the wine of God. Fitzgerald made a great mistake — to understand an enlightened person, you must be enlightened yourself."— ओशो, The Great Secret

सूफ़ी शब्दकोश — ख़य्याम की भाषा:

ख़य्याम का शब्दशाब्दिक अर्थसूफ़ी/ओशो अर्थ
शराब (Wine)मदिरापरमात्मा की मस्ती, दिव्य नशा
साक़ी (Saki)मदिरा परोसने वाली सुन्दरीपरमात्मा — जो अनुग्रह की प्याली भरे
मैख़ाना (Tavern)शराबख़ानामंदिर, गुरु का दरबार
महबूबा (Beloved)प्रियापरमात्मा की स्त्री-छवि
मस्ती (Intoxication)नशासमाधि, अहंकार का विसर्जन
ख़य्याम की प्रसिद्ध रुबाई (ओशो का प्रिय उद्धरण)

"मैं पियूँगा, नाचूँगा, प्रेम करूँगा —
हर तरह का पाप करूँगा, क्योंकि मुझे भरोसा है:
ईश्वर करुणामय है, वो क्षमा करेगा।
मेरे पाप बहुत छोटे हैं — उसकी क्षमा अपार है।"

ओशो: "ख़य्याम का अर्थ यह नहीं कि पाप करते रहो। उनका अर्थ है — अपराध-बोध मत रखो। जो हो गया, हो गया। परमात्मा न्यायाधीश नहीं — वो माँ है। और माँ कभी नहीं पूछती कि तूने क्या किया।"

ओशो ने ख़य्याम में क्या देखा? एक ऐसा संत जो पुरोहित-वर्ग से नहीं डरा। जिसकी पुस्तक जलाई गई — क्योंकि उसने कहा, अगर इंसान जीवन में आनंद लेने लगे, तो पंडित-मुल्ला-पुरोहित का क्या होगा? ओशो के शब्दों में — "ख़य्याम मेरे सबसे प्रिय विद्रोही संतों में से एक हैं।"

❧ ॐ ❧

IV. दीवान-ए-हाफ़िज़ — हाफ़िज़ शीराज़ी

The Divine Melody — जब परमात्मा गाता है

हाफ़िज़ शीराज़ी (1315–1390) को ओशो ने "The Divine Melody" — दिव्य सुर — कहा। ओशो की प्रसिद्ध प्रवचन-श्रृंखला *The Divine Melody* का शीर्षक कबीर और हाफ़िज़ दोनों को समर्पित है। हाफ़िज़ का दीवान (काव्य-संग्रह) आज भी ईरान में फ़ाल (भविष्य देखने) के लिए खोला जाता है।

"Hafiz is perhaps the most beautiful flowering of the Sufi tradition. He sings of love, wine, and the Beloved — but every word is drenched in God. He is drunk — not with wine but with the divine. His poetry is not of the head, it is of the heart on fire."— ओशो, प्रवचन-संग्रह
हाफ़िज़ का प्रसिद्ध शेर (ओशो द्वारा उद्धृत)

حافظ اگر قدم زنی در ره خاندان به صدق
بدرقهٔ رهت شود همت شحنهٔ نجف

हाफ़िज़, यदि तुम सच्चे प्रेम के पथ पर क़दम रखो —
तो स्वयं परमात्मा तुम्हारा पथ-प्रदर्शक बन जाएगा।


ओशो: "हाफ़िज़ का यही सार है। प्रेम में पड़ो — और फिर कोई नक़्शे की ज़रूरत नहीं। प्रेम स्वयं रास्ता दिखाता है।"

हाफ़िज़ के तीन स्तम्भ जो ओशो ने रेखांकित किए:
१. इश्क़ (प्रेम) — हर शेर में इश्क़ है, हर इश्क़ में परमात्मा है।
२. मस्ती (Divine Intoxication) — जो होश में है वो ईश्वर से दूर है; जो बेख़ुद है वो पास।
३. रिन्द (The Libertine Saint) — हाफ़िज़ अपने को रिन्द कहते हैं — वो जो मस्जिद और मंदिर दोनों से परे है, पर दोनों के भीतर भी है।

❧ ॐ ❧

V. गुलिस्तान — शेख़ सादी

गुलों का बाग़ — नीति, करुणा और मानवता

शेख़ सादी (1210–1291) का गुलिस्तान (1258) — "गुलों का बाग़" — फ़ारसी साहित्य की वो कृति है जो सबसे पहले यूरोप में पढ़ी गई। यह उपदेश-कथाओं, नीतिवचनों और कविताओं का अद्भुत सम्मिश्रण है।

"Sadi is the wisest of all Sufi poets. He does not speak in codes like Rumi or Hafiz. He speaks plainly, like a grandfather telling stories. But beneath every story is the same ocean — the ocean of compassion. Sadi's whole teaching is: be human first. God can wait. But if you are not human, God cannot find you."— ओशो, प्रवचन-संग्रह
गुलिस्तान का सर्वाधिक प्रसिद्ध शेर

بنی‌آدم اعضای یک پیکرند
که در آفرینش ز یک گوهرند

आदम की संतानें एक ही देह के अंग हैं —
सृष्टि में एक ही मूल तत्व से बने हैं।


(यह शेर संयुक्त राष्ट्र के न्यूयॉर्क स्थित प्रवेश द्वार पर उत्कीर्ण है)

ओशो: "सादी ने सारी राजनीति, सारा धर्म और सारा दर्शन एक ही शेर में कह दिया। जब तक तुम दूसरे का दर्द अपना नहीं मानते — ईश्वर तुम्हारे लिए सिर्फ़ शब्द है।"

ओशो और सादी: ओशो ने सादी में वो देखा जो अक्सर उपेक्षित रहता है — व्यावहारिक करुणा। सादी कहते हैं: पहले इंसान बनो। मंदिर-मस्जिद बाद में। ओशो का "Zorba the Buddha" — भौतिक जीवन और आत्मिक जीवन का संयोग — सादी की इसी शिक्षा का विस्तार है।

❧ ॐ ❧

VI. वह प्रश्न जो सबसे बड़ा है

ईश्वर के क़रीब कौन — आस्तिक या नास्तिक?

यह प्रश्न प्राचीन है। हर धर्म ने इसका उत्तर दिया है। पर सूफ़ी संतों और उनके हिन्दू समकक्षों ने जो उत्तर दिया — वो सभी धर्मों की सीमाओं को तोड़ता है।

ओशो ने इस प्रश्न को अनेक कोणों से देखा। उनका उत्तर चौंकाने वाला है — और गहरे अर्थ में, मुक्तिदायी।

"There is no God as a person — only godliness as a quality. And guilt-ridden believers are farther from it than the innocent questioner who simply lives, loves, and wonders."
— ओशो

सूफ़ी संत — और उनका साहसिक उत्तर

सूफ़ी संतउनका कथनओशो की व्याख्या
उमर ख़य्याम"ईश्वर करुणामय है — मेरे छोटे-छोटे पाप उसके विशाल क्षमा के सामने कुछ नहीं।"जो डर से प्रार्थना करे वो दूर है। जो आनंद से जिए वो पास है।
रूमी"आओ, आओ, फिर आओ — चाहे तुमने हज़ार बार वचन तोड़े हों।"कोई शर्त नहीं। ईश्वर की दुकान में 'योग्यता' नहीं देखी जाती।
हाफ़िज़"मैं रिन्द हूँ — मस्जिद भी मेरी, मधुशाला भी मेरी।"जो किसी एक व्यवस्था का बंदी नहीं — वो सर्वत्र ईश्वर को देख सकता है।
बुल्लेशाह"बुल्लेया! की जाणा मैं कौन।" (मैं कौन हूँ — यह नहीं जानता।)जो अपना नाम-धर्म-जाति भूल गया — वो ईश्वर के सबसे क़रीब है।
अमीर ख़ुसरोदो भाषाओं में एक ही विरह — "न नींद नैनाँ, न अँग चैनाँ।"विरह ही सबसे बड़ी साधना है। जो तड़पता है, वो पास है।

हिन्दू संत — और वही उत्तर, अलग भाषा में

हिन्दू संतउनका कथनओशो की व्याख्या
कबीर"मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे — मैं तो तेरे पास में।" / "जब मैं था, तब हरि नहीं — अब हरि हैं, मैं नाहिं।"जब तक 'मैं' (अहंकार) है, ईश्वर नहीं दिखता। जब 'मैं' मिट जाए, तो ईश्वर ही बचता है।
मीरा"मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।"प्रेम इतना पूर्ण हो कि बाकी सब — कुल, लोक, लाज — छूट जाए। यही मुक्ति है।
रामकृष्ण"जितने मत, उतने पथ।"कोई भी धर्म सर्वोच्च नहीं। हर पथ उसी एक सागर में मिलता है।
रमण महर्षि"'मैं कौन हूँ?' — यही एकमात्र प्रश्न है।"जो यह प्रश्न पूछता है और उसमें डूब जाता है — वो स्वयं ईश्वर हो जाता है।
तुकाराम"देव माझा ओवाळिला" — ईश्वर को आरती दी।भक्ति में कोई ऊँच-नीच नहीं। जूते बनाने वाला (कबीर) और राजकुमार — दोनों के लिए द्वार खुला है।

ओशो का निर्णायक उत्तर

"The man with a belief system carries a map. But the territory is not the map. The man without a belief system is lost — and only the lost man can truly find. Believers know the address of God. Seekers have met him."— ओशो
"Kabir has said: I was searching and searching — and then I got lost. And then happened the miracle of miracles. When I was not there, you were standing before me. When I was there and searching, you were so far away. I disappeared — and my Lord, you are standing before me."— ओशो, The Divine Melody, Chapter 2 (Kabir पर)

ओशो ने तीन श्रेणियाँ बनाईं:

१. धर्मभीरु आस्तिक (Guilt-ridden Believer) — जो डर से प्रार्थना करता है, पाप से डरता है, स्वर्ग-नर्क की चिंता में जीता है। ओशो के अनुसार — यह ईश्वर से सबसे दूर है। यह पुरोहित-निर्मित ईश्वर है, असली नहीं।

२. ईमानदार नास्तिक / प्रश्नकर्ता (Honest Questioner) — जो कहता है "मुझे नहीं पता" — और इस अज्ञान में जीता है। ओशो ने कहा — यह आस्तिक से बेहतर है। क्योंकि उसके भीतर अभी भी जिज्ञासा है — और जिज्ञासा ही खोज का द्वार है।

३. प्रेमी / मस्त फ़कीर (The Lover — The Intoxicated Mystic) — जो न आस्तिक है, न नास्तिक। जो बस प्रेम में है — रूमी की तरह, हाफ़िज़ की तरह, कबीर की तरह, मीरा की तरह। यह ईश्वर के सबसे क़रीब है। क्योंकि यहाँ 'मैं' नहीं बचा — और जहाँ 'मैं' नहीं, वहाँ ईश्वर है।

कबीर — ओशो का सर्वाधिक प्रिय उद्धरण

जब मैं था, तब हरि नहीं — अब हरि हैं, मैं नाहिं।

प्रेम गली अति साँकरी — तामें दो न समाहिं।

जब तक मैं (अहंकार) था — ईश्वर नहीं था। अब ईश्वर है — तो मैं नहीं हूँ।
प्रेम की गली बहुत संकरी है — उसमें दो नहीं समाते। या तो 'मैं' रहूँ, या 'वो'।
बुल्लेशाह — ओशो का दूसरा प्रिय

बुल्लेया! की जाणा मैं कौन।

न मैं मोमिन विच मसीतां — न मैं मूसा दीं फ़िरौन।

मुझे नहीं पता मैं कौन हूँ। न मैं मस्जिद का नमाज़ी हूँ, न मूसा हूँ, न फ़िरऔन।
ओशो: "बुल्लेशाह ने सभी पहचानें छोड़ दीं — और इसी में वो ईश्वर को पा गए।"

संक्षेप — ओशो का अंतिम वचन

"Religion has two faces. One face belongs to the priests — full of fear, guilt, ritual, reward and punishment. The other face belongs to the mystics — full of love, laughter, dance, and silence. The first face keeps you away from God. The second face IS God."— ओशो

तो उत्तर यह है —

वो आस्तिक जो भय से प्रार्थना करता है — दूर है।
वो नास्तिक जो ईमानदारी से प्रश्न पूछता है — पास है।
वो प्रेमी जो मस्त है, जो भूल गया है कि वो कौन है — वही सबसे क़रीब है।

रूमी ने इसे बाँसुरी में कहा।
ख़य्याम ने इसे शराब के प्याले में कहा।
हाफ़िज़ ने इसे प्रेम की ग़ज़ल में कहा।
सादी ने इसे इंसानियत की कहानियों में कहा।
ख़ुसरो ने इसे दो भाषाओं के एक विरह में कहा।
कबीर ने इसे बुनकर की भाषा में कहा।
मीरा ने इसे नृत्य में कहा।
बुल्लेशाह ने इसे काफ़ी में कहा।

और ओशो ने कहा — ये सब एक ही बात कह रहे हैं:

मिट जाओ — और मिलो।
Dissolve — and arrive.

Akshat Agrawal writes on Indian classical philosophy, Sufi poetry, Vedānta, and civilisational thought at Community Development · ग्राम स्वराज.

Substack: substack.com/@akshat08  ·  Blog: akshat08.blogspot.com

© 2026 Akshat Agrawal

Wednesday, June 24, 2026

दिल का चमन उजड़ते देखा - राम, कला और सच्चे दिल की खोज

 

दिल का चमन उजड़ते देखा

राम, कला और सच्चे दिल की खोज

अक्षत अग्रवाल


**"दिल का चमन उजड़ते देखा,

प्यार का रंग उतरते देखा।

हमने हर जीने वाले को,

धन-दौलत पर मरते देखा।"**

 https://youtube.com/shorts/Usi3zUFt4xw?si=SjNNB1DkLDP0ozuF

उम्र के एक पड़ाव पर पहुँचकर मनुष्य देखता है कि दुनिया बहुत कुछ जानती है।

धंधा।

निवेश।

प्रतिष्ठा।

चतुराई।

संपर्क।

लेकिन शायद सबसे महत्वपूर्ण वस्तु खो चुकी है:

सच्चा दिल।


राम कौन हैं?

राम केवल मंदिर की मूर्ति नहीं।

राम केवल कथा नहीं।

राम केवल राजनीति नहीं।

राम हैं:

  • सत्य,
  • करुणा,
  • मर्यादा,
  • निर्मलता।

राम का वास्तविक निवास कहाँ है?

तुलसीदास उत्तर देते हैं:

"निर्मल मन जन सो मोहि पावा।"

अर्थात:

राम केवल सच्चे दिल में निवास करते हैं।


सच्चा दिल क्या है?

जो:

  • छल न करे।
  • कपट न करे।
  • दिखावा न करे।
  • गणना न करे।
  • प्रेम को व्यापार न बनाए।

इसीलिए राम स्वयं कहते हैं:

"मोहि कपट छल छिद्र न भावा।"

राम को:

  • चालाकी नहीं चाहिए।
  • धंधेबाज़ी नहीं चाहिए।
  • दिखावटी भक्ति नहीं चाहिए।

उन्हें चाहिए:

सच्चा दिल।


कला क्या है?

कला केवल मनोरंजन नहीं।

कला वह है:

जो एक सच्चे दिल से निकलकर दूसरे सच्चे दिल को छू ले।

यदि संगीत:

  • केवल कमाई है,
  • केवल प्रसिद्धि है,
  • केवल बाज़ार है,

तो वह उद्योग हो सकता है।

लेकिन कला नहीं।


कलाकार कौन है?

सच्चा कलाकार:

  • दिल का व्यापारी नहीं।
  • आत्मा का यात्री है।

वह:

  • गीत गाता है,
  • राग साधता है,
  • शब्द खोजता है,

ताकि किसी दूसरे मनुष्य का सच्चा दिल जाग जाए।


धंधा और साधना

आज हर चीज़ से पूछा जाता है:

"इससे कमाई कितनी होगी?"

लेकिन कोई नहीं पूछता:

"इससे आत्मा कितनी जागी?"

कुछ लोग धंधे को पैशन समझ लेते हैं।

कुछ लोग पैशन को धंधा बना देते हैं।

लेकिन:

साधना कभी व्यापार नहीं बन सकती।


धन पर मरने वाले

हमने हर जीने वाले को धन-दौलत पर मरते देखा।

लेकिन जिनकी इच्छाएँ कभी समाप्त नहीं होतीं,

वे सदैव भिखारी बने रहते हैं।

भिखारी केवल सड़क पर बैठा व्यक्ति नहीं।

भिखारी वह भी है:

  • जिसे कभी पर्याप्त न लगे,
  • जिसे सदा अधिक चाहिए।

राम और कलाकार

राम सच्चे दिल में निवास करते हैं।

और कला सच्चे दिल को स्पर्श करती है।

इसलिए:

राम और कला दोनों का घर एक ही है।

जहाँ:

  • कपट नहीं,
  • दिखावा नहीं,
  • व्यापार नहीं।

वहीं:

  • भक्ति जन्म लेती है।
  • संगीत जन्म लेता है।
  • कविता जन्म लेती है।

सच्ची भक्ति

सच्ची भक्ति:

  • धन के लिए नहीं।
  • प्रसिद्धि के लिए नहीं।
  • चमत्कार के लिए नहीं।

सच्ची भक्ति वह है जिसमें:

दिल राम को खोजता है।

और सच्ची कला वह है जिसमें:

कलाकार मनुष्य के भीतर के राम को जगाता है।


अंतिम प्रार्थना

यदि धंधा करना हो —

ईमान से करो।

यदि कला करनी हो —

दिल से करो।

यदि भक्ति करनी हो —

निर्मल मन से करो।

क्योंकि:

राम सच्चे दिल में बसते हैं।

और:

कला सच्चे दिल को छू लेती है।


**दिल का चमन उजड़ते देखा,

प्यार का रंग उतरते देखा।

हमने हर जीने वाले को,

धन-दौलत पर मरते देखा।**

और अंत में यही समझ आया —

धन पेट भरता है।

धंधा जीवन चलाता है।

कला हृदय को छूती है।

और राम सच्चे दिल में निवास करते हैं।


"निर्मल मन जन सो मोहि पावा।"

"मोहि कपट छल छिद्र न भावा।"

अक्षत अग्रवाल

कव्वाली मुसलमानों की और अंताक्षरी हिंदुओं की?

 

कव्वाली मुसलमानों की और अंताक्षरी हिंदुओं की?

रसोई, राग, भाषा और पहचान की राजनीति पर एक छोटी सी ग़ज़ल और एक लंबी बातचीत

अक्षत अग्रवाल


कव्वाली मुसलमानों की और अंताक्षरी हिंदुओं की।
हिंदी हिंदुओं की और हिंदुस्तानी / उर्दू मुसलमानों की।
बिरयानी मुस्लिमों की और खिचड़ी हिंदुओं की।
तंदूरी पराठा मुस्लिमों का और रोटी हिंदुओं की।
इला, अल्लाह मुस्लिमों के और ईशा, ईश्वर हिंदुओं के!

वाह वाह वाह!

कभी-कभी लगता है कि हमने इस देश को नक्शे से कम और रसोई, भाषा और संगीत से ज़्यादा बाँट दिया है।


एक छोटी सी ग़ज़ल

मतला

किसी ने बाँट दीं आवाज़ें, किसी ने बाँट दी थाली,
मगर गंगा की लहर बोली — कहाँ जाती है खुशहाली।

कव्वाली को उधर लिख दो, इधर लिख दो भजन सारे,
हवा पूछे — बताओ तो, किसी मज़हब की है ताली?

उधर बिरयानी महकी है, इधर खिचड़ी की सौंधी भाप,
चूल्हे हँसकर कहें — हमको न आती जात की गाली।

किसी ने उर्दू को रोका, किसी ने हिंदी को बाँटा,
ज़ुबाँ बोली — मैं माँ हूँ, न मेरी कोई रखवाली।

अज़ाँ भी गूँजती दिल में, शंख भी बजते हैं भीतर,
सुनो तो एक ही सुर है, बदल जाती है बस लय-ताली।

मक़ता

अक्षत यह सोचता बैठा घाटों की सांझ में अक्सर,
कहाँ से आ गई दीवार इस मिट्टी की घरवाली?


किसकी भाषा?

हिंदी और उर्दू दोनों सदियों की साझी बोलियों से बनीं।

कई शब्द:

  • संस्कृत से आए,
  • फ़ारसी से आए,
  • अरबी से आए,
  • लोकभाषाओं से आए।

जब कोई कहता है:

"यह भाषा उनकी है, यह हमारी।"

तो शायद भाषा स्वयं मुस्कुराती होगी।


किसका भोजन?

खिचड़ी भारत की सबसे प्राचीन सामुदायिक रसोई हो सकती है।

बिरयानी भारतीय इतिहास की सबसे सफल सांस्कृतिक यात्राओं में से एक है।

रोटी, पराठा, तहरी, पुलाव, कबाब, खीर — सबने यात्राएँ की हैं।

रसोई कभी सीमा रेखाओं को नहीं मानती।


संगीत किसका?

कव्वाली हो या भजन।

ठुमरी हो या कीर्तन।

दादरा हो या आलाप।

संगीत का जन्म प्रायः मनुष्य की साझा पीड़ा और आनंद से होता है।

जब आवाज़ ऊपर उठती है, वह पहले मनुष्य होती है, बाद में पहचान।


काशी और अवध की सीख

काशी कहती है:

मृत्यु सबकी एक है।

अवध कहती है:

स्वाद सबका साझा है।

बिस्मिल्लाह ख़ाँ शहनाई बजाते हैं।

तुलसी रामचरित लिखते हैं।

कबीर दोनों को चुनौती देते हैं।

और गंगा चुपचाप बहती रहती है।


अंतिम प्रश्न

क्या:

  • कव्वाली केवल मुसलमानों की है?
  • भजन केवल हिंदुओं के हैं?
  • उर्दू केवल एक समुदाय की है?
  • हिंदी केवल दूसरे की?

या फिर यह सब उस साझा सभ्यता की धरोहर है जिसे हम कभी हिंदुस्तान कहते थे?


अज़ाँ भी मेरी, शंख भी मेरा,
गंगा भी मेरी, जमुना भी।
जो बाँटना चाहे साँसों को,
उससे कह दो — धरती सबकी।


प्रेरणा

संगीत लिंक:

YouTube Musical Reference


"जब रोटी तवे पर सिकती है, वह धर्म नहीं पूछती।
जब राग उठता है, वह भाषा नहीं पूछता।"

— अक्षत अग्रवाल

Tuesday, June 23, 2026

भूत की छाँव और जागृत आत्मा

 

भूत की छाँव और जागृत आत्मा

महादेवी वर्मा की पंक्तियों से आधुनिक मनुष्य के लिए एक चेतावनी

(नीचे महादेवी वर्मा की पंक्तियाँ इस लेख की प्रेरणा हैं।)


"बाँध लेंगे क्या तुझे, यह मोम के बंधन सजीले?
पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले?
विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,
क्या डुबा देंगे तुझे यह फूल के दल ओस-गीले?
तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना।
जाग तुझको दूर जाना।"

महादेवी वर्मा


क्या इस भवसागर में डूब जाओगे?

आज का मनुष्य समुद्र में नहीं डूबता।

वह डूबता है:

  • भावनाओं में,
  • उन्मादों में,
  • नारों में,
  • जुमलेबाजी में,
  • झूठ और फरेब में,
  • पाखंड में,
  • अंधविश्वास में।

हर युग का अपना समुद्र होता है।

कभी वह लोभ का होता है।

कभी सत्ता का।

कभी धर्म के नाम पर।

कभी विचारधारा के नाम पर।

कभी किसी बाबा के पीछे।

कभी किसी नेता के पीछे।

और कभी अपने ही मन की कल्पनाओं के पीछे।


अपनी छाया को शेरखान मत समझो

मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह अपनी ही छाया को स्वयं समझ बैठता है।

कभी:

  • पद की छाया,
  • जाति की छाया,
  • धर्म की छाया,
  • संगठन की छाया,
  • परिवार की छाया,
  • अनुयायियों की छाया।

और वह सोचने लगता है:

"मैं बहुत बड़ा हूँ।"

किन्तु महादेवी वर्मा चेतावनी देती हैं:

"तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना।"

मैं कहता हूँ:

तू अपनी भूत की छाँव को देखकर अपने को शेरखान मत समझना।

जो बीत गया, वह भूत है।

जो पद चला गया, वह भूत है।

जो प्रतिष्ठा चली गई, वह भूत है।

जो अहंकार बचा है, वह केवल छाया है।


तुम पिछले जन्म का भूत नहीं हो

भारतीय समाज में लोग अक्सर कहते हैं:

  • पिछले जन्म का कर्म,
  • पिछले जन्म का ऋण,
  • पिछले जन्म का संबंध।

लेकिन मनुष्य का वास्तविक धर्म क्या है?

तुम कोई भटकती हुई आत्मा नहीं हो।

तुम कोई अतीत का भूत नहीं हो।

तुम कोई भयग्रस्त जीव नहीं हो।

तुम जागृत आत्मा हो।


चार पुरुषार्थों की भूल

भारतीय दर्शन ने जीवन के चार उद्देश्य बताए:

  1. धर्म
  2. अर्थ
  3. काम
  4. मोक्ष

लेकिन आधुनिक मनुष्य:

  • अर्थ को लोभ बना बैठा,
  • काम को मोह बना बैठा,
  • धर्म को पहचान बना बैठा,
  • और मोक्ष को कथा बना बैठा।

वास्तविक शिक्षा यह थी:

काम और अर्थ का धर्मपूर्वक उपभोग करो।

तभी:

मोक्ष की पात्रता उत्पन्न होती है।


जागृत आत्मा कौन है?

जागृत आत्मा:

  • प्रश्न पूछती है।
  • भय से मुक्त होती है।
  • विवेक का उपयोग करती है।
  • किसी भीड़ में स्वयं को नहीं खोती।
  • किसी नारे में स्वयं को नहीं बेचती।
  • किसी गुरु में अपना विवेक समर्पित नहीं करती।

भवसागर की नई लहरें

आज की लहरें हैं:

  • सोशल मीडिया,
  • राजनीतिक उन्माद,
  • धार्मिक उत्तेजना,
  • आध्यात्मिक व्यापार,
  • पहचान की राजनीति,
  • झूठे गौरव की कथाएँ।

मनुष्य इनमें बहता जाता है।

और फिर सोचता है:

"मैं जाग गया हूँ।"

जबकि कई बार वह केवल नई नींद में प्रवेश करता है।


महादेवी की पुकार

महादेवी वर्मा ने बहुत पहले कहा था:

"जाग तुझको दूर जाना।"

यह केवल कवि की पंक्ति नहीं।

यह आत्मा का आह्वान है।

जागो।

क्योंकि:

  • भीड़ तुम्हें जगाने नहीं आएगी।
  • नारे तुम्हें मुक्त नहीं करेंगे।
  • पाखंड तुम्हें सत्य नहीं देगा।

अंतिम संदेश

क्या इस भवसागर,

भावनाओं,

उन्मादों,

नारों,

जुमलेबाजी,

झूठ,

फरेब,

पाखंड,

और अंधविश्वास में डूब जाओगे?

या फिर स्मरण करोगे:

तू न अपनी भूत की छाँव को देखकर अपने को शेरखान समझना।

तुम पिछले जन्म का भूत नहीं हो।

तुम जागृत आत्मा हो।

जो:

काम और अर्थ का धर्मपूर्वक उपभोग करके मोक्ष की अधिकारी बनती है।

और शायद यही महादेवी की "जागृति" है।


"तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना।
जाग तुझको दूर जाना।"

— महादेवी वर्मा

— अक्षत अग्रवाल

स्त्री मोह की नई कथा : "दर्शन दो घनश्याम"

 

स्त्री मोह की नई कथा : "दर्शन दो घनश्याम"

बाबा जी के युग में विरह, भक्ति और भावनात्मक व्यापार की एक व्यंग्य कथा

अक्षत अग्रवाल


"याद पिया की आए, हाए राम!"

पुराने समय में यह पंक्ति सुनकर लोग समझ जाते थे कि कोई विरहिणी अपने प्रिय की प्रतीक्षा कर रही है।

उसका पिया कहीं दूर गया है।

उसका मन व्याकुल है।

उसकी आँखें पथरा गई हैं।

लेकिन कलियुग बड़ा चतुर निकला।

उसने विरह को भी बाजार बना दिया।


बिरहन और बाबा

वह स्त्री दुखी थी।

घर था।

पर मन नहीं था।

परिवार था।

पर संवाद नहीं था।

लोग थे।

पर सुनने वाला कोई नहीं था।

वह धीरे-धीरे गुनगुनाने लगी:

"याद पिया की आए, हाए राम।"

तभी किसी ने उसे नया भजन सिखा दिया:

"दर्शन दो घनश्याम,

नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी हैं।"

अब पिया अदृश्य हो गया।

घनश्याम प्रकट हो गए।


घनश्याम कौन है?

कभी कृष्ण।

कभी गुरु।

कभी बाबा।

कभी सत्संग।

कभी कोई दिव्य बहन।

कभी कोई आध्यात्मिक परिवार।

मनुष्य का मन रिक्त स्थान पसंद नहीं करता।

जहाँ संवाद नहीं मिलता, वहाँ कल्पना प्रवेश कर जाती है।

जहाँ प्रेम नहीं मिलता, वहाँ प्रतीक आ जाते हैं।


मैंने उस बिरहन से कहा

हे मातेश्वरी!

इतनी घनश्याम भक्ति भी ठीक नहीं।

ज़रा बाहर देखो।

घनघोर काले बादल छाए हैं।

"डर लागे गरजे बदरिया।"

यह केवल वर्षा नहीं।

यह भ्रम का मौसम है।

यह अज्ञान का मौसम है।

यह भावनाओं के व्यापार का मौसम है।


देखो, बिजली भी चमक रही है

दूर कहीं बिजली कौंधी।

मैंने कहा:

"देखो बिजली डोले बिन बादल के।"

ज्ञान की बिजली है।

प्रश्नों की बिजली है।

विवेक की बिजली है।

यह कभी-कभी गिरती भी है।

और जब गिरती है तो:

  • भ्रम टूट जाते हैं,
  • मोह टूट जाते हैं,
  • मिथक टूट जाते हैं।

बाबा जी का मौसम विभाग

आजकल हर बादल को घनश्याम घोषित कर दिया गया है।

हर आँसू को भक्ति।

हर अकेलेपन को अध्यात्म।

हर पीड़ा को कर्मफल।

हर प्रश्न को अहंकार।

और हर विरोध को अज्ञान।


विरह और विवेक

विरह बुरा नहीं।

भक्ति भी बुरी नहीं।

प्रेम भी बुरा नहीं।

लेकिन जब:

  • विवेक सो जाए,
  • प्रश्न समाप्त हो जाएँ,
  • और व्यक्ति स्वयं को भूल जाए,

तब विरह मोह बन जाता है।

और मोह व्यापार बन जाता है।


मैंने कहा — घर के भीतर चलो

मैंने उस बिरहन से कहा:

हे मातेश्वरी,

बहुत घनश्याम भक्ति हो गई।

बाहर बादल हैं।

बिजली चमक रही है।

कहीं यह बिजली तेरे सिर पर भी गिर सकती है।

चलो।

घर के भीतर चलो।


घर क्या है?

घर केवल ईंट नहीं।

घर है:

  • विवेक,
  • संवाद,
  • आत्मबोध,
  • संतुलन।

यदि घर भीतर नहीं है,

तो कोई भी बादल घनश्याम बन सकता है।


अंतिम बात

कृष्ण का प्रेम आत्मा को मुक्त करता है।

मोह आत्मा को बाँधता है।

भक्ति मनुष्य को गहरा बनाती है।

आसक्ति उसे निर्भर बना देती है।

आज आवश्यकता घनश्याम के दर्शन की नहीं,

बल्कि उस बिजली की है

जो अंधेरे में क्षणभर चमककर पूछती है:

"तू किसे खोज रही है?

घनश्याम को?

या स्वयं को?"


"डर लागे गरजे बदरिया।"

"देखो बिजली डोले बिन बादल के।"

और कभी-कभी वही बिजली ज्ञान बनकर गिरती है।

— अक्षत अग्रवाल

जब धर्म सो जाता है: समुद्री मार्गों से कुरुक्षेत्र तक

 

जब धर्म सो जाता है: समुद्री मार्गों से कुरुक्षेत्र तक

"हे केशव, ऐसा नहीं कि मुझे धर्म और अधर्म का ज्ञान नहीं; पर मेरे दुर्योधन के अहंकार, प्रतिष्ठा और राज्य का प्रश्न है।"

महाभारत का यह प्रश्न आज भी जीवित है।

आज का कुरुक्षेत्र केवल युद्धभूमि में नहीं, बल्कि व्यापार मार्गों, समुद्री गलियारों, ऊर्जा बाज़ारों, संसदों, मीडिया, कॉरपोरेट बोर्डरूमों और वैश्विक राजनीति में दिखाई देता है।

पनामा नहर, स्वेज नहर और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के संकट हमें याद दिलाते हैं कि सभ्यताएँ केवल व्यापार से नहीं, बल्कि धर्मसम्मत व्यापार से टिकती हैं।

धर्म क्या है?

भारतीय दृष्टि में धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं है।

धर्म का अर्थ है—

  • संतुलन।
  • मर्यादा।
  • न्याय।
  • लोककल्याण।
  • आत्मसंयम।
  • उत्तरदायित्व।

जब व्यापार धर्म से संचालित होता है तो वह समृद्धि देता है।

जब व्यापार लोभ, भय और प्रभुत्व से संचालित होता है तो वही व्यापार अधर्म बन जाता है।

दुर्योधन की समस्या

दुर्योधन मूर्ख नहीं था।

उसे धर्म और अधर्म का ज्ञान था।

उसकी समस्या ज्ञान का अभाव नहीं थी।

समस्या थी—

अहंकार।

प्रतिष्ठा का मोह।

स्वार्थ का अंधकार।

आज भी अनेक व्यक्ति, संस्थाएँ और राष्ट्र जानते हैं कि कौन सा मार्ग न्यायपूर्ण है।

फिर भी वे उस मार्ग पर नहीं चलते क्योंकि:

  • सत्ता का मोह।
  • बाज़ार का दबाव।
  • राष्ट्रीय अहंकार।
  • वैचारिक वर्चस्व।
  • आर्थिक लालच।

इन सबने विवेक को ढक दिया है।

आत्मसम्मान और आत्मश्लाघा

कृष्ण शायद आज कहते:

"आत्मसम्मान उसी का होता है जिसकी आत्मा जागृत हो।"

सोई हुई आत्मा प्रतिष्ठा नहीं खोजती।

वह केवल प्रशंसा खोजती है।

वह सत्ता में मुजरा करती है।

वह बाजार में नारे बेचती है।

वह सभाओं में जुमले फेंकती है।

भारतीय दर्शन में इसे आत्मप्रतिष्ठा नहीं, बल्कि अहंकार, मद और आत्मश्लाघा कहा गया है।

गीता का दैवी और आसुरी संपदा का वर्णन आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

प्राचीन व्यापार मार्ग और धर्म

मसाला मार्ग टूटे।

सिल्क रूट बना।

राज्य उठे और गिरे।

चीन ने दीवार बनाई।

भारत के समुद्री नगर विकसित हुए।

सभ्यताओं ने नए मार्ग खोजे।

इतिहास हमें बताता है:

जब व्यापार मार्ग संकट में पड़ते हैं, तब राष्ट्र स्वयं को सुरक्षित करने का प्रयास करते हैं।

लेकिन भारतीय दृष्टि एक और प्रश्न पूछती है—

क्या सुरक्षा केवल शक्ति से आती है?

या

धर्म से भी?

आज का वैश्विक कुरुक्षेत्र

ऊर्जा सुरक्षा।

राष्ट्रीय हित।

व्यापारिक प्रतिस्पर्धा।

जलवायु संकट।

भू-राजनीति।

इन सबके बीच मनुष्य फिर वही प्रश्न पूछ रहा है:

"धर्म क्या है?"

यदि केवल राष्ट्रीय हित ही सर्वोच्च हो जाए तो संघर्ष बढ़ेगा।

यदि केवल लाभ सर्वोच्च हो जाए तो प्रकृति नष्ट होगी।

यदि केवल प्रतिष्ठा सर्वोच्च हो जाए तो समाज विभाजित होगा।

धर्म इन सबके बीच संतुलन का नाम है।

सज्जन की दूरी

तुलसीदास कहते हैं:

"सठ सन विनय, कुटिल सन प्रीति।"

जब व्यक्ति का विवेक मर जाता है, जब संवाद के स्थान पर केवल शोर रह जाता है, जब आत्मा के स्थान पर केवल अहंकार बोलता है, तब सज्जन व्यक्ति विवाद नहीं करता।

वह दूरी बना लेता है।

भारतीय परंपरा में ऐसे लोगों को शत्रु नहीं, बल्कि अज्ञान से आच्छादित जीव माना गया है।

उनसे घृणा नहीं।

उनसे दूरी।

उनके प्रति क्रोध नहीं।

उनके लिए करुणा।

निष्कर्ष

समुद्री मार्गों का संकट हमें केवल ऊर्जा सुरक्षा का पाठ नहीं पढ़ाता।

वह हमें महाभारत की याद दिलाता है।

दुर्योधन बाहर भी है।

दुर्योधन भीतर भी है।

कुरुक्षेत्र संसार में भी है।

कुरुक्षेत्र हमारे भीतर भी है।

और कृष्ण का प्रश्न आज भी वही है—

"क्या तुम्हारा निर्णय धर्म से प्रेरित है या केवल भय, लोभ और प्रतिष्ठा से?"

शायद यही प्रश्न भविष्य की राजनीति, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और मानव सभ्यता का भी सबसे बड़ा प्रश्न है।

दिल का दर्द निराला - मोहम्मद रफी

 

दिल का दर्द निराला - मोहम्मद रफी 

 https://youtu.be/0NglK872SWk?si=nOYzX7Qocoq62JG9 

दिल का दर्द निराला, हे ओंकारेश्वर, तू भी निर्गुण निराला।

जग में देखे सुख अनेकन, सबके भीतर काल कराला। आज हँसे, कल धूल समाना, माया नगर बड़ा मतवाला।

दिल का दर्द निराला, हे ओंकारेश्वर, तू भी निर्गुण निराला।

राजा रोये, रंक भी रोये, रोये वन के पात पियाला। सागर रोये मेघ बनाकर, रोये मन का सूना छाला।

कोई सुख ऐसा क्या जग में, जो न छिने करि काल हवाला? क्षण भर छाया, स्वप्न समाना, जीवन जल पर लिखी माला।

दिल का दर्द निराला, हे ओंकारेश्वर, तू भी निर्गुण निराला।

मंदिर देखा, तीर्थ भी देखे, देखे जग के मेले-थाला। मन का वन सूना ही पाया, ज्यों बिन पवन जले उजियाला।

तू न रूप, न रंग, न रेखा, नहीं तेरा कोई घर-द्वारा। फिर भी कण-कण में तू व्यापक, अंतर बैठा मौन सहारा।

दिल का दर्द निराला, हे ओंकारेश्वर, तू भी निर्गुण निराला।

जिनको चाहा, दूर गए सब, काल बजावे अपना ताला। मीत, सखा, परिवार, संबंधी, सबको लेना एक दिन काला।

तब मन कहे किसको अपना? कौन यहाँ है सदा रखवाला? अंतर से उत्तर यह आया— नाम तुम्हारा एक उजाला।

दिल का दर्द निराला, हे ओंकारेश्वर, तू भी निर्गुण निराला।

सुख की चाहत छोड़ दे मनवा, दुःख भी तेरा गुरु मतवाला। जिसने पीड़ा को पहचाना, उसने पाया सत्य निराला।

काल कराल खड़ा द्वारे पर, मिट्टी तन और साँस हवाला। जो कुछ है वह क्षण का सपना, शेष वही जो निर्गुण वाला।

दिल का दर्द निराला, हे ओंकारेश्वर, तू भी निर्गुण निराला।

जब सब दीपक बुझ जाएँगे, जब जग होगा सूना काला, तब भी भीतर नाद बचेगा—

"ॐ" अनादि, अनंत, निराला।